{"_id":"63a20ea8927c3c078844dcbe","slug":"the-bugle-of-the-revolution-of-1857-was-blown-from-st-mary-s-church-shahjahanpur-news-bly5075771160","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shahjahanpur News: सेंट मेरी चर्च से फूंका गया था 1857 की क्रांति का बिगुल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shahjahanpur News: सेंट मेरी चर्च से फूंका गया था 1857 की क्रांति का बिगुल
विज्ञापन
शाहजहांपुर के कैंट क्षेत्र में स्थित सेंट मेरी चर्च
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। कैंट क्षेत्र में जीएफ कॉलेज के सामने सेंट मेरी चर्च है। यह 1857 की क्रांति का गवाह माना जाता है। खन्नौत की सुरम्य घाटी में बने इस चर्च को तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर विश्व के चर्चों में शामिल किया था। एसएस कॉलेज के प्रवक्ता विकास खुराना बताते हैं कि जीएफ कॉलेज की बाउंड्री तब नहीं थी और खन्नौत की घाटी यहां से सीधी परिलक्षित होती थी। इसके पास खरबूजे की खेती व्यापक थी। इस चर्च के निर्माण के लिए पहले प्रयास 1825 में हुए, जब कलकत्ता मिशनरी के बिशप हार्पर जनपद भ्रमण पर आए। तब यहां तैनात ब्रिटिश अधिकारियों, निवासियों ने उनसे चर्च के संबंध में वार्ता की।
1837 में चर्च बन कर तैयार हुआ। इसकी शैली गोथिक (अत्यंत विशाल वास्तु की इमारतें) और ऊंचाई साठ फुट है। चर्च अपने ऐतिहासिक घटनाक्रम, जिला मजिस्ट्रेट एम. रिकरेट, चैपलिन मकयूलियन की हत्या, मरियम की प्रेम कहानी तथा परा मनोवैज्ञानिक घटनाक्रम को लेकर पूरी दुनिया में छाया रहा है।
क्रांति के बाद चर्च अस्थायी रूप से बंद हो गया तथा 1860 में इसे पुन: खोला गया। अनेक यूरोपीय भारतीय लेखकों ने यहां का भ्रमण किया। विख्यात उपन्यासकार रॉस्किन बांड ने चर्च के घटनाक्रम पर ‘फ्लाइट ऑफ दि पिजन’ लिखा तथा इस पर श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘जुनून’ बनाई। रास्कीन बांड ने वर्ष 1960 में चर्च का भ्रमण किया था।
विज्ञापन
शहर के इतिहासकार नानक चंद्र मेहरोत्रा की पुस्तक के अनुसार, जीएफ कॉलेज के सामने बने इस चर्च का निर्माण 1837 में बरेली के चैपलिन ने कराया था। बताया जाता है कि वर्ष 1813-14 में जब शाहजहांपुर को नए जिले की मान्यता मिली, तब यहां कोई चर्च नहीं था। 31 मई, 1857 रविवार के दिन प्रार्थना के लिए चर्च में जुटे अंग्रेज अफसरों पर क्रांतिकारियों ने योजनाबद्ध तरीके से धावा बोल दिया था।
उस समय के कलक्टर और अंग्रेज अफसरों पर लाठियों और तलवारों से हमला किया था। इसमें तमाम अफसर हताहत हुए। विद्रोही कमरे का दरवाजा नहीं तोड़ पाए, लेकिन चर्च से बाहर निकलते ही चैपलिन, नगराधीश एम रिकेट बेस्ट्री, कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन जेम्स, जे. मैक्कलम, स्मिथ, सर्जन एचएच बाउलिंग आदि को मौत के घाट उतार दिया गया।
विज्ञापन
1837 में चर्च बन कर तैयार हुआ। इसकी शैली गोथिक (अत्यंत विशाल वास्तु की इमारतें) और ऊंचाई साठ फुट है। चर्च अपने ऐतिहासिक घटनाक्रम, जिला मजिस्ट्रेट एम. रिकरेट, चैपलिन मकयूलियन की हत्या, मरियम की प्रेम कहानी तथा परा मनोवैज्ञानिक घटनाक्रम को लेकर पूरी दुनिया में छाया रहा है।
विज्ञापन
क्रांति के बाद चर्च अस्थायी रूप से बंद हो गया तथा 1860 में इसे पुन: खोला गया। अनेक यूरोपीय भारतीय लेखकों ने यहां का भ्रमण किया। विख्यात उपन्यासकार रॉस्किन बांड ने चर्च के घटनाक्रम पर ‘फ्लाइट ऑफ दि पिजन’ लिखा तथा इस पर श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘जुनून’ बनाई। रास्कीन बांड ने वर्ष 1960 में चर्च का भ्रमण किया था।
विज्ञापन
शहर के इतिहासकार नानक चंद्र मेहरोत्रा की पुस्तक के अनुसार, जीएफ कॉलेज के सामने बने इस चर्च का निर्माण 1837 में बरेली के चैपलिन ने कराया था। बताया जाता है कि वर्ष 1813-14 में जब शाहजहांपुर को नए जिले की मान्यता मिली, तब यहां कोई चर्च नहीं था। 31 मई, 1857 रविवार के दिन प्रार्थना के लिए चर्च में जुटे अंग्रेज अफसरों पर क्रांतिकारियों ने योजनाबद्ध तरीके से धावा बोल दिया था।
उस समय के कलक्टर और अंग्रेज अफसरों पर लाठियों और तलवारों से हमला किया था। इसमें तमाम अफसर हताहत हुए। विद्रोही कमरे का दरवाजा नहीं तोड़ पाए, लेकिन चर्च से बाहर निकलते ही चैपलिन, नगराधीश एम रिकेट बेस्ट्री, कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन जेम्स, जे. मैक्कलम, स्मिथ, सर्जन एचएच बाउलिंग आदि को मौत के घाट उतार दिया गया।