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29 बरस में सिर्फ एक बार ससंद पहुंचा ‘हाथी’
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29 बरस में सिर्फ एक बार संसद पहुंचा ‘हाथी’
2004 में मुकीम ने फहराया था बसपा का झंडा
1989 में पहली बार लोकसभा में की बसपा ने एंट्री
नीरज मिश्र
सिद्धार्थनगर। यूं तो सिद्धार्थनगर के विधानसभा क्षेत्रों में बसपा अपना परचम फहरा चुकी है। मगर संसदीय सीट की राह उसके लिए एक बार छोड़कर हमेशा चुनौती पूर्ण साबित हुई। 29 बरस के इस पार्टी के लिए 2004 का चुनाव फायदेमंद रहा। जिसने संसद की राह प्रशस्त की। ऐसा नहीं कि बसपा का वोट बैंक उसके लिए प्रतिबद्ध न रहा हो, पर सियासी समीकरण कभी भी इस करवट नहीं बैठ पाए कि जिसने पार्टी जन को इतराने का मौका दिया हो। इस बार के चुनाव में दिलचस्प यह है कि संसदीय सीट पर दो से ज्यादा बार समाजवादी झंडा बुलंद कर चुकी सपा बसपा के साथ कदमताल कर रही है। मगर सियासी पंडित उसे फिलहाल बहुत रफ्तार में नहीं देख पा रहे हैं।
डुमरियागंज संसदीय सीट में बसपा ने 1989 में एंट्री मारी। उस वक्त पहचान की मोहताज बसपा को पहले प्रत्याशी के रूप में अतीकुर्रहमान मिले। पहले संसदीय चुनाव में अतीकुर्रहमान को 26122 मत ही मिले। जनता दल के प्रत्याशी बृजभूषण तिवारी ने जीत दर्ज की। 1991 में फिर बसपा ने रामकिशोर को प्रत्याशी बनाया। थोड़ी मेहनत हुई तो मत 30174 पहुंच गए। इस बार भाजपा प्रत्याशी राम पाल सिंह ने जीत दर्ज की। 1996 में फिर से बसपा ने अल्पसंख्यक प्रत्याशी के रूप में अजीजुल कदर को प्रत्याशी बनाया। इस बार वोट बैंक में तगड़ा इजाफा हुआ, तो मतों का प्रतिशत 74888 तक पहुंच गया। इस चुनाव में साइकिल पर सवार बृजभूषण तिवारी संसद तक गए। मजबूत प्रत्याशी की तलाश में बसपा को 1998 में डुमरियागंज से दमदार प्रत्याशी पूर्व मंत्री मलिक कमाल यूसुफ पर दांव अजमाया। लोकप्रियता का असर यह रहा है कि मलिक कमाल यूसुफ 176478 मत के साथ दूसरे स्थान पर हो चले। इस चुनाव में फिर से भाजपा के रामपाल सिंह को जीत मिली। 1999 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने खलीलाबाद से सांसद रहे सुरेंद्र यादव पर भरोसा जताया, जो जिलेवासियों का दिल जीत नहीं सके। उन्हें 96147 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। बाजी फिर से भाजपा प्रत्याशी रामपाल के हाथ लग गई। एक जीत की तलाश में बसपा ने 2004 में कांग्रेस छोड़कर आए विधायक मो. मुकीम पर भरोसा जताया, उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता जगदंबिका पाल को हराया और पहली बार संसद तक हाथी पहुंच पाया। इसके बाद फिर से 2009 में बसपा ने उन पर भरोसा जताया, लेकिन इस बार उन्हें कांग्रेस के जगदंबिका पाल से शिकस्त झेलनी पड़ी। तीसरी बार 2014 में फिर से बसपा के खेवनहार मो. मुकीम बने, लेकिन दल बदलकर आए सांसद जगदंबिका पाल के हाथों फिर से हार झेलनी पड़ी। लेकिन गनीमत रही कि बसपा दूसरे स्थान पर रही।
