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सरहद की रखवाली के साथ रक्त देकर दे रहे नई जिंदगी
श्याम सुंदर तिवारी सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 04 Aug 2018 11:16 PM IST
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ब्लड बैंक पर रक्तदान करते एसएसबी के जवान (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। न रिश्तों का पता, न तो कोई नातेदारी, फिर भी रिश्ता जोड़ लेते हैं खून से। बात सरहद की हो या जिदंगी की दोनों को बचाने के लिए कभी पीछे नहीं हटते हैं। भारत-नेपाल सीमा पर तैनात एसएसबी जवानों की कहानी कुछ ऐसी ही है। पिछले चार सालों में सैकड़ों लोगों की जिदंगी बचाकर रिश्तों की इबारत लिख रहे हैं। भारत-नेपाल सीमा पर तैनात एसएसबी के जवान तीन वर्षों में 212 यूनिट से अधिक ब्लड दे चुके हैं। जवानों के इस जज्बे को जिले की जनता सलाम कर रही है।
जिले की 68 किलो मीटर की सीमा नेपाल को जोड़ती है। सरहद संवेदनशील होने के नाते एसएसबी की तैनाती गई है। कर्तव्य निष्ठा का निर्वहन करते हुए एसएसबी के जवान कई संदिग्धों को दबोच भी चुके हैं। इससे इतर जवान सरहद की रखवाली के साथ लोगों की जिदंगी भी बचा रहे है। खून न होने कारण जिदंगी जीने की उम्मीद छोड़ चुके लोगों ब्लड देकर जवान व उनके परिजनों को जिदंगी का तोहफा दे रहे हैं। सीमा सुरक्षा में लगे एसएसबी के जवान विश्व रक्तदान दिवस के अलावा समय-समय पर रक्तदान करते हैं। वह जिला अस्पताल सहित अन्य अस्पतालों में इलाज करने वाले जरूरतमंदों को दिया जाता है। इसके अलावा जिले में जहां जरूरत पड़ती है, वहां पहुंचकर रक्तदान करते हैं। जनार्दन प्रसाद, कमांडेंट एसएसबी 43वीं वाहिनी ने बताया कि रक्तदान महादान है, हमारे रक्त से किसी को नई जिदंगी मिलती है। इसलिए हमें अपने रक्त को समय पर दान करना चाहिए। एसएसबी के जवान समय-समय पर शिविर लगाकर रक्तदान करते हैं।
एसएसबी से मिली जानकारी के अनुसार
वर्ष यूनिट
2014 50
2015 30
2016 25
2017 53
2018 में अब तक 54 यूनिट रक्तदान कर चुके हैं।
केस एक
वर्ष 2015 में बांसी तहसील की रहने वाली सूर्यमती नाम की महिला का प्रसव होना था। शरीर में खून की कमी होने के कारण उसका ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था। जानकारी मिलने के बाद पूर्व में तैनात रही द्वितीय वाहिनी के हेंमत नाम के सिपाही ने एक यूनिट ब्लड दिया था। इसके बाद महिला का सुरक्षित प्रसव हुआ और जच्चा व बच्चा दोनों सुरक्षित रहे। परिवार के लोगों ने जवान की सलामती के लिए दुआ मांगी थी।
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केस दो
हाल ही में स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी के रिश्तेदार को ब्लड की जरूरत थी। ब्लड बी निगेटिव ग्रुप का होने के कारण नहीं मिल रहा था। लोग हार चुके थे कि अब खून के अभाव में जिदंगी नहीं बचेगी। इस बात की जानकारी वर्तमान में सीमा पर तैनात एसएसबी 43वीं वाहिनी के कमांडेंट को लगी तो उन्होंने ने हरविंद्र सिंह नाम के जवान को भेजकर ब्लड दिलवाया। इसके बाद उस व्यक्ति की जान बची।
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जिले की 68 किलो मीटर की सीमा नेपाल को जोड़ती है। सरहद संवेदनशील होने के नाते एसएसबी की तैनाती गई है। कर्तव्य निष्ठा का निर्वहन करते हुए एसएसबी के जवान कई संदिग्धों को दबोच भी चुके हैं। इससे इतर जवान सरहद की रखवाली के साथ लोगों की जिदंगी भी बचा रहे है। खून न होने कारण जिदंगी जीने की उम्मीद छोड़ चुके लोगों ब्लड देकर जवान व उनके परिजनों को जिदंगी का तोहफा दे रहे हैं। सीमा सुरक्षा में लगे एसएसबी के जवान विश्व रक्तदान दिवस के अलावा समय-समय पर रक्तदान करते हैं। वह जिला अस्पताल सहित अन्य अस्पतालों में इलाज करने वाले जरूरतमंदों को दिया जाता है। इसके अलावा जिले में जहां जरूरत पड़ती है, वहां पहुंचकर रक्तदान करते हैं। जनार्दन प्रसाद, कमांडेंट एसएसबी 43वीं वाहिनी ने बताया कि रक्तदान महादान है, हमारे रक्त से किसी को नई जिदंगी मिलती है। इसलिए हमें अपने रक्त को समय पर दान करना चाहिए। एसएसबी के जवान समय-समय पर शिविर लगाकर रक्तदान करते हैं।
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एसएसबी से मिली जानकारी के अनुसार
वर्ष यूनिट
2014 50
2015 30
2016 25
2017 53
2018 में अब तक 54 यूनिट रक्तदान कर चुके हैं।
केस एक
वर्ष 2015 में बांसी तहसील की रहने वाली सूर्यमती नाम की महिला का प्रसव होना था। शरीर में खून की कमी होने के कारण उसका ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था। जानकारी मिलने के बाद पूर्व में तैनात रही द्वितीय वाहिनी के हेंमत नाम के सिपाही ने एक यूनिट ब्लड दिया था। इसके बाद महिला का सुरक्षित प्रसव हुआ और जच्चा व बच्चा दोनों सुरक्षित रहे। परिवार के लोगों ने जवान की सलामती के लिए दुआ मांगी थी।
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केस दो
हाल ही में स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी के रिश्तेदार को ब्लड की जरूरत थी। ब्लड बी निगेटिव ग्रुप का होने के कारण नहीं मिल रहा था। लोग हार चुके थे कि अब खून के अभाव में जिदंगी नहीं बचेगी। इस बात की जानकारी वर्तमान में सीमा पर तैनात एसएसबी 43वीं वाहिनी के कमांडेंट को लगी तो उन्होंने ने हरविंद्र सिंह नाम के जवान को भेजकर ब्लड दिलवाया। इसके बाद उस व्यक्ति की जान बची।