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विश्व वाइल्डलाइफ दिवस: जंगल में दखलंदाजी से आबादी में आ रहे वन्यजीव

Thu, 03 Mar 2022 11:31 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 03 Mar 2022 11:31 PM IST
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Wildlife Day:Wildlife coming into the population due to forest interference
डीएफओ आदर्श कुमार । - फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। आबादी वाले इलाकों में वन्यजीवों की गतिविधियां बढ़ी हैं। वन विभाग का मानना है कि इसका कारण वन क्षेत्र में इंसानी आबादी का बढ़ता दखल है। जिले में हालांकि बड़े वन्यजीव नहीं हैं, लेकिन कभी-कभी भटककर आबादी क्षेत्र में आ जाते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक जंगल किनारे खेती, हाईवे पर स्थित जंगल से सटे गांवों में प्लॉटिंग और संरक्षित वन्यजीवों की संख्या बढ़ना आदि मानव-वन्यजीव संघर्ष के मुख्य कारक बनते जा रहे हैं।
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कभी कभार वन्यजीव आपसी संघर्ष के चलते भी सुरक्षित स्थान की तलाश में रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं। चूंकि जानवर काफी घबराया हुआ होता है, इसलिए वो मानव पर हमला कर देता है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा माना गया है कि टाइगर और लैपर्ड गन्ने के खेत एवं नदी के आसपास के क्षेत्र को जंगल का ही इलाका समझते हैं।
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आबादी वाला इलाका होने की वजह से यहां उन्हें शिकार के लिए मवेशी भी आसानी से मिल जाते हैं, इसीलिए यह जानवर यहां अपना ठिकाना बना लेते हैं। डीएफओ आदर्श कुमार के मुताबिक जनपद की खुटार रेंज के जंगल का इलाका दुधवा टाइगर रिजर्व एवं पीलीभीत टाइगर रिजर्व की सीमा से मिलता है। इसी के चलते आपसी संघर्ष या शिकार की तलाश में वन्य जीव यहां चले आते हैं। उन्होंने बताया कि जनपद के जंगलों में टाइगर नहीं है। पांच या छह लैपर्ड, काले हिरण, मगरमच्छ एवं हॉग डियर हैं। संवाद
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हाल में दिखे बड़े वन्यजीव
19 जनवरी 2021 को जनपद की तिलहर रेंज के गांव नगला इब्राहिम में बाघ के पद चिह्न देखे गए थे। वन विभाग ने पद चिह्न देखकर वयस्क बाघ होने की पुष्टि की थी। इसी गांव के आसपास के इलाके में कई बार बाघ को देखा जाता रहा। 16 जून को अंतिम बार उसके पद चिह्न में देखे गए। छह अगस्त तक वन विभाग ने इलाके में नजर बनाए रखी। इसके बाद बाघ नहीं दिखाई दिया।
बाघ पीलीभीत टाइगर रिजर्व से लगभग 40 किमी की दूरी तय करके आया था। लगभग छह माह तक यहां प्रवास करने के बाद वापस चला गया। खुटार रेंज के गांव छापा बोझी, सिंधौली रेंज के गांव महाऊ दुर्ग, सदर रेंज में दो स्थानों कैंट एवं गांव घुसगवां में तेंदुए को देखा गया। हालांकि इन शिकारी जानवरों ने इंसानों पर तो हमला नहीं किया, पर मवेशियों को निवाला जरूर बनाया था।
वन्यजीव देखकर घबराएं नहीं
डीएफओ आदर्श कुमार ने बताया कि वन्य जीव घनी झाड़ियों, नदियों के किनारे एवं गन्ने के खेत में अपना ठिकाना बना लेते हैं। ऐसे में इन्हें देखकर घबराए नहीं। वन्य जीव को देखने के बाद तत्काल इसकी सूचना वन विभाग को दें, ताकि पद चिह्न देखकर उसकी सही पुष्टि की जा सके। मवेशियों को न चराएं, रात को घरों से बाहर न निकलें, आवश्यक कार्य के लिए जाने पर झुंड बनाकर जाएं, जंगल में न जाएं। कोशिश करें कि वन्यजीव जिस स्थान पर मौजूद है, वहां शोर-शराबा न करें और उसे स्वयं वापस जाने का मौका दें।
वन्य जीवों की हत्या या उन्हें चोट पहुंचाने पर यह कार्रवाई
डीएफओ के मुताबिक बाघ और तेंदुआ संरक्षित प्रजाति के वन्य जीव हैं। इनकी हत्या या उन्हें चोट पहुंचाना कानूनन अपराध है। यदि किसी व्यक्ति के द्वारा ऐसा किया जाता है तो भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 9 व 51 के तहत केस दर्ज किया जाता है। तत्काल गिरफ्तारी और आरोपी को तीन वर्ष की सजा और जुर्माने से दंडित करने का प्रावधान है।
वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रयास कर रहा वन विभाग
कछुआ संरक्षण के लिए जलालाबाद रेंज के गांव गोरा रायपुर में हैचरी की स्थापना की गई। यहां अंडों से शिशु कछुआ के निकलने के बाद वन विभाग के सदर रेंज कार्यालय में बने शिशु कछुआ पालना केंद्र में विकसित होने तक रखा जाता है। फिर रामगंगा नदी में छुड़वा दिया जाता है। सारस संरक्षण के लिए किसानों को जागरूक किया।
हाल ही में हुई गणना के अनुसार जनपद में सारस की संख्या 1500 है। जो कि पिछली बार से 200 अधिक है। इसी वर्ष जनवरी से अब तक रसेल वाइपर, अजगर, कोबरा जैसे करीब 15 सरीसृपों को जंगल में छुड़वाया गया। करीब 40 घायल बंदरों को विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई सूचनाओं के आधार पर संरक्षण में लेकर इलाज कराने के उपरांत प्राकृतिक वास में छोड़ा गया। समय-समय पर जंगल किनारे बसे गांवों में डॉक्यूमेंट्री के जरिये वन्यजीवों के प्रति जागरूकता लाने का काम किया जाता है।

जंगल किनारे खेती एवं जमीन को आवासीय प्लॉट के रूप में इस्तेमाल किए जाने से वन्यजीवों का प्रवास घटा है। सरकार द्वारा घोषित की गई भूमि ही जंगल नहीं है। उसके आसपास का इलाका भी जहां नदियां हैं, वह भी वन्यजीवों के लिए ही है। जंगलों और उसके आसपास के इलाके से दूर रहना चाहिए। कोई भी वन्यजीव अकारण ही हमला नहीं करता है। खतरा महसूस होने या फिर परेशान किए जाने की दशा में ही मानव पर हमला करता है। ऐसे में उनके प्राकृतिक वास के साथ छेड़छाड़ करना उचित नहीं है। जंगल में दखलअंदाजी ही वन्यजीवों को रिहायशी इलाकों में आने के लिए आमंत्रित करती है।
- आदर्श कुमार, डीएफओ, शाहजहांपुर।
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