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नौ साल से एक अदद आवास को तरस रहे बाढ़ से विस्थापित परिवार
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शाहजहांपुर/जलालाबाद। बारिश के सीजन मेें बाढ़ आने पर हर साल पीड़ितों की मदद को प्रशासन का आपदा राहत तंत्र सक्रिय होने का ढकोसला शुरू कर देता है, लेकिन नौ साल पहले आई बाढ़ से बेघर होने के बाद विस्थापित हुए उइला थाथरमई गांव के 14 परिवार अभी तक एक अदद आवास को तरस रहे हैं। इसे सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता ही कहेंगे कि घर और खेती की जमीनें नदियों में समा जाने के बाद कांट ब्लॉक के पुरैना गांव में बसाए गए ये बाढ़ पीड़ित परिवार झोपड़ियों में खाना बदोशों जैसा जीवन बिताने को अभिशप्त हैं।
वर्ष 2010 के मानसून सीजन में भारी वर्षा के दौरान नरौरा बैराज से छह लाख क्यूसेक पानी रिलीज किए जाने के बाद उफनाई गंगा-रामगंगा से क्षेत्र में भीषण बाढ़ आ गई थी। बाढ़ व कटान के चलते तब तीन दर्जन से अधिक तटवर्ती गांवों के सैकड़ों घर नदियों में समा गए थे। तमाम परिवारों की खेती की जमीनें भी कटान के चलते नदी की भेंट चढ़ गई थीं। तत्कालीन डीएम मिनिस्ती एस ने इनमे से अधिकांश पीड़ित परिवारों को अन्य स्थानों पर बसा दिया था। जबकि उइला थाथरमई के 14 पीड़ित परिवारों को कांट ब्लॉक की ग्राम पंचायत पुरैना के रकबे में स्थित आबादी की जमीन पर बसाकर उस बस्ती को नई बस्ती का नाम दिया था।
नई बस्ती के इस मझरे की तरफ बीते नौ सालों से किसी अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया। सुविधा के नाम पर यहां केवल चार लोगों को ही आवास मिल पाए हैं। आवास के असली हकदार शेष एक दर्जन से ज्यादा परिवार प्रधान से लेकर अफसरों तक की चौखट नापकर बेहाल हो चुके हैं, लेकिन उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही। बटाई पर खेती या मजदूरी कर भरण पोषण करने वाले बाढ़ पीड़ित परिवार अन्य बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हैं। नई बस्ती में बिजली तो पहुंच गई, लेकिन खड़ंजा, नाली, हैंडपंप आदि कोई सुविधा मौजूद नही है।
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बाढ़ के दौरान हमारा मकान और खेती वाली जमीनें कट गईं। प्रशासन ने रहने को यहां जमीन दे दी, लेकिन आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका। गांव में कोई विकास कार्य भी नहीं कराए गए।
राजीव कुमार
खेती वाली जमीन न होने से निश्चित आय का कोई साधन नही है। मजदूरी व ठेके पर खेत लेकर जो कमा पाते है उसी से परिवार चल रहा है। सबसे बड़ी समस्या आवास की कमी को लेकर है।
रामा देवी
अपना गांव छोड़कर घास फूस की झोपड़ी में परिवार सहित गुजारा कर रहे हैं। पुरैना में कई ऐसे लोगों को आवास मिल गए, जिनके पहले से ही पक्के मकान बने थे। शिकायत पर भी जांच नहीं हुई।
रामचंद्र
पुरेना की नई बस्ती के लोगों के नाम आवासीय जमीन न होने से उन्हें आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका। यहां के छह भूमिहीनों को आवास देने के लिए उनके नाम जमीन का पट्टा किए जाने की संस्तुति एसडीएम को भेजी गई है। जिन दो लोगों के नाम जमीन है, उन्हें आवास दिए जा चुके हैं। नई बस्ती में दो लोग ऐसे हैं, जिनके पास कोई आईडी प्रूफ नही है।
जीवी पाठक, खंड विकास अधिकारी, कांट
