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19 सालों से एक ही टीस, नहीं हो पाया सीमा विस्तार
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स्थापना दिवस पर विशेष---
फोटो- 51 से 55
19 वर्षों से सीमा विस्तार की राह देख रहे दर्जनभर गांव
- 1990 में पड़ी थी नगरपालिका की नींव, 2000 में तैयार हुई थी सीमा विस्तार की फाइल
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अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर। पहली जनवरी 1990 में जब सिद्धार्थनगर नगरपालिका की नींव पड़ी तो गांव की आबादी को शहरी दर्जा मिल गया। इसके बाद 25 वार्ड बनाकर विकास की रूपरेखा तैयार की गई। 29 सालों में मोहल्ले बिजली, सड़क और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़ गए। लेकिन शहर से सटे एक दर्जन से अधिक गांवों को पिछले 19 सालों से नगरपालिका से न जुड़ पाने का गम सालता रहा है। नगरपालिका चुनाव के पास आते ही इस दर्द की दवा मिलने की उम्मीद जगती है, लेकिन चुनाव बीतते ही सीमा विस्तार की फाइल उस बस्ते में चली जाती है, जहां से निकलने में उसे फिर पांच साल का इंतजार करना पड़ता है।
29 दिसंबर 1989 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने जिले में आकर सिद्धार्थनगर को नगरपालिका बनाने की घोषणा की थी। पहली जनवरी 1990 को इसे मूर्त रूप दिया गया। इसके बाद 25 वार्ड का सृजन किया गया। धीरे-धीरे आबादी और लोगों की जरूरतें बढ़ती गईं। इसके बाद लोगों का रुख नगरपालिका से सटे गांवों की तरफ हो गया। उन्हें लगा कि जल्द ही शहर से सटे गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएंगे और यहां भी विकास की गति तेज होगी। वर्ष 2000 में सीमा विस्तार की फाइल तैयार हुई। आसपास के गांवों का चिह्नांकन हुआ। उम्मीद जगी कि अब शहर से सटे गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएंगे, लेकिन 19 साल बाद भी ऐसा न हो सका। हर बार नगरपालिका चुनाव में प्रत्याशी वादे करते हैं और चुनाव बीतते ही भूल जाते हैं। इस संबंध में नगरपालिका के ईओ शैलेंद्र गुप्ता ने बताया कि सीमा विस्तार की फाइल शासन में लंबित है। उम्मीद है कि चुनाव बाद सीमा विस्तार का मामला सुलझ जाए।
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लोग बोले, हर बार मिला धोखा
- भीमापार निवासी राजू पांडेय ने कहा कि उनका गांव नगरपालिका से सटा हुआ है। नगरपालिका क्षेत्र में सड़कें चकाचक हैं, लेकिन हम टूटी सड़कों पर आने-जाने को मजबूर हैं। गांव के ही अरुण उपाध्याय कहा कि 19 सालों से यह सुनता आ रहा हूं कि नगरपालिका का विस्तार होगा। थरौली गांव निवासी उषा श्रीवास्तव ने कहा कि जब घर बनवाया था तो उम्मीद थी कि जल्द ही गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएगा, लेकिन ऐसा न हो सका। भीमापार निवासी सारिका पांडेय ने कहा कि अगर उनका गांव नगरपालिका में शामिल हो जाता तो बिजली और पानी की किल्लत नहीं झेलनी पड़ती।
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अब तक बस राजनीति हुई
- सीमा विस्तार के नाम पर अब तक बस राजनीति हुई है। अगर ऐसा न होता तो मामला कब का सुलझ गया होता। नगरपालिका से सटे गांवों के लोगों का मानना है कि वोट की राजनीति की वजह से मामले को 19 सालों से लटकाए रखा गया है। इसी वजह से बर्डपुर से सटे गांव नौगढ़डिहवा, झंडेनगर, बसौनी, भीमापार, रोआपार, थरौली, मधुकरपुर, परसा महापात्र जैसे गांव अभी भी नगरपालिका में शामिल नहीं हो सके हैं।
