{"_id":"57d84c714f1c1b193bd486f3","slug":"prepare-women-for-employment-cattle-rearing","type":"story","status":"publish","title_hn":"रोजगार के लिए महिलाएं पशु पालने को तैयार ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रोजगार के लिए महिलाएं पशु पालने को तैयार
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Wed, 14 Sep 2016 12:29 AM IST
विज्ञापन
- फोटो : फाइल फोटो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शामली। स्वरोजगार के लिए अधिकतर ग्रामीण महिलाएं सिलाई कढ़ाई, अचार मुरब्बा, गमला, पॉट मेकिंग और सजावटी सामान से जुड़े काम चुनती हैं। लेकिन इससे हटकर रोजगार और आय के लिए महिलाएं अब पशुपालन जैसे व्यवसाय को भी अपनाने को तैयार हैं। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत किए जा रहे आवेदनाें में काफी महिलाएं पशुपालन में प्रशिक्षण चाहती हैं।
दरअसल, ऐसी महिलाओं का मानना है कि गांवों में अधिकतर औरतें अब भी घरों में मवेशियों की देखरेख में पुरुषों का सहयोग करती रही हैं। चाहे गाय-भैस को चारा खिलाना हो, पानी पिलाना हो, उनकी देखभाल हो या दूध निकालने से लेकर उपले पाथने तक का काम महिलाएं अब भी बिना संकोच संभालती आ रही हैं। ऐसे में यदि सरकार से इस मिशन के तहत बेहतर प्रशिक्षण और रोजगार की सही दिशा मिल जाए तो वे प्रोफेशनल हो सकती हैं। यही सोच आवेदन की मुख्य वजह मानी जा रही है।
परिवार के पालन पोषण में आजीविका के लिए अभी तक महिलाएं आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाने, गमला तथा सजावटी सामान बनाने, पेकिंग डिब्बा, अचार-मुरब्बा, पापड़ आदि बनाने का प्रशिक्षण लेती रही हैं। लेकिन जिले में जितने भी स्वयं सहायता समूह संचालित हैं, उनमें ज्यादा संख्या पशुपालन और खेती के कार्यों के लिए बनाए गए समूहों की है। योजना का क्रियान्वयन देख रहे जिला ग्राम्य विकास अभिकरण (डीआरडीए) के परियोजना निदेशक बलीराम और राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक दलगंजन सिंह ने बताया कि वर्तमान में जिले में 903 स्वयं सहायता समूह संचालित हैं। यह संख्या 2014 से अब तक की है। आवेदन लगातार प्राप्त हो रहे हैं। उनके संचालन पर विचार चल रहा है।
विज्ञापन
ऐसे मिलता है लाभ
राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत कम से कम ऐसी 10 महिलाओं का समूह बनता है, जो बचत कर सकती हैं। समूह के अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष का संयुक्त बैंक खाता खुलवाया जाता है। बचत की गई धनराशि उस खाते में जमा होती है। तीन माह तक समूह का सही क्रियान्वयन होने पर डीआरडीए की ओर से परीक्षण में पास होने पर चक्रीय अनुदान के तौर पर समूह को 15 हजार रुपये दिया जाता है। वहीं, बैंक की ओर से समूह को 50 हजार रुपये तक की लिमिट बना दी जाती है। समूह का भरोसा बनने पर 50 हजार रुपये की लिमिट बढ़ाकर एक लाख या उससे ज्यादा भी कर दी जाती है, जिस पर ब्याज दर बैंक ऋण की अन्य दरों से कम होती है।
बघरा में है ट्रेनिंग सेंटर
मिशन के लिए प्रशिक्षण दिलाने की जिम्मेदारी आरएसटीआई (रूरल सेल्फ इंप्लायमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) को मिली है। फिलहाल शामली के समूहों का प्रशिक्षण बघरा स्थित ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में ही होता है। अभी शामली जिले का अलग से ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट नहीं बन सका है।
समूह संचालन के पंचसूत्र
1. स्वयं सहायता समूह की नियमित साप्ताहिक बैठक होनी जरूरी है।
