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मदर्स डे : ‘मां’ की मेहरबानी, हर लम्हा याद आती है संघर्ष की कहानी

Sun, 08 May 2022 11:22 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2022 11:22 PM IST
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Mother's kindness, every moment remembers the story of struggle
शाहजहांपुर निवासी कुमकुम सेठ के साथ उनके बेटे व बहू संवाद - फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। मां, एक शब्द में असीमित संघर्ष और बलिदान की कहानी। बच्चों की परवरिश के लिए वह हर हद गुजरना जानती है। महिला को यूं ही ममता की मूरत नहीं कहते। कई सच्ची कहानियां हैं, जहां यशोदा बनकर मां का प्यार लुटाया। इस मदर्स डे पर ऐसी ही कुछ कहानियां जहां पर जीवन की धारा बदलने में मां ने अप्रतिम योगदान दिया है।
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पति की मौत के बाद पढ़ाई कर पहले खुद फिर बेटी को बनाया शिक्षक
पुवायां। मोहल्ला गढ़ी निवासी बिंदेश्वरी देवी की शादी जनपद सीतापुर में हुई थी। कुछ वर्ष बाद ही पति सुरेंद्र शुक्ला की सड़क हादसे में मौत हो गई। तब बिंदेश्वरी देवी की गोद में एक वर्ष की पुत्री अमिता शुक्ला थी। पति की मौत हो जाने पर वह मायके चली आईं। अमिता शुक्ला बताती हैं कि उस समय मां महज कक्षा पांच पास थीं। उनकी मां ने तमाम विपरीत परिस्थितियों से पार पाते हुए मायके में रहकर उच्च शिक्षा हासिल की।
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सरकारी स्कूल में शिक्षक बन गईं। अमिता शुक्ला के अनुसार उन्होंने जब से होश संभाला, तब से उनकी मां ने उनको उच्च शिक्षा ग्रहण कर आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रेरित किया। मां की प्रेरणा ने उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई करने के बाद नौकरी की तलाश शुरू की और वर्ष 1998 में उन्हें सरकारी शिक्षक की नौकरी मिल गई। उनकी मां 65 वर्षीय बिंदेश्वरी देवी भी पुत्री के साथ ही रहती हैं। अमिता शुक्ला के अनुसार मां उन्हें हर समय अच्छे कार्य करने और अपने कार्यों के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देती रहती हैं। मां की प्रेरणा से उनको शिक्षा विभाग की ओर से कहानी, कॉमिक्स निर्माण, पोस्टर प्रतियोगिता में राज्यस्तरीय पुरस्कार मिल चुके हैं। अमिता को उत्कृष्ट शिक्षक का राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिल चुका है।
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बड़ी बहन ने मां बनकर भाई को पाला, बनाया कमांडो
जैतीपुर। 26 नवंबर, 2008 में जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ, तब एनएसजी कमांडो ने अपनी जान हथेली पर रखकर आतंकवादियों को सबक सिखाया था। इन्हीं में से एक कमांडो थे अनिल सिंह चौहान। अनिल मूलरूप से मदनापुर क्षेत्र के गांव चाहरपुर के रहने वाले हैं। 1984 में अनिल के पिता जगवीर सिंह की हत्या हो गई थी। तब वह महज दो साल के थे। मां शकुंतला देवी पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। तब बड़ी बहन पुष्पा देवी उर्फ रेनू ने यशोदा बनकर अनिल को पाला-पोसा। पुष्पा और पति गढ़ियारंगीन में प्रधानाध्यापक शैलेंद्र पाल सिंह अनिल को लेकर अपने घर आ गए।
पुष्पा की परवरिश का नतीजा था कि बचपन से ही अनिल के अंदर राष्ट्रप्रेम का बीज अंकुरित हो गया था। 2001 में अनिल सिंह सेना में भर्ती हुए और 2005 में एनएसजी में चले गए। 26/11 के हमले के बाद अनिल का नाम सुर्खियों में आया था। सेवानिवृत्त होने के बाद अनिल युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करते हैं और उनकी ट्रेनिंग में मदद करते हैं। अनिल कहते हैं कि मेरी बहन ने मुझे मां जैसा प्यार दिया। इस काबिल बनाया कि देश और समाज की सेवा कर सकूं। संवाद
भाई-बहनों की परवरिश के लिए शादी नहीं की
नेशनल गर्ल्स इंटर कॉलेज की शिक्षिका डॉ. शाइस्ता ने एक बहन होकर मां की भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने भाई-बहनों की परवरिश के लिए शादी नहीं की। उनके इस त्याग की बदौलत भाई असद खान डालमिया चीनी मिल में कार्यरत हैं, तो बहन शहला लखीमपुर खीरी में अनुदेशक के पद पर तैनात है। शाइस्ता बताती हैं कि उनकी उम्र 25 वर्ष, भाई असद की 12 साल और बहन शहला 15 साल की रही होगी। तभी माता-पिता का देहांत होने के बाद उन्होंने अपने दोनों भाई-बहनों की पढ़ाई-लिखाई और परवरिश की जिम्मेदारी निभाई।
इतना ही नहीं शाइस्ता एक बड़ी जिम्मेदारी का भी निर्वाह कर रही है। उनके घर में देखभाल का काम करने वाले सिराजुद्दीन जिनको वह मामा कहती थीं, उनके तीन बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी शाइस्ता ने अपने कंधों पर ले रखी है। शाइस्ता बताती हैं कि सिराजुद्दीन की सात संतानें हैं, जिनमें से दो बेटे शाद व सुहेल व एक बेटी जोया की पढ़ाई-लिखाई करा रही हैं। शाद इस समय मैकेनिकल से इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कर रहे हैं, तो सुहेल बायो से इंटर की पढ़ाई कर रहा है जबकि जोया आठवीं कक्षा में पढ़ती है।
मां ने खेतीबाड़ी कर बच्चों को बनाया काबिल
जैतीपुर। खेड़ाबझेड़ा के रहने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर श्रीकांत मिश्रा अपनी मां ओमवती के त्याग और संघर्ष को यादकर भावुक हो जाते हैं। कहते हैं कि जब वह महज आठ महीने के थे, तब पिता का साया सिर से उठ गया था। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी मां ने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। यह आसान नहीं था। मां ने बहुत संघर्ष किया। अपने बच्चों को काबिल बनाने के लिए मां ने खुद खेतीबाड़ी कर कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी।
1995 में श्रीकांत पुलिस में भर्ती हुए। बहन और भाई की बीमारी के चलते मृत्यु हो चुकी है। उम्र के इस पड़ाव में मां गांव में अकेली न रहे, इसलिए श्रीकांत की पत्नी सुमन और बेटा अनुज साथ में ही रहते हैं। श्रीकांत वर्तमान में डीजी आफिस लखनऊ में तैनात हैं। वह कहते हैं कि जो कुछ भी वह बन सके, उसके पीछे सिर्फ मां की प्रेरणा, संघर्ष और आशीर्वाद है। आज भी मां ही घर की मुखिया हैं।
बेटों को पढ़ा-लिखाकर बनाया सेना का अधिकारी
शाहजहांपुर। घूरनतलैया निवासी कमल किशोर सेठ का कोल्ड स्टोरेज था। 12 अक्टूबर, 1987 को उनका बीमारी के चलते देहांत हो गया। उस समय संकल्प आठ साल और संकेत छह साल के थे। पति के निधन के बाद परिवार और व्यवसाय को संभालने की जिम्मेदारी कुमकुम पर आ गई। ऐसे समय में कुमकुम सेठ के देवर श्याम किशोर सेठ ने व्यापार संभाला। वहीं कुमकुम ने अपने बेटों की पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया।