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फोटो- 51 से 55
19 वर्षों से सीमा विस्तार की राह देख रहे दर्जनभर गांव
- 1990 में पड़ी थी नगरपालिका की नींव, 2000 में तैयार हुई थी सीमा विस्तार की फाइल
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अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर। पहली जनवरी 1990 में जब सिद्धार्थनगर नगरपालिका की नींव पड़ी तो गांव की आबादी को शहरी दर्जा मिल गया। इसके बाद 25 वार्ड बनाकर विकास की रूपरेखा तैयार की गई। 29 सालों में मोहल्ले बिजली, सड़क और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़ गए। लेकिन शहर से सटे एक दर्जन से अधिक गांवों को पिछले 19 सालों से नगरपालिका से न जुड़ पाने का गम सालता रहा है। नगरपालिका चुनाव के पास आते ही इस दर्द की दवा मिलने की उम्मीद जगती है, लेकिन चुनाव बीतते ही सीमा विस्तार की फाइल उस बस्ते में चली जाती है, जहां से निकलने में उसे फिर पांच साल का इंतजार करना पड़ता है।
29 दिसंबर 1989 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने जिले में आकर सिद्धार्थनगर को नगरपालिका बनाने की घोषणा की थी। पहली जनवरी 1990 को इसे मूर्त रूप दिया गया। इसके बाद 25 वार्ड का सृजन किया गया। धीरे-धीरे आबादी और लोगों की जरूरतें बढ़ती गईं। इसके बाद लोगों का रुख नगरपालिका से सटे गांवों की तरफ हो गया। उन्हें लगा कि जल्द ही शहर से सटे गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएंगे और यहां भी विकास की गति तेज होगी। वर्ष 2000 में सीमा विस्तार की फाइल तैयार हुई। आसपास के गांवों का चिह्नांकन हुआ। उम्मीद जगी कि अब शहर से सटे गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएंगे, लेकिन 19 साल बाद भी ऐसा न हो सका। हर बार नगरपालिका चुनाव में प्रत्याशी वादे करते हैं और चुनाव बीतते ही भूल जाते हैं। इस संबंध में नगरपालिका के ईओ शैलेंद्र गुप्ता ने बताया कि सीमा विस्तार की फाइल शासन में लंबित है। उम्मीद है कि चुनाव बाद सीमा विस्तार का मामला सुलझ जाए।
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लोग बोले, हर बार मिला धोखा
- भीमापार निवासी राजू पांडेय ने कहा कि उनका गांव नगरपालिका से सटा हुआ है। नगरपालिका क्षेत्र में सड़कें चकाचक हैं, लेकिन हम टूटी सड़कों पर आने-जाने को मजबूर हैं। गांव के ही अरुण उपाध्याय कहा कि 19 सालों से यह सुनता आ रहा हूं कि नगरपालिका का विस्तार होगा। थरौली गांव निवासी उषा श्रीवास्तव ने कहा कि जब घर बनवाया था तो उम्मीद थी कि जल्द ही गांव नगरपालिका में शामिल हो जाएगा, लेकिन ऐसा न हो सका। भीमापार निवासी सारिका पांडेय ने कहा कि अगर उनका गांव नगरपालिका में शामिल हो जाता तो बिजली और पानी की किल्लत नहीं झेलनी पड़ती।
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अब तक बस राजनीति हुई
- सीमा विस्तार के नाम पर अब तक बस राजनीति हुई है। अगर ऐसा न होता तो मामला कब का सुलझ गया होता। नगरपालिका से सटे गांवों के लोगों का मानना है कि वोट की राजनीति की वजह से मामले को 19 सालों से लटकाए रखा गया है। इसी वजह से बर्डपुर से सटे गांव नौगढ़डिहवा, झंडेनगर, बसौनी, भीमापार, रोआपार, थरौली, मधुकरपुर, परसा महापात्र जैसे गांव अभी भी नगरपालिका में शामिल नहीं हो सके हैं।