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गुड़ मंडी को 50 दिन में 30 करोड़ का घाटा
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Thu, 29 Dec 2016 12:36 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। नोटबंदी को 50 दिन होने वाले हैं। हर कारोबारी इससे प्रभावित हुआ। कारोबार घट गए और बेरोजगारी की समस्या पैदा हो गई। गुड़ कारोबार भी इससे अछूता नहीं। गुड़ कारोबारी और कोल्हू संचालक कैशलेस नहीं हो पाए। किसी भी कारोबारी के पास स्वेप मशीन नहीं लगी, तो पेटीएम से भुगतान करना भी शुरू नहीं हुआ। नोटबंदी के बाद से करीब 30 करोड़ का घाटा हुआ है।
अक्तूबर माह से गुड़ कारोबार शुरू हो जाता है, कोल्हू चलने लगते हैं और मंडी में गुड़-शक्कर की आवक शुरू हो जाती है। इस बीच आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और एक हजार रुपये के पुराने नोट बंद करने का फैसला सुनाया, जिसके बाद गुड़ कारोबार लुढ़कना शुरू हो गया। जब तक पुराने नोट चले, तब तक स्थिति कुछ सामान्य रही, मगर उसके बाद जैसे ही कैश की किल्लत शुरू हुई, तो कारोबार धड़ाम होने लगा।
गुड़ कारोबारियों के मुताबिक गुड़ के सीजन में प्रतिदिन करीब एक करोड़ रुपये के गुड़ की खरीद फरोख्त होती थी, लेकिन नोटबंदी के बाद घटकर महज 50 लाख रुपये प्रतिदिन तक हो गई है।
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शामली की गुड़ मंडी में करीब 40 फर्म रजिस्टर्ड हैं। अधिकांश गुड़ आढ़तियों के यहां सूनापन रहता है। पहले पांच से छह ट्रैक्टर ट्रॉली गुड़ और शक्कर की आवक होती थी और उसी अनुपात में गुड़ सप्लाई होता था, मगर अब दो से तीन ट्रैक्टर ट्रॉली ही पहुंच रही हैं। नोटबंदी के बाद अब तक गुड़ कारोबार को करीब 30 करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। आगे कितने दिनों में स्थिति सामान्य होगी, इसका भी कोई भरोसा नहीं है।
बैंकों में कैश नहीं, कोल्हु वालों को कहां से दें पैसा
मंडी व्यापार मंडल के अध्यक्ष राजेश संगल का कहना है कि कारोबार 30 प्रतिशत रह गया है। बैंक से प्रतिदिन 50 हजार रुपये निकल नहीं पा रहे। कोल्हू संचालक कैश में ही भुगतान मांगते हैं। इस कारण कैशलेस व्यवस्था लागू नहीं हो पा रही है।
दिनभर में दो या चार लोग ही चेक से पेमेंट लेते हैं। पवन कुमार संगल का कहना है कि पूर्व में कोल्हू संचालक शामली मंडी में ही गुड़ और शक्कर लाकर बेचते थे। अब हालत यह है कि गुजरात तथा दूर के राज्यों में तो गुड़ शक्कर की सप्लाई हो रही है, लेकिन हरियाणा और पंजाब के व्यापारियों से कोल्हू संचालकों ने सीधे संपर्क कर लिया है। नोटबंदी के कारण कारोबार 40 प्रतिशत तक रह गया है। राजीव कुमार संगल का कहना है कि कारोबार 30 से 40 प्रतिशत ही रह गया है। गुड़ का दाम तीन हजार रुपये कुंतल और शक्कर 3100 से 3200 रुपये प्रति कुंतल है, इसके बावजूद कारोबार कम हो गया है।
इन हालातों में नहीं कर पाएंगे काम
सहरसा बिहार के रहने वाले शंकर, लालो और पिन्टू का कहना है कि पहले वह प्रतिदिन 300 से 400 रुपये मजदूरी कमा लेते थे। गुड़ कम आ रहा है, जिस कारण उन्हें काम भी कम मिल रहा है। अब 150 रुपये प्रतिदिन ही मजदूरी कमा पा रहे हैं। हमारे बैंक अकाउंट भी नहीं हैं। ऐसे हालत में हम काम नहीं कर पाएंगे, क्योंकि परिवार का पालन पोषण भी करना मुश्किल हो जाएगा। यही हाल रहा, तो घर लौटना पड़ेगा। वहीं, हरियाणा के महेंद्रगढ़ निवासी हरिराम और मूलिया का कहना है कि उनकी तीन पीढ़ी पल्लेदारी का काम कर रही हैं।
पल्लेदारों के पेट पर भी पड़ी मार
गुड़ मंडी में हरियाणा, राजस्थान, बिहार सहित अन्य प्रदेशों से मजदूर आकर पल्लेदारी का कार्य करते हैं। पल्लेदारों को प्रति कुंतल गुड़ और शक्कर की भराई के छह रुपये और बोरियों की सिलाई तथा पेटी बांधने के बाद उनको ट्रक में लदान करने पर चार रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से कुल 10 रुपये प्रति कुंतल मजदूरी मिलती है। गुड़ की आवक घटने के कारण उनकी मजदूरी भी घट गई है। स्थिति यह है कि अब पल्लेदारों को प्रतिदिन 150 रुपये की मजदूरी पर ही गुजारा करना पड़ रहा है।
