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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Shahjahanpur News ›   The doors of Siddha Devi Temple in Kurriyakalan will remain open for three days from today.

Shahjahanpur News: कुर्रियाकलां में सिद्ध देवी मंदिर के कपाट आज से तीन दिन खुले रहेंगे

Thu, 02 Oct 2025 01:08 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 02 Oct 2025 01:08 AM IST
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The doors of Siddha Devi Temple in Kurriyakalan will remain open for three days from today.
कुर्रियाकलां स्थित देवी मंदिर। संवाद
कुर्रियाकलां। गांव में ऐतिहासिक सिद्ध देवी मंदिर के कपाट हर वर्ष की भांति इस बार भी नवरात्र व्रत पारायण होने के बाद बृहस्पतिवार को ब्रह्म मुहूर्त में प्रात: चार बजे दर्शन-पूजन के लिए खुल जाएंगे। परंपरा के अनुसार, माता सिद्ध देवी मात्र तीन दिन ही भक्तों को दर्शन देंगी। शनिवार चार अक्तूबर को द्वादशी तिथि पर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे, जो छह माह बाद चैत्र नवरात्र में खुलेंगे।
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तंत्र विद्या पर आधारित सिद्ध देवी मंदिर का इतिहास करीब 500 वर्ष पुराना है। वास्तु की दृष्टि से मंदिर के आधार की बनावट लखीमपुर खीरी के ओयल में स्थित मेढक मंदिर जैसी है। देवी मंदिर की नींव के नीचे की आकृति भी कच्छप की तरह बनी हुई है।
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मंदिर में स्थापित भगवान शंकर की मूर्ति वर्तमान पुजारी गुरुदेव प्रसाद दीक्षित के पूर्वज पंडित सहतावन लाल को ओयल रियासत के तत्कालीन राजा ने भेंट की थीं। पंडित सहतावन लाल तंत्र शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे और उनकी विद्वता से प्रभावित होकर ओयल के राजा ने दोनों मूर्तियां उन्हें सौंप दी थीं।
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नवरात्र के बाद केवल तीन दिन इसलिए खुलता है मंदिर
सभी मंदिराें में गर्भ गृह के ऊपर गुंबद बनाए जाते हैं, लेकिन सिद्ध देवी मंदिर दूर से सामान्य घर जैसा लगता है। वहां काष्ठ से निर्मित अन्य कई मूर्तियां भी प्राण प्रतिष्ठित हैं। वर्ष के दोनों नवरात्र पर व्रत पारायण के बाद दशमी से द्वादशी की दोपहर तक मंदिर के कपाट खुलने के पीछे भी किंवदंती है।
वर्तमान पुजारी बताते हैं कि उनके पूर्वज सहतावन लाल ने कोलकाता से देवी जी समेत अन्य देवताओं की मूर्तियां लाए और उन्हें घर की कच्ची कोठरी में रख दिया। उन्होंने शुभ तिथि पर सभी मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कर मंदिर में विराजित करने की योजना बनाई, लेकिन उससे पहले शारदीय नवरात्र की दशमी को कोठरी के ताले और बंद कपाट स्वत: खुल गए और तीन दिन बाद द्वादशी को बंद भी हो गए।
यही अलौकिक प्रक्रिया चैत्र नवरात्र पारायण के बाद भी हुई। इसे देख पुजारी ने मूर्तियों को प्रतिष्ठित करने के लिए घर के उस हिस्से को ही मंदिर बना दिया। तभी से दोनों नवरात्र के बाद तीन दिन के लिए मंदिर को खोलने की परंपरा शुरू हुई।


माता रानी और अन्य देवताओं को कच्ची चीनी (बूरा) और साबुत सूखे गोले का प्रसाद अर्पित किया जाता हैं। बकरे की बलि केवल प्रतीकात्मक दी जाती है। साबुत गोला तलवार से काटकर माता को उसी की बलि चढ़ाने की प्रथा है। शेष बचा गोला प्रसाद रूप में लौटा दिया जाता है। -गुरुदेव प्रसाद दीक्षित, पुजारी, देवी मंदिर
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