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Shamli News: जेल से छूटते ही ओमप्रकाश ने थानाभवन में लहराया था तिरंगा
Thu, 13 Aug 2026 01:22 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Thu, 13 Aug 2026 01:22 AM IST
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स्वतंत्रता सेनानी स्व.ओमप्रकाश वर्मा।फाइल फोटो
थानाभवन। देश को आजाद कराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों ने अपना घर-परिवार छोड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। यातनाएं सहीं और जेल गए, लेकिन आजादी की राह से उनके कदम नहीं डिगे। ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानी थे थानाभवन निवासी ओमप्रकाश वर्मा, जिन्होंने महज 16 वर्ष की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेजी हुकूमत का सामना किया।
आंदोलन में सक्रिय भूमिका के चलते उन्हें बरेली सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया था। आजादी से कुछ दिन पहले जेल से रिहा होकर लौटे तो उन्होंने थानाभवन के चौक बाजार में सबसे पहले तिरंगा फहराया। तभी से यह स्थान स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण का केंद्र बना हुआ है। कस्बे के बीच स्थित चौक बाजार, जिसे अब डॉ. हेगड़ेवार चौक के नाम से जाना जाता है, को आजादी की लड़ाई की यादों से जुड़ा स्थान माना जाता है।
छह माह तक अंग्रेजी पुलिस को देते रहे चकमा
ओमप्रकाश के पौत्र अंकुर बताते हैं कि उनके बाबा वर्ष 1942 में महज 16 साल की उम्र में आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। उस समय महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था। अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1943 में उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए। उनकी गिरफ्तारी की जिम्मेदारी अंग्रेजी हुकूमत के दरोगा जामिन अली को दी गई थी। करीब छह माह तक दरोगा उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उनके घर की कुर्की के वारंट जारी कर दिए। बाद में ओमप्रकाश वर्मा को गिरफ्तार कर बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उनके घर के सामान की नीलामी भी कर दी गई थी। हालाकि आजादी के बाद सामान वापस करा दिया गया था।
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सादा जीवन जीते थे ओमप्रकाश वर्मा
अंकुर वर्मा ने बताया कि घर से संपन्न होने के बावजूद उनके दादा ने हमेशा सादा जीवन जिया। वह कुर्ता और धोती पहनते थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन बिना चप्पल पहने बिताया। वर्ष 1992 में गंभीर बीमारी के चलते दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
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आंदोलन में सक्रिय भूमिका के चलते उन्हें बरेली सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया था। आजादी से कुछ दिन पहले जेल से रिहा होकर लौटे तो उन्होंने थानाभवन के चौक बाजार में सबसे पहले तिरंगा फहराया। तभी से यह स्थान स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण का केंद्र बना हुआ है। कस्बे के बीच स्थित चौक बाजार, जिसे अब डॉ. हेगड़ेवार चौक के नाम से जाना जाता है, को आजादी की लड़ाई की यादों से जुड़ा स्थान माना जाता है।
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छह माह तक अंग्रेजी पुलिस को देते रहे चकमा
ओमप्रकाश के पौत्र अंकुर बताते हैं कि उनके बाबा वर्ष 1942 में महज 16 साल की उम्र में आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। उस समय महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था। अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1943 में उनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए। उनकी गिरफ्तारी की जिम्मेदारी अंग्रेजी हुकूमत के दरोगा जामिन अली को दी गई थी। करीब छह माह तक दरोगा उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उनके घर की कुर्की के वारंट जारी कर दिए। बाद में ओमप्रकाश वर्मा को गिरफ्तार कर बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया गया। उनके घर के सामान की नीलामी भी कर दी गई थी। हालाकि आजादी के बाद सामान वापस करा दिया गया था।
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सादा जीवन जीते थे ओमप्रकाश वर्मा
अंकुर वर्मा ने बताया कि घर से संपन्न होने के बावजूद उनके दादा ने हमेशा सादा जीवन जिया। वह कुर्ता और धोती पहनते थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन बिना चप्पल पहने बिताया। वर्ष 1992 में गंभीर बीमारी के चलते दिल्ली के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।