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अक्तूबर माह से गुड़ कारोबार शुरू हो जाता है, कोल्हू चलने लगते हैं और मंडी में गुड़-शक्कर की आवक शुरू हो जाती है। इस बीच आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और एक हजार रुपये के पुराने नोट बंद करने का फैसला सुनाया, जिसके बाद गुड़ कारोबार लुढ़कना शुरू हो गया। जब तक पुराने नोट चले, तब तक स्थिति कुछ सामान्य रही, मगर उसके बाद जैसे ही कैश की किल्लत शुरू हुई, तो कारोबार धड़ाम होने लगा।
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गुड़ कारोबारियों के मुताबिक गुड़ के सीजन में प्रतिदिन करीब एक करोड़ रुपये के गुड़ की खरीद फरोख्त होती थी, लेकिन नोटबंदी के बाद घटकर महज 50 लाख रुपये प्रतिदिन तक हो गई है।
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शामली की गुड़ मंडी में करीब 40 फर्म रजिस्टर्ड हैं। अधिकांश गुड़ आढ़तियों के यहां सूनापन रहता है। पहले पांच से छह ट्रैक्टर ट्रॉली गुड़ और शक्कर की आवक होती थी और उसी अनुपात में गुड़ सप्लाई होता था, मगर अब दो से तीन ट्रैक्टर ट्रॉली ही पहुंच रही हैं। नोटबंदी के बाद अब तक गुड़ कारोबार को करीब 30 करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। आगे कितने दिनों में स्थिति सामान्य होगी, इसका भी कोई भरोसा नहीं है।
बैंकों में कैश नहीं, कोल्हु वालों को कहां से दें पैसा
मंडी व्यापार मंडल के अध्यक्ष राजेश संगल का कहना है कि कारोबार 30 प्रतिशत रह गया है। बैंक से प्रतिदिन 50 हजार रुपये निकल नहीं पा रहे। कोल्हू संचालक कैश में ही भुगतान मांगते हैं। इस कारण कैशलेस व्यवस्था लागू नहीं हो पा रही है।
दिनभर में दो या चार लोग ही चेक से पेमेंट लेते हैं। पवन कुमार संगल का कहना है कि पूर्व में कोल्हू संचालक शामली मंडी में ही गुड़ और शक्कर लाकर बेचते थे। अब हालत यह है कि गुजरात तथा दूर के राज्यों में तो गुड़ शक्कर की सप्लाई हो रही है, लेकिन हरियाणा और पंजाब के व्यापारियों से कोल्हू संचालकों ने सीधे संपर्क कर लिया है। नोटबंदी के कारण कारोबार 40 प्रतिशत तक रह गया है। राजीव कुमार संगल का कहना है कि कारोबार 30 से 40 प्रतिशत ही रह गया है। गुड़ का दाम तीन हजार रुपये कुंतल और शक्कर 3100 से 3200 रुपये प्रति कुंतल है, इसके बावजूद कारोबार कम हो गया है।
इन हालातों में नहीं कर पाएंगे काम
सहरसा बिहार के रहने वाले शंकर, लालो और पिन्टू का कहना है कि पहले वह प्रतिदिन 300 से 400 रुपये मजदूरी कमा लेते थे। गुड़ कम आ रहा है, जिस कारण उन्हें काम भी कम मिल रहा है। अब 150 रुपये प्रतिदिन ही मजदूरी कमा पा रहे हैं। हमारे बैंक अकाउंट भी नहीं हैं। ऐसे हालत में हम काम नहीं कर पाएंगे, क्योंकि परिवार का पालन पोषण भी करना मुश्किल हो जाएगा। यही हाल रहा, तो घर लौटना पड़ेगा। वहीं, हरियाणा के महेंद्रगढ़ निवासी हरिराम और मूलिया का कहना है कि उनकी तीन पीढ़ी पल्लेदारी का काम कर रही हैं।
पल्लेदारों के पेट पर भी पड़ी मार
गुड़ मंडी में हरियाणा, राजस्थान, बिहार सहित अन्य प्रदेशों से मजदूर आकर पल्लेदारी का कार्य करते हैं। पल्लेदारों को प्रति कुंतल गुड़ और शक्कर की भराई के छह रुपये और बोरियों की सिलाई तथा पेटी बांधने के बाद उनको ट्रक में लदान करने पर चार रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से कुल 10 रुपये प्रति कुंतल मजदूरी मिलती है। गुड़ की आवक घटने के कारण उनकी मजदूरी भी घट गई है। स्थिति यह है कि अब पल्लेदारों को प्रतिदिन 150 रुपये की मजदूरी पर ही गुजारा करना पड़ रहा है।