बाढ़ पीड़ितों को आवास दिए जाने की संस्तुति का पत्र प्राप्त हो चुका है, लेकिन आवासीय पट्टे स्वीकृत करने के लिए पुरैना में उपयुक्त जमीन नहीं मिल रही है। आसपास की अन्य ग्राम पंचायतों में आवासीय पट्टों के लिए जमीन खोजी जा रही है। जमीन उपलब्ध होते ही बाढ़ पीड़ितों को रिहायशी पट्टे जारी किए जाएंगे। पुरैना की नई बस्ती में निरीक्षण कर अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
वेद सिंह चौहान, एसडीएम सदर
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वर्ष 2010 के मानसून सीजन में भारी वर्षा के दौरान नरौरा बैराज से छह लाख क्यूसेक पानी रिलीज किए जाने के बाद उफनाई गंगा-रामगंगा से क्षेत्र में भीषण बाढ़ आ गई थी। बाढ़ व कटान के चलते तब तीन दर्जन से अधिक तटवर्ती गांवों के सैकड़ों घर नदियों में समा गए थे। तमाम परिवारों की खेती की जमीनें भी कटान के चलते नदी की भेंट चढ़ गई थीं। तत्कालीन डीएम मिनिस्ती एस ने इनमे से अधिकांश पीड़ित परिवारों को अन्य स्थानों पर बसा दिया था। जबकि उइला थाथरमई के 14 पीड़ित परिवारों को कांट ब्लॉक की ग्राम पंचायत पुरैना के रकबे में स्थित आबादी की जमीन पर बसाकर उस बस्ती को नई बस्ती का नाम दिया था।
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नई बस्ती के इस मझरे की तरफ बीते नौ सालों से किसी अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया। सुविधा के नाम पर यहां केवल चार लोगों को ही आवास मिल पाए हैं। आवास के असली हकदार शेष एक दर्जन से ज्यादा परिवार प्रधान से लेकर अफसरों तक की चौखट नापकर बेहाल हो चुके हैं, लेकिन उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही। बटाई पर खेती या मजदूरी कर भरण पोषण करने वाले बाढ़ पीड़ित परिवार अन्य बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम हैं। नई बस्ती में बिजली तो पहुंच गई, लेकिन खड़ंजा, नाली, हैंडपंप आदि कोई सुविधा मौजूद नही है।
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बाढ़ के दौरान हमारा मकान और खेती वाली जमीनें कट गईं। प्रशासन ने रहने को यहां जमीन दे दी, लेकिन आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका। गांव में कोई विकास कार्य भी नहीं कराए गए।
राजीव कुमार
खेती वाली जमीन न होने से निश्चित आय का कोई साधन नही है। मजदूरी व ठेके पर खेत लेकर जो कमा पाते है उसी से परिवार चल रहा है। सबसे बड़ी समस्या आवास की कमी को लेकर है।
रामा देवी
अपना गांव छोड़कर घास फूस की झोपड़ी में परिवार सहित गुजारा कर रहे हैं। पुरैना में कई ऐसे लोगों को आवास मिल गए, जिनके पहले से ही पक्के मकान बने थे। शिकायत पर भी जांच नहीं हुई।
रामचंद्र
पुरेना की नई बस्ती के लोगों के नाम आवासीय जमीन न होने से उन्हें आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका। यहां के छह भूमिहीनों को आवास देने के लिए उनके नाम जमीन का पट्टा किए जाने की संस्तुति एसडीएम को भेजी गई है। जिन दो लोगों के नाम जमीन है, उन्हें आवास दिए जा चुके हैं। नई बस्ती में दो लोग ऐसे हैं, जिनके पास कोई आईडी प्रूफ नही है।
जीवी पाठक, खंड विकास अधिकारी, कांट
बाढ़ पीड़ितों को आवास दिए जाने की संस्तुति का पत्र प्राप्त हो चुका है, लेकिन आवासीय पट्टे स्वीकृत करने के लिए पुरैना में उपयुक्त जमीन नहीं मिल रही है। आसपास की अन्य ग्राम पंचायतों में आवासीय पट्टों के लिए जमीन खोजी जा रही है। जमीन उपलब्ध होते ही बाढ़ पीड़ितों को रिहायशी पट्टे जारी किए जाएंगे। पुरैना की नई बस्ती में निरीक्षण कर अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
वेद सिंह चौहान, एसडीएम सदर