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29 बरस में सिर्फ एक बार संसद पहुंचा ‘हाथी’
2004 में मुकीम ने फहराया था बसपा का झंडा
1989 में पहली बार लोकसभा में की बसपा ने एंट्री
नीरज मिश्र
सिद्धार्थनगर। यूं तो सिद्धार्थनगर के विधानसभा क्षेत्रों में बसपा अपना परचम फहरा चुकी है। मगर संसदीय सीट की राह उसके लिए एक बार छोड़कर हमेशा चुनौती पूर्ण साबित हुई। 29 बरस के इस पार्टी के लिए 2004 का चुनाव फायदेमंद रहा। जिसने संसद की राह प्रशस्त की। ऐसा नहीं कि बसपा का वोट बैंक उसके लिए प्रतिबद्ध न रहा हो, पर सियासी समीकरण कभी भी इस करवट नहीं बैठ पाए कि जिसने पार्टी जन को इतराने का मौका दिया हो। इस बार के चुनाव में दिलचस्प यह है कि संसदीय सीट पर दो से ज्यादा बार समाजवादी झंडा बुलंद कर चुकी सपा बसपा के साथ कदमताल कर रही है। मगर सियासी पंडित उसे फिलहाल बहुत रफ्तार में नहीं देख पा रहे हैं।
डुमरियागंज संसदीय सीट में बसपा ने 1989 में एंट्री मारी। उस वक्त पहचान की मोहताज बसपा को पहले प्रत्याशी के रूप में अतीकुर्रहमान मिले। पहले संसदीय चुनाव में अतीकुर्रहमान को 26122 मत ही मिले। जनता दल के प्रत्याशी बृजभूषण तिवारी ने जीत दर्ज की। 1991 में फिर बसपा ने रामकिशोर को प्रत्याशी बनाया। थोड़ी मेहनत हुई तो मत 30174 पहुंच गए। इस बार भाजपा प्रत्याशी राम पाल सिंह ने जीत दर्ज की। 1996 में फिर से बसपा ने अल्पसंख्यक प्रत्याशी के रूप में अजीजुल कदर को प्रत्याशी बनाया। इस बार वोट बैंक में तगड़ा इजाफा हुआ, तो मतों का प्रतिशत 74888 तक पहुंच गया। इस चुनाव में साइकिल पर सवार बृजभूषण तिवारी संसद तक गए। मजबूत प्रत्याशी की तलाश में बसपा को 1998 में डुमरियागंज से दमदार प्रत्याशी पूर्व मंत्री मलिक कमाल यूसुफ पर दांव अजमाया। लोकप्रियता का असर यह रहा है कि मलिक कमाल यूसुफ 176478 मत के साथ दूसरे स्थान पर हो चले। इस चुनाव में फिर से भाजपा के रामपाल सिंह को जीत मिली। 1999 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने खलीलाबाद से सांसद रहे सुरेंद्र यादव पर भरोसा जताया, जो जिलेवासियों का दिल जीत नहीं सके। उन्हें 96147 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। बाजी फिर से भाजपा प्रत्याशी रामपाल के हाथ लग गई। एक जीत की तलाश में बसपा ने 2004 में कांग्रेस छोड़कर आए विधायक मो. मुकीम पर भरोसा जताया, उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता जगदंबिका पाल को हराया और पहली बार संसद तक हाथी पहुंच पाया। इसके बाद फिर से 2009 में बसपा ने उन पर भरोसा जताया, लेकिन इस बार उन्हें कांग्रेस के जगदंबिका पाल से शिकस्त झेलनी पड़ी। तीसरी बार 2014 में फिर से बसपा के खेवनहार मो. मुकीम बने, लेकिन दल बदलकर आए सांसद जगदंबिका पाल के हाथों फिर से हार झेलनी पड़ी। लेकिन गनीमत रही कि बसपा दूसरे स्थान पर रही।
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