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सती मंदिर में 40 दिन पूजा अर्चना करने से होती है मनोकामना पूरी
Updated Thu, 21 Sep 2017 12:48 AM IST
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शामली।
शहर के ब्लाक रोड स्थित मराठा काल में बने सती मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। श्रद्धालु यहां नित्य प्रतिदिन पूजा करते हैं। वहीं, नवरात्रों का प्रथम दिन शैलपुत्री अर्थात मां सती से होता है, जिसके चलते सती मंदिर में पूजन का विशेष महत्व माना गया है।
मान्यता है कि यहां अनवरत 40 दिन तक पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होती हैं। मंदिर में नवरात्र के दौरान नौ दिन दुर्गा सप्तशती पाठ और कीर्तन होते हैं। मंदिर परिसर में मां सती की प्रतिमा के साथ ही शिव पार्वती और हनुमान मंदिर भी स्थापित है। मंदिर के पुजारी छोटे लाल बताते हैं कि सैकड़ों साल पूर्व सती प्रथा के समय एक महिला यहां सती हुई थी। जिसकी आज भी समाधि है। समाधि के पास ही पत्थर लगा हुआ है, किंतु उसकी भाषा को पढ़ा नहीं जा सकता। सती हुई महिला का नाम भी कोई नहीं जानता है।
मराठा काल में बनी थी सुरंग
सती मंदिर समिति के अध्यक्ष सुनील गोयल का कहना है कि मंदिर के पास एक सुरंग थी, जो शहर के सभी दिशाओं के सिद्धपीठ शिव मंदिरों को जोड़ती थी। मराठा काल के दौरान मंदिरों को आपस में जोड़ने के लिए सुरंग निर्मित की गई थी। मंदिर का पुनर्निर्माण शहर के मोहल्ला धर्मपुरा निवासी आत्माराम के पूर्वज तेजा गर्ग ने कराया था।
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शहर के ब्लाक रोड स्थित मराठा काल में बने सती मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। श्रद्धालु यहां नित्य प्रतिदिन पूजा करते हैं। वहीं, नवरात्रों का प्रथम दिन शैलपुत्री अर्थात मां सती से होता है, जिसके चलते सती मंदिर में पूजन का विशेष महत्व माना गया है।
मान्यता है कि यहां अनवरत 40 दिन तक पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होती हैं। मंदिर में नवरात्र के दौरान नौ दिन दुर्गा सप्तशती पाठ और कीर्तन होते हैं। मंदिर परिसर में मां सती की प्रतिमा के साथ ही शिव पार्वती और हनुमान मंदिर भी स्थापित है। मंदिर के पुजारी छोटे लाल बताते हैं कि सैकड़ों साल पूर्व सती प्रथा के समय एक महिला यहां सती हुई थी। जिसकी आज भी समाधि है। समाधि के पास ही पत्थर लगा हुआ है, किंतु उसकी भाषा को पढ़ा नहीं जा सकता। सती हुई महिला का नाम भी कोई नहीं जानता है।
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मराठा काल में बनी थी सुरंग
सती मंदिर समिति के अध्यक्ष सुनील गोयल का कहना है कि मंदिर के पास एक सुरंग थी, जो शहर के सभी दिशाओं के सिद्धपीठ शिव मंदिरों को जोड़ती थी। मराठा काल के दौरान मंदिरों को आपस में जोड़ने के लिए सुरंग निर्मित की गई थी। मंदिर का पुनर्निर्माण शहर के मोहल्ला धर्मपुरा निवासी आत्माराम के पूर्वज तेजा गर्ग ने कराया था।
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