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Shahjahanpur News: लल्ला होरी तो हमारे जमाने मा होत थी, अब तौ हुड़दंग होत करो है

Tue, 03 Mar 2026 11:14 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2026 11:14 PM IST
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Lalla Holi was held in our time, now it is a commotion
शेर सिंह। संवाद
खुदागंज। सनातन परंपरा से जुड़ी होली सदियों से मनाई जा रही है, लेकिन अब होली पहले जैसी नहीं रही। पहले लोग इस मौके पर पुराने मतभेद भुलाकर गले मिलते थे, लेकिन अब होली पर जरा-जरा सी बात पर लोग लाठियां भांजने पर आमादा हो जाते हैं। पुराने जमाने की होली को लेकर नगर के बुजुर्गों को कुरेदने पर वह बोल पड़े-लल्ला, होरी तौ हमारे जमाने में होत थी, अब तौ हुड़दंग होत करो है।
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50 साल पहले की होली का उल्लास बयां करते हुए 85 वर्षीय हबीब उल्ला खां भावुक हो उठे। बोले- होली पर रंग खेलने वालों में हिंदू-मुसलमान सभी शामिल होते थे। चेहरे रंगने के बाद पता करना मुश्किल था कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है।
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होली धार्मिक एकता की प्रतीक हुआ करती थी। सभी एक-दूसरे के घर जाकर और गले मिलकर बधाई देते थे। बुरा न मानो होली है कहकर लोग छोटे-बड़े सभी लोग दूसरे परिवारों की महिलाओं को चाची और भाभी का संबोधन देकर उन्हें रंग लगा देते थे, लेकिन तब कोई बुरा नहीं मानता था। दूसरों के बागों से लकड़ी काटकर होली में डालते थे, लेकिन बाग मालिक कभी एतराज नहीं करते थे। बोले- अब तौ होली पर हुड़दंग होत करो है।
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नगर में रहने वाले 75 वर्षीय शेर सिंह 50 साल पुरानी होली की तुलना आज से किए जाने पर बोले-होली पर पहले जैसा अपनत्व अब समाज में नहीं दिख रहा है। पहले संयुक्त परिवार की होली का उल्लास देखते बनता था, अब एकल परिवार के लोग खुद में सिमट गए हैं और होली के दिन भी रंग खेलने से बचने के लिए घरों में बंद रहते हैं।

कोई किसी पर भी रंग डाले, लेकिन इसका बुरा नहीं माना जाता था। अब वह बात नहीं रही। नई पीढ़ी में भी त्योहार का पहले जैसा उल्लास नहीं दिखता है। होली तो अब भी मनाई जाती है, लेकिन कई परंपराएं खो गई हैं। एकल परिवार में लोग अपने आप में ही सीमित रहने लगे हैं। होली पर मामूली बातों को लेकर झगड़े होते देख मन खिन्न हो जाता है।

शेर सिंह। संवाद

शेर सिंह। संवाद

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