2. स्वयं सहायता समूह में शामिल महिलाओं द्वारा नियमित बचत की जाए।
3. समूह के द्वारा किए जा रहे कार्यों में आपसी लेनदेन सही होना चाहिए
4. बैंक से लिया गया ऋण लौटाने में पारदर्शिता और गंभीरता बरती जाए।
5. समूह के क्रिया कलापों के बारे में स्पष्ट लेखा जोखा होना चाहिए।
ब्लाकवार स्थिति
ब्लाक संचालित समूहों की संख्या
शामली 64
कैराना 52
कांधला 62
ऊन 137
थानाभवन 588
विज्ञापन
दरअसल, ऐसी महिलाओं का मानना है कि गांवों में अधिकतर औरतें अब भी घरों में मवेशियों की देखरेख में पुरुषों का सहयोग करती रही हैं। चाहे गाय-भैस को चारा खिलाना हो, पानी पिलाना हो, उनकी देखभाल हो या दूध निकालने से लेकर उपले पाथने तक का काम महिलाएं अब भी बिना संकोच संभालती आ रही हैं। ऐसे में यदि सरकार से इस मिशन के तहत बेहतर प्रशिक्षण और रोजगार की सही दिशा मिल जाए तो वे प्रोफेशनल हो सकती हैं। यही सोच आवेदन की मुख्य वजह मानी जा रही है।
विज्ञापन
परिवार के पालन पोषण में आजीविका के लिए अभी तक महिलाएं आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाने, गमला तथा सजावटी सामान बनाने, पेकिंग डिब्बा, अचार-मुरब्बा, पापड़ आदि बनाने का प्रशिक्षण लेती रही हैं। लेकिन जिले में जितने भी स्वयं सहायता समूह संचालित हैं, उनमें ज्यादा संख्या पशुपालन और खेती के कार्यों के लिए बनाए गए समूहों की है। योजना का क्रियान्वयन देख रहे जिला ग्राम्य विकास अभिकरण (डीआरडीए) के परियोजना निदेशक बलीराम और राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक दलगंजन सिंह ने बताया कि वर्तमान में जिले में 903 स्वयं सहायता समूह संचालित हैं। यह संख्या 2014 से अब तक की है। आवेदन लगातार प्राप्त हो रहे हैं। उनके संचालन पर विचार चल रहा है।
विज्ञापन
ऐसे मिलता है लाभ
राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत कम से कम ऐसी 10 महिलाओं का समूह बनता है, जो बचत कर सकती हैं। समूह के अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष का संयुक्त बैंक खाता खुलवाया जाता है। बचत की गई धनराशि उस खाते में जमा होती है। तीन माह तक समूह का सही क्रियान्वयन होने पर डीआरडीए की ओर से परीक्षण में पास होने पर चक्रीय अनुदान के तौर पर समूह को 15 हजार रुपये दिया जाता है। वहीं, बैंक की ओर से समूह को 50 हजार रुपये तक की लिमिट बना दी जाती है। समूह का भरोसा बनने पर 50 हजार रुपये की लिमिट बढ़ाकर एक लाख या उससे ज्यादा भी कर दी जाती है, जिस पर ब्याज दर बैंक ऋण की अन्य दरों से कम होती है।
बघरा में है ट्रेनिंग सेंटर
मिशन के लिए प्रशिक्षण दिलाने की जिम्मेदारी आरएसटीआई (रूरल सेल्फ इंप्लायमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) को मिली है। फिलहाल शामली के समूहों का प्रशिक्षण बघरा स्थित ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में ही होता है। अभी शामली जिले का अलग से ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट नहीं बन सका है।
समूह संचालन के पंचसूत्र
1. स्वयं सहायता समूह की नियमित साप्ताहिक बैठक होनी जरूरी है।
2. स्वयं सहायता समूह में शामिल महिलाओं द्वारा नियमित बचत की जाए।
3. समूह के द्वारा किए जा रहे कार्यों में आपसी लेनदेन सही होना चाहिए
4. बैंक से लिया गया ऋण लौटाने में पारदर्शिता और गंभीरता बरती जाए।
5. समूह के क्रिया कलापों के बारे में स्पष्ट लेखा जोखा होना चाहिए।
ब्लाकवार स्थिति
ब्लाक संचालित समूहों की संख्या
शामली 64
कैराना 52
कांधला 62
ऊन 137
थानाभवन 588