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जेल गए, यातनाएं झेली, नहीं झुके भारत मां के सपूत

Sun, 09 Aug 2020 11:42 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 09 Aug 2020 11:42 PM IST
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Went to jail, suffered torture, did not bow down to mother of India
शामली। भारतवासी देश का 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान की आजादी का सपना लंबे संघर्षों के बाद पूरा हुआ। देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए न जाने कितने ही वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी और कितनों को जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं। घर-परिवार को भूलकर उन्होंने भारत माता को आजादी दिलाने के लिए काम किया। जिले के भी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। राष्ट्रपिता के आह्वान पर जिले के जांबाजों ने नमक आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भी प्रतिभाग किया।
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अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रदर्शन कर गए जेल
शामली। नगर के बड़ा बाजार निवासी श्रीराम दत्त शर्मा वैद्य ने आजादी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनके पुत्र 78 वर्षीय डा. ईश्वर दत्त शर्मा बताते हैं कि पिताजी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन और इससे पहले 1930 में हुए नमक आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजों के खिलाफ किए गए प्रदर्शन में तत्कालीन दरोगा असलम खां ने उन्हें गिरफ्तार कर यातनाएं दीं। वह बताते हैं कि शहर में सुभाष चौक, हनुमान धाम, एसटी तिराहे तथा ब्लॉक में स्थापित स्मारक पर उनके पिताजी के साथ ही जिले के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दर्ज हैं। 1985 में श्रीराम दत्त शर्मा की मृत्यु हो गई। उनके बाद 1996 तक उनकी पत्नी गुगली देवी को पेंशन मिली। इसके बाद उनका भी देहांत हो गया। आजादी के 25वें वर्ष में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्र पत्र भेंट किया था।
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क्रांतिकारियों की किताबें मिलने पर की थी पिटाई
शामली। आजादी आंदोलन के अग्रदूतों में गांव कसेरवा कला निवासी जनार्दन स्वरूप का नाम भी शामिल है। न केवल वह बल्कि उनके दो भाई रघुवीर शरण एवं श्याम सुंदर दास भी इस आंदोलन में बराबर के शरीक रहे। जनार्दन स्वरूप के पुत्र झिंझाना रोड निवासी डा. भारत भूषण बताते हैं कि पिताजी आर्य समाज आंदोलन के जरिए आजादी आंदोलन में शामिल रहे। घर पर कांग्रेस का झंडा लगाते थे। एक बार झंडा उतरवाने के लिए दरोगा असलम खां ने घर पर चढ़ाई कर दी थी। घर में क्रांतिकारियों की किताबें मिलने पर दरोगा ने उनकी खूब पिटाई की थी। वह बताते हैं कि उनके पिता क्रांतिकारियों के साथ तार काटने, रेल पटरी उखाड़ने तथा अन्य कई तरह के कार्यों में शामिल रहे। एक बार थानाभवन स्टेशन लूटने की योजना में भी शामिल रहे थे। वह बताते हैं कि उनके पिता की पान की दुकान पर एक बार महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद आए थ। इस बात का जिक्र उन्होंने परिवार के लोगों से किया था। जनार्दन स्वरूप के छोटे भाई रघुवीर शरण भी उनके साथ आंदोलन में बराबर शामिल रहे। दूसरे भाई श्याम सुंदर कानपुर में सक्रिय रहे थे। जनार्दन स्वरूप और रघुवीर शरण को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र दिया था। दोनों की करीब 20-22 साल पहले मृत्यु हो चुकी है।
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एक वर्ष सजा काटी, 25 रुपये लगा जुर्माना
शामली। नगर के मोहल्ला बड़ी आल निवासी चौधरी बैजनाथ सैनी ने भी आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर प्रतिभाग किया। उनके पुत्र रामनाथ सैनी बताते हैं कि उनके पिता को धारा 38डीआईआर के तहत एक वर्ष की जेल की सजा हुई थी तथा 25 रुपये जुर्माना लगाया गया था। उनके पास मुजफ्फरनगर जिला जेल से मिले रिकार्ड की प्रति भी उपलब्ध है। मुजफ्फरनगर जेल से उन्हें शाहजहांपुर भेजा गया था। उन्होंने 10 जुलाई 1941 को जुर्माना जमा कर दिया था। इसके बाद उन्हें डीएम मुजफ्फरनगर के आदेश पर 15 जनवरी 1942 को रिहा कर दिया गया था। रामनाथ सैनी बताते हैं कि 1954 में उनके पिता का देहांत हो गया था। तब वह बहुत छोटे थे। पिता की मृत्यु के बाद 1970 तक उन्हें पारिवारिक पेंशन मिली लेकिन बालिग होने पर पेंशन बंद हो गई।

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प्रमाण पत्र बनवाने को भटक रहे रामनाथ
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बैजनाथ के पुत्र रामनाथ अपने परिवार के सदस्यों का वारिसान प्रमाणपत्र बनाने के लिए भटक रहे हैं। उनकी एक पुत्री तथा तीन पुत्र हैं। वह अपना तथा अपने परिवार का वारिसान प्रमाणपत्र बनवाने के लिए भटक रहे हैं। उन्होंने 2016 और 2017 में आवेदन किया था लेकिन अब तक भी उन्हें प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है।
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