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सूत कताई की विरासत संभालें हैं कई महिलाएं

Wed, 07 Oct 2020 12:30 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2020 12:30 AM IST
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Many women have handled the legacy of yarn spinning
चौसाना में चरखे से सूत कातती वृद्व महिला - फोटो : SHAMLI
सूत कताई की विरासत संभाले हैं कई महिलाएं
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शामली/चौसाना। जिले में भले ही कपास की खेती नहीं होती, लेकिन सूत कताई की परंपरा अभी जिंदा है। चौसाना क्षेत्र के गांव खोड़समा में कुछ बुजुर्ग महिलाएं चरखा चलाकर सूत कातती हैं, तो शामली के नजदीक गांव कंडेला में 60 से ज्यादा महिलाएं एक संस्था के लिए चरखा चलाती हैं। इन महिलाओं के लिए चरखे से सूत कातना परंपरा के साथ ही आत्मनिर्भर होने का माध्यम है।
कभी ग्राम निर्माण मंडल, खादी ग्रामोद्योग समितियों के द्वारा गांव-गांव महिलाओं को जोड़कर सूत की कताई कराई जाती थी, लेकिन अब यह परंपरा सिमट गई है। इसका एक कारण क्षेत्र में कपास की उपलब्धता नहीं होना भी है। वर्तमान में बहुत कम महिलाएं ऐसी हैं जो चरखा चलाती हैं। इनमें चौसाना क्षेत्र के गांव खोड़समा की 80 वर्षीया अब्दुल्ली भी है। वे बताती हैं कि करीब 15 वर्ष की आयु में उनकी शादी खोड़समा में हुई थी। परिवार पर कम जमीन होने व घर की जरूरतें पूरी नहीं होने के कारण खादी ग्रामोद्योग द्वारा खोले गए केंद्रों के माध्यम से चरखा कातना सीखा था।
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अब्दुल्ली बताती है कि पुराने समय से 250-500 तक की मासिक आय हो जाती थी, जिससे परिवार का भरण पोषण हो जाता था। आज भी लोग उनके पास सूत कतवाने के लिए आते हैं। चरखा कातने का हुनर आज भी अब्दुल्ली की आय का साधन है। उधर, गांव कंडेला में 60 से ज्यादा महिलाएं चरखा चलाकर सूत तैयार करती हैं। ये महिलाएं एक निजी संस्था के लिए सूत कातती हैं। कपास, चरखा व अन्य साधन महिलाओं को संस्था ही उपलब्ध कराती है। सूत बनाने वाली सावित्री, पदमा, कैलाशो, शिक्षा, चंद्रो, शोषण, बीरमती, कृष्णा, मुनेश आदि ने बताया कि उन्हें प्रति किलो सूत कातने पर 200 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा बोनस भी दिया जाता है। गांव की महिलाओं को इससे रोजगार मिल रहा है।
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नई पीढ़ी को नहीं आता चरखा चलाना
गांव खोड़समा निवासी चंद्रो देवी का कहना है कि उम्र अधिक होने के कारण आंखों की रोशनी कम हो गई है। जिसके कारण चरखा चलाने में असमर्थ हो गई हूं। अब चरखा उठाकर रख दिया है। नई पीढ़ी की महिलाएं तो चरखा चलाना जानती भी नहीं हैं। गांव की ही ब्रह्म कौर उर्फ ब्रह्मी की उम्र करीब 90 वर्ष है। शादी के बाद से ही चरखा चलाकर सूत कातती रहीं, लेकिन अब उम्र अधिक होने के कारण काम नहीं कर पातीं। वह बताती हैं कि अपने घर में प्रयोग के लिए खेस, दरी जैसे कपड़ों की पूर्ति घर पर सूत कातकर ही कर लेती थी। बुनकर को सूत दे दिया जाता है, जिससे वह कपड़ा बुनकर ला देता था। पुराने समय में घर की जरूरतें इसी तरह पूरी की जाती थी।

शामली क्षेत्र के गांव कंडेला में सूत तैयार करती महिलाएं

शामली क्षेत्र के गांव कंडेला में सूत तैयार करती महिलाएं- फोटो : SHAMLI

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