बेटों ने भी मां के सपने को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे पहले संकल्प को सेना में नौकरी मिली। वह वर्तमान में कर्नल हैं और लखनऊ हेड आफिस में तैनात हैं। छोटा बेटा कर्नल संकेत सियाचीन में कमांडिंग आफीसर हैं। कुमकुम ने बताया कि जिंदगी में एक समय ऐसा आया, जब कुछ नजर नहीं आया। तब बेटों को उच्च मुकाम तक पहुंचाने की ठान ली। संवाद

अनिल सिंह चौहान बहन पुष्पा (पीली साड़ी में) और परिवार के साथ।

अनिल सिंह चौहान बहन पुष्पा (पीली साड़ी में) और परिवार के साथ।- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

श्रीकांत मिश्रा अपनी मां ओमवती के साथ।

श्रीकांत मिश्रा अपनी मां ओमवती के साथ।- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

शिक्षिका डॉ. शाइस्ता अपने भाई-बहनों के साथ फाइल फोटो

शिक्षिका डॉ. शाइस्ता अपने भाई-बहनों के साथ फाइल फोटो- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

मां बिंदेश्वरी देवी के साथ पुवायां की शिक्षिका अमिता शुक्ला

मां बिंदेश्वरी देवी के साथ पुवायां की शिक्षिका अमिता शुक्ला- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

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