{"_id":"586fe4c74f1c1b0a32158a9f","slug":"migration-and-development-will-issue-backwardness","type":"story","status":"publish","title_hn":"पलायन, पिछड़ापन और विकास बनेगा मुद्दा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पलायन, पिछड़ापन और विकास बनेगा मुद्दा
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Sat, 07 Jan 2017 12:11 AM IST
विज्ञापन
political
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शामली। सपा ने कैराना सीट पर नाहिद हसन को प्रत्याशी बनाकर मुस्लिमों के वोटर एकमुश्त अपनी झोली में डालने का सपना संजो रखा है, लेकिन दूसरे दलों से भी मुस्लिम प्रत्याशी उतार दिए गए, तो सपा की जीत का सफर मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि 2012 में बसपा के हाजी अनवर हसन और भाजपा में मुकाबला हुआ था, जिसमें भाजपा से हुकुम सिंह ने 80 हजार वोट पाकर हाजी अनवर हसन को 20 हजार वोटों से हरा दिया था। तब सपा से अय्यूब जंग चुनाव लड़े थे तो पूर्व चेयरमैन अब्दुल अजीज अंसारी निर्दलीय चुनाव लड़े थे।
इसके अलावा झिंझाना से भी एक मुस्लिम चेहरा चुनाव में उतारा गया था। मुस्लिम वोटरों में बिखराव होना ही हाजी अनवर हसन की हार का कारण बना था। वहीं, 2014 के उपचुनाव में कैराना सीट पर सपा के नाहिद हसन जीते थे, तब कांग्रेस से मुस्लिम चेहरा होने के बावजूद वह मुस्लिम वोटरों में अपेक्षित बंटवारा नहीं कर पाया था, जिसका फायदा नाहिद हसन को मिल गया था। अब देखना यह है कि आगामी चुनाव में कैराना सीट किसकी झोली में जाती है और किन मुद्दों पर चुनाव होता है।
चुनावी बिसात पर राजनीति की गोटियां बिछ चुकी हैं। कैराना सीट पर बसपा और सपा ने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, लेकिन रालोद, कांग्रेस और भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बीते पांच साल के दौरान कैराना सिसकता रहा। कभी रंगदारी की धमकी, तो कभी व्यापारियों की हत्या हुई, वहीं कैराना पलायन प्रकरण भी उठा। हो हल्ला खूब हुआ, मगर जनता की नजरों को विकास का उजियारा देखने को नहीं मिला। विकास के नाम पर क्षेत्र पिछड़ा रहा, सड़कों की हालत सुधर नहीं सकी। मुद्दे बहुतेरे हैं, जो कैराना के जेहन में छिपे हैं। विधानसभा चुनाव में मुस्लिम, गुर्जरों के अलावा कश्यप और जाट वोटरों की संख्या नतीजों को प्रभावित करने वाली होगी।
विज्ञापन
भाजपा का शुुरू से ही प्रयास रहा कि कैराना सीट पर गुर्जर, कश्यप और जाटों का समर्थन लेकर जीत दर्ज की जाए, लेकिन बसपा ने कश्यप बिरादरी से दिवाकर देशवाल को प्रत्याशी बनाकर भाजपा की राह में कांटे बो दिए हैं। वहीं, रालोद ने अभी प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। यदि रालोद से जाट बिरादरी का प्रत्याशी घोषित होता है, तो वह भी भाजपा के लिए परेशानी पैदा करेगा।
आंकड़ों की जुबानी
कैराना सीट पर महिला कुल दो लाख 99 हजार 980 मतदाता हैं, जिनमें एक लाख 36 हजार 487 महिलाएं और एक लाख 63 हजार 493 पुरुष हैं। अनुमानित जातिगत आंकड़ों पर गौर करें, तो 51.95 प्रतिशत सामान्य वोटर हैं, 42.18 प्रतिशत (करीब एक लाख 24 हजार) मुस्लिम, 11 प्रतिशत हिंदू गुर्जर (32 हजार), 11.65 प्रतिशत कश्यप (34 हजार), 12.15 प्रतिशत एससी (35 हजार), करीब 30 हजार जाट और 3.5 प्रतिशत ब्राह्मण (10 हजार) वोटर हैं।
यह हो सकते हैं प्रमुख मुद्दे
कैराना पलायन प्रकरण - कैराना में 2014 में रंगदारी न देने पर व्यापारी शिवकुमार, विनोद और राजेंद्र की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद भी व्यापारियों से रंगदारी मांगने के मामले होते रहे। वहीं, कश्यप समाज के लोगों के साथ कई संगीन वारदातें हुईं, जिसके बाद जून 2016 में ही भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कैराना पलायन प्रकरण उठाया। मामला देशभर में सुर्खियां बना, जिसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर भी दिखाई दे सकता है।
विकास में पिछड़ापन
कैराना विधानसभा क्षेत्र देहात से घिरा हुआ है। ऊन क्षेत्र से लेकर कैराना के आसपास के गांवों में विकास के नाम पर खास कार्य नहीं हुए। बिडौली से चौसाना मार्ग की हालत वर्षों से खराब है। शिक्षा का स्तर भी नहीं सुधरा। ऐसे उपक्रम भी नहीं लगे, जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होते। लिहाजा यह विकास में पिछड़ना भी चुनावी मुद्दा बन सकता है।
गन्ना मूल्य
ऊन शुगर मिल ने किसानों को बकाया गन्ना मूल्य देने में बेहद परेशान किया। ऊन क्षेत्र के किसानों को 60 दिन तक शुगर मिल पर धरना तक देना पड़ा, उसके बावजूद भुगतान में गंभीरता नहीं दिखाई गई। आगामी चुनाव में क्षेत्र के किसान गन्ना मूल्य को भी मुद्दा बना सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं
