World Music Day: गायक मन्ना डे ने नंगे पैर रखा था कैराना की जमीं पर कदम, पढ़िए खास रिपोर्ट
मन्ना डे ने कहा था कि यह धरती संगीतकारों के लिए तीर्थ है। यहां जूते पहनकर चलना कैराना की शान में गुस्ताखी होगी।
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किराना घराना के शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में योगदान की वजह से कैराना संगीत से जुड़ी हस्तियों के लिए तीर्थ बन गया। 1970 में गायक मन्ना डे एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने कैराना आए तो उन्होंने सबसे पहले अपने जूते उतारे और नंगे पैर चलकर कैराना की मिट्टी को माथे से लगाया था। तब मन्ना डे ने कहा था कि यह धरती संगीतकारों के लिए तीर्थ है। यहां जूते पहनकर चलना कैराना की शान में गुस्ताखी होगी। बॉलीवुड गायक मोहम्मद रफी भी इसी घराने के अब्दुल करीम खां के शिष्य रहे।
1964 में पंडित भीमसेन जोशी कैराना आए और अब्दुल करीम खां के जर्जर मकान के आगे सजदा किया। वह मकान की देहरी पर नजराने के तौर पर कुछ रुपये रखकर लौट गए थे। इस घराने के जनक अब्दुल करीम खां ने उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत परंपरा के बीच सेतु का काम किया। 11 नवंबर 1872 को कैराना में उस्ताद काले खां के घर पैदा हुए अब्दुल करीम खां ने अपने वालिद व चाचा से शास्त्रीय संगीत का ककहरा सीखा था।
20 वर्ष की उम्र में अब्दुल करीम खां जयपुर, बड़ौदा व मैसूर राजघराने की शान बने। उन्हें अपनी जन्मभूमि कैराना से इतनी मोहब्बत थी कि उन्होंने अपने संगीत को किराना घराना का नाम दिया। किराना घराना विशिष्ट ख्याल गायकी, ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत गायन के लिए प्रसिद्ध हुआ। अब्दुल करीम खां कर्नाटक संगीत शैली में भी पारंगत थे। इनका मैसूर दरबार से भी गहरा नाता रहा था। उन्हें सारंगी, वीणा, सितार और तबला में महारत हासिल थी। किराना घराने का नाम देश-विदेश में बढ़ता गया। उस समय एचएमवी कंपनी के ग्रामोफोन रिकॉर्डर वाले स्टीकर पर भी अब्दुल करीम खां के पालतू कुत्ते का फोटो छपवाया गया था।
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किराना घराने के मशहूर सितारे
किराना घराना के गनापत बुआ, वाहिद खान, सवाई गंधर्व, सुरेश बाबू माणे, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, हीराबाई बादोड़कर, उस्ताद शकूर खान, माणिक वर्मा, प्रभा आत्रे और श्रीकांत देशपांडे शास्त्रीय संगीत में किराना घराने की अमिट छाप छोड़ चुके हैं। नानौता कस्बे के गांव लुहारी में पले और बढ़े उस्ताद अब्दुल वहीद खां भी इसी घराने से संगीत सीखकर निकले थे। मोहम्मद रफी ने उन्हीं से संगीत की शिक्षा ली थी।
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कब्जे के डर से बेच दिया मकान, कैराना छोड़ने की टीस आज भी है : मशकूर अली
कोलकाता स्थित संगीत रिसर्च एकेडमी के प्रवक्ता और अब्दुल करीम खां के पौत्र उस्ताद मशकूर अली खां कैराना आते रहते हैं। करीब 12 साल पहले मोहल्ला पीपलोतला में उन्होंने अपना पैतृक घर अवैध कब्जे के डर से बेच दिया था। मशकूर अली खां ने फोन पर बताया कि कैराना की गलियां और यमुना का किनारा उनके जहन में आज भी तरोताजा है। देश-विदेश के उनके बहुत से छात्र किराना घराने की धरती कैराना दिखाने का आग्रह करते हैं। ऐसे में सोचता हूं कि कैराना ले जाकर इन्हें बुर्जुगों की क्या निशानी दिखाऊंगा। उन्होंने बताया कि 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके वालिद पद्मश्री उस्ताद शकूर खान को संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड से नवाजा था। उन्हें भी चार अक्तूबर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड दिया था।