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खास रिपोर्ट: खाप की ‘खाद’ से मजबूत हुईं किसान आंदोलन की जड़ें, पढ़िए भाजपा नेताओं पर गुजरी आपबीती की कहानी

Sat, 20 Nov 2021 01:19 AM IST
कपिल kapil गौरव त्यागी, अमर उजाला, शामली
गौरव त्यागी, अमर उजाला, शामली Published by: कपिल kapil Updated Sat, 20 Nov 2021 01:19 AM IST
सार

कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से चल रहे आंदोलन में किसानों को खाप चौधरियों का भी पूरा सहयोग मिला है। वहीं खापों के रुख को देखते हुए उन्हें भीतर ही भीतर आगामी विधानसभा चुनावों में नुकसान का डर सताने लगा था।

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Amar Ujala Special Report: Khap Choudhary has full cooperation in the farmers movement
खाप चौधरी के दो बड़े नेता। - फोटो : amar ujala

विस्तार

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को खापों का भी भरपूर साथ मिला। भाजपा नेता भले ही इसे खुलकर स्वीकार न करें, लेकिन खापों के रुख को देखते हुए उन्हें भीतर ही भीतर आगामी विधानसभा चुनावों में नुकसान का डर सताने लगा था। सभी खाप चौधरी शुरू से ही तीनों कृषि बिलों के विरोध में लामबंद हो गए थे। 27 जनवरी को खत्म होते आंदोलन को खाप की ‘खाद’ मिली तो आंदोलन की जड़ें और अधिक मजबूत होती चली गईं।

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कृषि कानूनों और एमएसपी पर कानून बनाने और महंगी बिजली के मुद्दे पर खापों ने सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर की थी। खापों ने आंदोलन में भीड़ जुटाने और आंदोलनकारियों के भोजन समेत अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी उठाई। गांवों में आंदोलन के लिए बड़ा समर्थन भी खापों ने ही जुटाया। केंद्रीय नेतृत्व के आदेश पर कृषि कानूनों के फायदे समझाने के लिए किसानों के बीच पहुंचे केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान व भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष मोहित बेनीवाल समेत अन्य नेताओं को शामली में विरोध का सामना करना पड़ा था। 
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लगभग सभी खाप चौधरियों ने उनसे मिलने से ही मना कर दिया था। गठवाला खाप के चौधरी बाबा हरिकिशन मलिक ने उनसे मुलाकात की थी, लेकिन उन्होंने भी कृषि कानूनों को लेकर अपनी नाराजगी साफ तौर पर जाहिर कर दी थी। इसके अलावा जिले में भाजपा नेताओं के कार्यक्रमों को लेकर भी विरोध के स्वर उठने लगे थे। कई गांवों में भाजपा नेताओं के बहिष्कार के पोस्टर भी लगा दिए गए थे। इससे भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों में कृषि कानूनों को लेकर गुस्से का अहसास हो गया था।
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कानूनों के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में रहे गठवाला खाप चौधरी 
गठवाला खाप चौधरी बाबा राजेंद्र सिंह मलिक कृषि कानूनों के खिलाफ रहे, लेकिन भाजपा के पक्ष में भी खड़े दिखाई दिए। हालांकि शुरुआत में उन्होंने आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। 26 जनवरी की घटना के बाद उन्होंने आंदोलन से किनारा कर लिया था। इसके बाद उन्होंने पांच सितंबर को संयुक्त किसान मोर्चा की मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में भी हिस्सा नहीं लिया था। जिसके बाद गठवाला खाप में भी विरोध के स्वर मुखर हो गए थे। बहावड़ी थांबेदार ने खाप के लोगों से एकजुट होकर मुजफ्फरनगर की महापंचायत में चलने का आह्वान किया था। गठवाला खाप की बदौलत महापंचायत में अच्छी-खासी भीड़ जुटी थी। इसके बाद में बाबा राजेंद्र सिंह मलिक ने 26 सितंबर को हिंद मजदूर किसान समिति के साथ महापंचायत की थी। लेकिन यह महापंचायत इतना असर नहीं छोड़ पाई थी। 

किसानों की हुई जीत : बाबा राजेंद्र मलिक 
कृषि बिलों की वापसी पर गठवाला खाप चौधरी बाबा राजेंद्र मलिक का कहना है कि यह किसानों की जीत है। जो लोग आंदोलन में शामिल थे, उन सभी की जीत है। अब सरकार को एमएसपी और महंगी बिजली की मांग पर भी विचार करना चाहिए। 

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देर आए, दुरुस्त आए : बाबा श्याम सिंह 
बहावड़ी थांबेदार बाबा श्याम सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री का फैसला स्वागत योग्य है। देर आए, दुरुस्त आए। लेकिन जब तक संसद में कानून वापसी नहीं होंगे, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। किसानों की बाकी मांगों पर भी सरकार को बात करनी होगी। कानून वापसी से भाजपा को चुनाव में कुछ फायदा जरूर पहुंचेगा।

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