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खेती में अव्वल पर दलहन उत्पादन में फिसड्डी
अमर उजाला ब्यूरो पुवायां।
Updated Mon, 27 Feb 2017 11:05 PM IST
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दलहन
- फोटो : अमर उजाला
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पुवायां में साठा पर जंग लेकिन दलहन नहीं करना चाहते किसान
पुवायां क्षेत्र खेती के मामले में प्रदेश भर में सिरमौर है, लेकिन दलहन की खेती के मामले में यह फिसड्डी है। यहां दलहन की खेती का नामोनिशान नहीं है। महंगाई और ज्यादा फायदे की फसलों की उपज के चलते किसान दलहन के बारे में सोचते तक नहीं हैं।
मिनी पंजाब कहा जाने वाला यह क्षेत्र दलहनी फसलों के उत्पादन में काफी पिछड़ गया है। सिंचाई के भरपूर साधन, किसी भी स्तर तक जाकर लागत लगाने वाले किसान, उर्वरा जमीन आदि के बावजूद दलहन का उत्पादन नहीं होने के पीछे ज्यादा उत्पादन कर अधिक रुपये बनाने की मंशा ही है। क्षेत्र में अब धान, गेहूं, गन्ना के अलावा आलू और सब्जी की मटर की खेती ही की जा रही है। कुछ बड़े किसान खरबूजा, खीरा आदि भी पैदा कर रहे हैं।
एक समय था जब क्षेत्र में चना, मटर, मसूर, अरहर, उड़द, मूंग आदि दलहनी फसलों की खूब खेती की जाती थी। परंतु जनसंख्या बढ़ने और जोतों का आकर घटने से अब इन फसलों की खेती समाप्त हो गई है। किसान सबसे ज्यादा तरजीह धान और गेहूं और साठा की फसल को देते हैं, इसके बाद गन्ने का नंबर आता है। दलहनी और तिलहनी फसलों की खेती घटने से चिंतित सरकार ने इन फसलों के बोने पर तमाम तरह के अनुदान की घोषणा कर रखी है, लेकिन इस सबके बावजूद किसान इन फसलों को बोने के प्रति उदासीन है।
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पहले के समय में चना और मटर लगभग सभी किसान बोते थे। अब यदि खेत में चना, मटर की खेती कर भी दी जाए तो उसकी रखवाली में ही तमाम खर्चा आ जाता है और रखवाली नहीं होने पर लोग होले के रूप में सारी फसल खा जाएंगे।
- शिववीर सिंह बहादुरपुर बुजुर्ग पुवायां
अब चने आदि की फसल में बीमारी बहुत लगती है इस कारण लोग इन फसलों से किनारा करने लगे हैं। दलहन में उत्पादन भी ज्यादा नहीं होता है, अरहर आदि में खेत एक वर्ष के लिए फंस जाता है।
- राजर्षि शुक्ला गांव मलिका, खुटार
सरकारी योजनाओं की जानकारी किसानों तक नहीं पहुंच पाती है। अनुदान का बीज, दवाएं आदि बाजार में ब्लैक में बेच दी जाती हैं, जिस कारण भी दलहनी फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है।
- महेंद्रपाल सिंह यादव, जिलाध्यक्ष भाकियू शाहजहांपुर
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पुवायां क्षेत्र खेती के मामले में प्रदेश भर में सिरमौर है, लेकिन दलहन की खेती के मामले में यह फिसड्डी है। यहां दलहन की खेती का नामोनिशान नहीं है। महंगाई और ज्यादा फायदे की फसलों की उपज के चलते किसान दलहन के बारे में सोचते तक नहीं हैं।
मिनी पंजाब कहा जाने वाला यह क्षेत्र दलहनी फसलों के उत्पादन में काफी पिछड़ गया है। सिंचाई के भरपूर साधन, किसी भी स्तर तक जाकर लागत लगाने वाले किसान, उर्वरा जमीन आदि के बावजूद दलहन का उत्पादन नहीं होने के पीछे ज्यादा उत्पादन कर अधिक रुपये बनाने की मंशा ही है। क्षेत्र में अब धान, गेहूं, गन्ना के अलावा आलू और सब्जी की मटर की खेती ही की जा रही है। कुछ बड़े किसान खरबूजा, खीरा आदि भी पैदा कर रहे हैं।
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एक समय था जब क्षेत्र में चना, मटर, मसूर, अरहर, उड़द, मूंग आदि दलहनी फसलों की खूब खेती की जाती थी। परंतु जनसंख्या बढ़ने और जोतों का आकर घटने से अब इन फसलों की खेती समाप्त हो गई है। किसान सबसे ज्यादा तरजीह धान और गेहूं और साठा की फसल को देते हैं, इसके बाद गन्ने का नंबर आता है। दलहनी और तिलहनी फसलों की खेती घटने से चिंतित सरकार ने इन फसलों के बोने पर तमाम तरह के अनुदान की घोषणा कर रखी है, लेकिन इस सबके बावजूद किसान इन फसलों को बोने के प्रति उदासीन है।
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पहले के समय में चना और मटर लगभग सभी किसान बोते थे। अब यदि खेत में चना, मटर की खेती कर भी दी जाए तो उसकी रखवाली में ही तमाम खर्चा आ जाता है और रखवाली नहीं होने पर लोग होले के रूप में सारी फसल खा जाएंगे।
- शिववीर सिंह बहादुरपुर बुजुर्ग पुवायां
अब चने आदि की फसल में बीमारी बहुत लगती है इस कारण लोग इन फसलों से किनारा करने लगे हैं। दलहन में उत्पादन भी ज्यादा नहीं होता है, अरहर आदि में खेत एक वर्ष के लिए फंस जाता है।
- राजर्षि शुक्ला गांव मलिका, खुटार
सरकारी योजनाओं की जानकारी किसानों तक नहीं पहुंच पाती है। अनुदान का बीज, दवाएं आदि बाजार में ब्लैक में बेच दी जाती हैं, जिस कारण भी दलहनी फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है।
- महेंद्रपाल सिंह यादव, जिलाध्यक्ष भाकियू शाहजहांपुर