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जिला योजना: 1.35 करोड़ खर्च होने पर भी सक्रिय नहीं हो सकीं दुग्ध समितियां
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शाहजहांपुर के ब्लाक भावलखेड़ा के रौसर कोठी में शाहजहांपुर महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की शा?
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। वित्तीय वर्ष 2021-22 की जिला योजना में जिले में दुग्ध संघों के पुनर्गठन और उनका कार्य क्षेत्र बढ़ाने को 211.45 लाख रुपये बजट स्वीकृत किया गया। इसमें से 135.22 लाख रुपये अवमुक्त होने पर संपूर्ण धनराशि खर्च कर ली गई लेकिन न तो दुग्ध समितियां बढ़ सकीं और न ही उनसे राजकीय दुग्धशाला को दूध की आवक बढ़ सकी। दूध को ठंडा और लंबे समय तक सुरक्षित रखने को लगाए गए चिलर प्लांट उखाड़कर अधिकारियों ने पराग डेयरी के बरेली संयंत्र को भिजवा दिए।
रौसर कोठी में राजकीय दुग्धशाला वर्ष 1964 से संचालित है। कभी यहां के महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ से 306 दुग्ध उत्पादक समितियां जुड़ी थीं, लेकिन अब उनकी संख्या घटकर 212 रह गई है और उनमें भी बमुश्किल 100 समितियां दुग्धशाला को 50 फीसदी दूध आपूर्ति कर रही हैं। शुरुआत में दुग्धशाला को दूध की आपूर्ति के लिए शाहजहांपुर दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड का गठन किया गया लेकिन बाद में उसे वर्ष 2016 में बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड से संबद्ध कर दिया गया।
सितंबर 2019 में तत्कालीन सांसद व केंद्रीय मंत्री कृष्णा राज ने व्यक्तिगत रुचि लेकर शाहजहांपुर महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ का पंजीकरण कराकर उसे बरेली के दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड शाखा से अलग करा दिया। यही नहीं, उन्होंने दुग्धशाला पांच वर्ष को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) को भी सौंप दी।
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कर्मचारियों की लापरवाही से मृतप्राय पड़ीं समितियां
समितियों के संचालकों ने दूध का भुगतान समय से न होने और महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की शाखा में किसी प्रबंधक के न होने के कारण अपनी समस्याओं के बारे में कई बार लिखित शिकायत की लेकिन उनका निस्तारण नहीं किया गया। परेशान होकर तमाम संचालकों ने समितियां चलानी बंद कर दीं। इस बीच, एनडीडीबी ने एक-एक कर सभी कर्मचारी हटा लिए।
प्रबंधक ने बरेली भिजवा दीं पैकिंग मशीनें
वर्ष 2014-15 में दुग्धशाला को जिला योजना के बजट से दूध, दही, मट्टा, छाछ, घी, छेना खीर आदि की पैकिंग करने की मशीनें उपलब्ध कराई गईं लेकिन प्रधान प्रबंधक ने वर्ष 2019 में बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड को भेज दिया, जबकि बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की दुग्धशाला लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत से बनी है और वहां पहले से यह मशीनें उपलब्ध हैं।
सूत्रों का कहना है कि यहां से बरेली भेजी गईं मशीनें वहां कूड़े के समान पड़ी धूल खा रही हैं। फिलहाल, रौसर की दुग्धशाला को समितियों से अब 11000 लीटर की बजाय सिर्फ 7500 लीटर दूध मिल रहा है। इस कारण केवल एक चिलर टैंक से काम चल रहा है और दो अन्य टैंक खाली रहते हैं। इसी चिलर प्लांट में शाम तक दूध ठंडा करने के बाद बरेली की पराग डेयरी भेजा जाता है। वहां से दूध पैक होकर सुबह छह बजे यहां वापस लाकर उसकी बाजार में बिक्री कराई जा रही है।
जिला योजना से बजट की स्वीकृति दुग्ध समितियों को पिछले वर्ष किए गए भुगतान के अनुसार मिलती है। यह धनराशि समितियों से प्राप्त दूध के भुगतान और बंद समितियों के पुनर्गठन पर खर्च की गई है। समितियों के संचालकों से मुझे भुगतान को लेकर कोई शिकायत नहीं मिली। - मनीष कुमार सिंह, प्रधान प्रबंधक, बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ
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रौसर कोठी में राजकीय दुग्धशाला वर्ष 1964 से संचालित है। कभी यहां के महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ से 306 दुग्ध उत्पादक समितियां जुड़ी थीं, लेकिन अब उनकी संख्या घटकर 212 रह गई है और उनमें भी बमुश्किल 100 समितियां दुग्धशाला को 50 फीसदी दूध आपूर्ति कर रही हैं। शुरुआत में दुग्धशाला को दूध की आपूर्ति के लिए शाहजहांपुर दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड का गठन किया गया लेकिन बाद में उसे वर्ष 2016 में बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड से संबद्ध कर दिया गया।
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सितंबर 2019 में तत्कालीन सांसद व केंद्रीय मंत्री कृष्णा राज ने व्यक्तिगत रुचि लेकर शाहजहांपुर महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ का पंजीकरण कराकर उसे बरेली के दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड शाखा से अलग करा दिया। यही नहीं, उन्होंने दुग्धशाला पांच वर्ष को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) को भी सौंप दी।
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कर्मचारियों की लापरवाही से मृतप्राय पड़ीं समितियां
समितियों के संचालकों ने दूध का भुगतान समय से न होने और महिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की शाखा में किसी प्रबंधक के न होने के कारण अपनी समस्याओं के बारे में कई बार लिखित शिकायत की लेकिन उनका निस्तारण नहीं किया गया। परेशान होकर तमाम संचालकों ने समितियां चलानी बंद कर दीं। इस बीच, एनडीडीबी ने एक-एक कर सभी कर्मचारी हटा लिए।
प्रबंधक ने बरेली भिजवा दीं पैकिंग मशीनें
वर्ष 2014-15 में दुग्धशाला को जिला योजना के बजट से दूध, दही, मट्टा, छाछ, घी, छेना खीर आदि की पैकिंग करने की मशीनें उपलब्ध कराई गईं लेकिन प्रधान प्रबंधक ने वर्ष 2019 में बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड को भेज दिया, जबकि बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की दुग्धशाला लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत से बनी है और वहां पहले से यह मशीनें उपलब्ध हैं।
सूत्रों का कहना है कि यहां से बरेली भेजी गईं मशीनें वहां कूड़े के समान पड़ी धूल खा रही हैं। फिलहाल, रौसर की दुग्धशाला को समितियों से अब 11000 लीटर की बजाय सिर्फ 7500 लीटर दूध मिल रहा है। इस कारण केवल एक चिलर टैंक से काम चल रहा है और दो अन्य टैंक खाली रहते हैं। इसी चिलर प्लांट में शाम तक दूध ठंडा करने के बाद बरेली की पराग डेयरी भेजा जाता है। वहां से दूध पैक होकर सुबह छह बजे यहां वापस लाकर उसकी बाजार में बिक्री कराई जा रही है।
जिला योजना से बजट की स्वीकृति दुग्ध समितियों को पिछले वर्ष किए गए भुगतान के अनुसार मिलती है। यह धनराशि समितियों से प्राप्त दूध के भुगतान और बंद समितियों के पुनर्गठन पर खर्च की गई है। समितियों के संचालकों से मुझे भुगतान को लेकर कोई शिकायत नहीं मिली। - मनीष कुमार सिंह, प्रधान प्रबंधक, बरेली दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