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अकीदतमंदों ने चढ़ाई चादर, मांगी मन्नत
siddharthnagar
Updated Mon, 20 Aug 2018 11:39 PM IST
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मीराबाबा की मजार पर दुआ मांगते अकीदतमंद।
- फोटो : अमर उजाला
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डुमरियागंज। हल्लौर गांव में आयोजित दो दिवसीय उर्स के आखिरी दिन सोमवार को अकीदतमंदों ने सूफी संत शाह अब्रदुरसूल मीराबाबा की मजार पर चादरें चढ़ाईं और मन्नत मांगी। मन्नतें पूरी होने पर लोगों ने यहां अपने बच्चे का मुंडन भी करवाया। उर्स का समापन लंगर के बाद हुआ।
मीराबाबा की मजार की जानकारी देते हुए जानशीन अहमद साबिर व मुतवल्ली सलमान मेंहदी ने बताया कि मीराबाबा सूफी संत थे। वे 16वीं शताब्दी में अपने छोटे भाई सैय्यद मुस्लिम और उनके चार बेटों के साथ इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए ईरान से हिंदुस्तान आए थे। वह लोगों को धार्मिक संदेश देते हुए हल्लौर गांव में आकर ठहरे थे। यहां उन्होंने थारू कबीले के लोगों और उनके जादूगर सरदार को नेकी व भलाई का काम करने की सलाह दी। सरदार ने मानने से इंकार कर दिया। फिर तय हुआ कि मीराबाबा और सरदार दातून कर उसे जमीन मेें गाड़ देंगे। जिसका दातून पौधे का रूप लेगा, वह यहां पर रहेगा। सरदार व मीराबाबा ने नीम व रीठा का दातून जमीन में दबाया। मीराबाबा के दातून से पौधा निकल आया। इसके बाद थारू और उसके सरदार गांव छोड़ बिस्कोहर, तुलसीपुर के रास्ते नेपाल चले गए। इलाके में एक बार महामारी फैली। लोगों को बीमारी से बचाने के लिए मीराबाबा ने पूरे गांव को सूरे हलका से बांधकर उसे हल्लौर नाम दे दिया। उर्स के आखिरी दिन बाबा की मजार पर क्षेत्र के इटवा, पिरैला, जमौतिया, तिलगडिय़ा, नउवागांव, हटवा, रामभारी, शाहपुर सहित दजज्नों गांव के अकीदतमंदों ने आकर चादर चढ़ाकर मन्नतें मांगीं। इस दौरान कामयाब हुसैन बब्लू, पूर्व ग्राम प्रधान गुलाम अली ईदू, मोहरम अली, नियाज हुसैन गुड्डू, इंतजार, अजीम हैदर, हैदरे कर्रार, पप्पू आदि मौजूद रहे।
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मीराबाबा की मजार की जानकारी देते हुए जानशीन अहमद साबिर व मुतवल्ली सलमान मेंहदी ने बताया कि मीराबाबा सूफी संत थे। वे 16वीं शताब्दी में अपने छोटे भाई सैय्यद मुस्लिम और उनके चार बेटों के साथ इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए ईरान से हिंदुस्तान आए थे। वह लोगों को धार्मिक संदेश देते हुए हल्लौर गांव में आकर ठहरे थे। यहां उन्होंने थारू कबीले के लोगों और उनके जादूगर सरदार को नेकी व भलाई का काम करने की सलाह दी। सरदार ने मानने से इंकार कर दिया। फिर तय हुआ कि मीराबाबा और सरदार दातून कर उसे जमीन मेें गाड़ देंगे। जिसका दातून पौधे का रूप लेगा, वह यहां पर रहेगा। सरदार व मीराबाबा ने नीम व रीठा का दातून जमीन में दबाया। मीराबाबा के दातून से पौधा निकल आया। इसके बाद थारू और उसके सरदार गांव छोड़ बिस्कोहर, तुलसीपुर के रास्ते नेपाल चले गए। इलाके में एक बार महामारी फैली। लोगों को बीमारी से बचाने के लिए मीराबाबा ने पूरे गांव को सूरे हलका से बांधकर उसे हल्लौर नाम दे दिया। उर्स के आखिरी दिन बाबा की मजार पर क्षेत्र के इटवा, पिरैला, जमौतिया, तिलगडिय़ा, नउवागांव, हटवा, रामभारी, शाहपुर सहित दजज्नों गांव के अकीदतमंदों ने आकर चादर चढ़ाकर मन्नतें मांगीं। इस दौरान कामयाब हुसैन बब्लू, पूर्व ग्राम प्रधान गुलाम अली ईदू, मोहरम अली, नियाज हुसैन गुड्डू, इंतजार, अजीम हैदर, हैदरे कर्रार, पप्पू आदि मौजूद रहे।
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