बुखार और हेपेटाइटिस सी का प्रकोप कैराना क्षेत्र के गांव अलीपुर और मन्ना माजरा के लोगों ने झेला। लोगों को शुद्ध पेयजल आपूर्ति भी नहीं मिलती, तो स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हैं। सरकारी अस्पतालों से मरीजों को मायूसी मिलती है। आगामी विधानसभा चुनाव में खराब स्वास्थ्य सेवा भी मुद्दा बन सकती है।
विज्ञापन
इसके अलावा झिंझाना से भी एक मुस्लिम चेहरा चुनाव में उतारा गया था। मुस्लिम वोटरों में बिखराव होना ही हाजी अनवर हसन की हार का कारण बना था। वहीं, 2014 के उपचुनाव में कैराना सीट पर सपा के नाहिद हसन जीते थे, तब कांग्रेस से मुस्लिम चेहरा होने के बावजूद वह मुस्लिम वोटरों में अपेक्षित बंटवारा नहीं कर पाया था, जिसका फायदा नाहिद हसन को मिल गया था। अब देखना यह है कि आगामी चुनाव में कैराना सीट किसकी झोली में जाती है और किन मुद्दों पर चुनाव होता है।
विज्ञापन
चुनावी बिसात पर राजनीति की गोटियां बिछ चुकी हैं। कैराना सीट पर बसपा और सपा ने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, लेकिन रालोद, कांग्रेस और भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बीते पांच साल के दौरान कैराना सिसकता रहा। कभी रंगदारी की धमकी, तो कभी व्यापारियों की हत्या हुई, वहीं कैराना पलायन प्रकरण भी उठा। हो हल्ला खूब हुआ, मगर जनता की नजरों को विकास का उजियारा देखने को नहीं मिला। विकास के नाम पर क्षेत्र पिछड़ा रहा, सड़कों की हालत सुधर नहीं सकी। मुद्दे बहुतेरे हैं, जो कैराना के जेहन में छिपे हैं। विधानसभा चुनाव में मुस्लिम, गुर्जरों के अलावा कश्यप और जाट वोटरों की संख्या नतीजों को प्रभावित करने वाली होगी।
विज्ञापन
भाजपा का शुुरू से ही प्रयास रहा कि कैराना सीट पर गुर्जर, कश्यप और जाटों का समर्थन लेकर जीत दर्ज की जाए, लेकिन बसपा ने कश्यप बिरादरी से दिवाकर देशवाल को प्रत्याशी बनाकर भाजपा की राह में कांटे बो दिए हैं। वहीं, रालोद ने अभी प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। यदि रालोद से जाट बिरादरी का प्रत्याशी घोषित होता है, तो वह भी भाजपा के लिए परेशानी पैदा करेगा।
आंकड़ों की जुबानी
कैराना सीट पर महिला कुल दो लाख 99 हजार 980 मतदाता हैं, जिनमें एक लाख 36 हजार 487 महिलाएं और एक लाख 63 हजार 493 पुरुष हैं। अनुमानित जातिगत आंकड़ों पर गौर करें, तो 51.95 प्रतिशत सामान्य वोटर हैं, 42.18 प्रतिशत (करीब एक लाख 24 हजार) मुस्लिम, 11 प्रतिशत हिंदू गुर्जर (32 हजार), 11.65 प्रतिशत कश्यप (34 हजार), 12.15 प्रतिशत एससी (35 हजार), करीब 30 हजार जाट और 3.5 प्रतिशत ब्राह्मण (10 हजार) वोटर हैं।
यह हो सकते हैं प्रमुख मुद्दे
कैराना पलायन प्रकरण - कैराना में 2014 में रंगदारी न देने पर व्यापारी शिवकुमार, विनोद और राजेंद्र की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद भी व्यापारियों से रंगदारी मांगने के मामले होते रहे। वहीं, कश्यप समाज के लोगों के साथ कई संगीन वारदातें हुईं, जिसके बाद जून 2016 में ही भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कैराना पलायन प्रकरण उठाया। मामला देशभर में सुर्खियां बना, जिसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर भी दिखाई दे सकता है।
विकास में पिछड़ापन
कैराना विधानसभा क्षेत्र देहात से घिरा हुआ है। ऊन क्षेत्र से लेकर कैराना के आसपास के गांवों में विकास के नाम पर खास कार्य नहीं हुए। बिडौली से चौसाना मार्ग की हालत वर्षों से खराब है। शिक्षा का स्तर भी नहीं सुधरा। ऐसे उपक्रम भी नहीं लगे, जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होते। लिहाजा यह विकास में पिछड़ना भी चुनावी मुद्दा बन सकता है।
गन्ना मूल्य
ऊन शुगर मिल ने किसानों को बकाया गन्ना मूल्य देने में बेहद परेशान किया। ऊन क्षेत्र के किसानों को 60 दिन तक शुगर मिल पर धरना तक देना पड़ा, उसके बावजूद भुगतान में गंभीरता नहीं दिखाई गई। आगामी चुनाव में क्षेत्र के किसान गन्ना मूल्य को भी मुद्दा बना सकते हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं
बुखार और हेपेटाइटिस सी का प्रकोप कैराना क्षेत्र के गांव अलीपुर और मन्ना माजरा के लोगों ने झेला। लोगों को शुद्ध पेयजल आपूर्ति भी नहीं मिलती, तो स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हैं। सरकारी अस्पतालों से मरीजों को मायूसी मिलती है। आगामी विधानसभा चुनाव में खराब स्वास्थ्य सेवा भी मुद्दा बन सकती है।