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पहले चहेते नेता के पक्ष में करते थे मतदान अब दल को वरीयता
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पुवायां (शाहजहांपुर)। पहले पीलीभीत और वर्ष 2009 से शाहजहांपुर लोकसभा में शामिल पुवायां सुरक्षित सीट के मतदाताओं का रुख हमेशा ही कुछ अलग रहा है। यहां के मतदाताओं ने विधानसभा में जिन्हें जिताकर भेजा, लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी और उनके कहने पर वोट नहीं दिए। नेताओं के यह भाग्य विधाता विधानसभा और लोकसभा में अलग-अलग दलों और प्रत्याशियों को पसंद करते रहे हैं। पहले के तमाम चुनावों में चहेते नेता के कहने पर मतदान किया जाता था, लेकिन अब लोग पार्टियों के पक्ष में मतदान करते हैं। चेहरे पीछे चले गए हैं।
इस सीट पर कभी प्रसाद परिवार की बात मतदाताओं के लिए पत्थर की लकीर होती थी। तब प्रसाद भवन एक था और स्व. कुंवर जितेंद्र प्रसाद (बड़े बाबा साहब) और उनके भाई स्व. जयेंद्र प्रसाद (छोटे बाबा साहब) एक साथ थे। अब प्रसाद परिवार में बड़े बाबा साहब के पुत्र जितिन प्रसाद भाजपा में हैं तो छोटे बाबा साहब के पुत्र जयेश प्रसाद सपा में हैं। प्रसाद परिवार के प्रभाव के कारण ही इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस का आठ बार कब्जा रहा है। इसके बाद मतदाताओं का झुकाव मेनका गांधी की ओर हो गया और वोटर उनके कहने पर प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने लगे। मेनका गांधी को संसद पहुंचाने में पुवायां विधानसभा के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। बाद में विधायक और सांसद रहे मिथलेश कुमार भी लोगों की पसंद रहे, यहां तक कि एक बार मिथलेश कुमार को लोगों ने निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी विधानसभा पहुंचा दिया। इसके बाद स्थितियां बदलीं और लोग किसी चेहरे के पीछे चलने के स्थान पर पार्टी को वरीयता देने लगे।
विधानसभा और लोकसभा में रही है अलग -अलग पसंद
पुवायां। अब तक हुए चुनावों पर गौर करें तो वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में यहां से कांग्रेस के चेतराम विजयी होकर विधानसभा पहुंचे। वर्ष 1989 में उन्होंने सफलता दोहराई लेकिन इसी वर्ष के लोकसभा चुनाव में पुवायां के लोगों ने जनता दल की मेनका गांधी को वोट देकर संसद पहुंचाने में महत्वपूर्ण भमिका निभाई। 1991 में रामलहर के दौरान पुवायां से भाजपा के नेतराम विधायक बने। मेनका गांधी भी रामलहर के झोंके में बह गईं और भाजपा के परशुराम गंगावार सांसद बने। 1993 में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के चेतराम एक बार फिर यहां से विधायक चुने गए। 1996 में कांग्रेस और बसपा गठबंधन में पुवायां सीट कांग्रेस के खाते में आई और चेतराम एक बार फिर विजयी हुए, लेकिन इसी वर्ष लोकसभा चुनाव में पुवायां के लोगों ने एक बार फिर मेनका गांधी के पक्ष में जमकर वोट डाले और उन्हें संसद पहुंचा दिया।
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वर्ष 1999 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में भी मेनका गांधी ही यहां के मतदाताओं की पसंद रहीं। 2002 के विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा समर्थित निर्दलीय मिथलेश कुमार को विधानसभा का दरवाजा पार करने का मौका दिया। 2004 में पुवायां के लोगों ने लोकसभा के चुनाव में एक बार फिर भाजपा और मेनका गांधी को पसंद किया, मेनका गांधी को पुवायां से 53901 मत मिले। 2007 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने सपा के मिथलेश कुमार को एक बार फिर विधानसभा पहुंचाया और 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें संसद पहुंचाया, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में मिथलेश के भाई सुरजनलाल को हरा दिया, बसपा के धीरेंद्र प्रसाद यहां से विधायक बने। 2012 में विधानसभा के लिए मिथलेश कुमार की पत्नी शकुंतला देवी सपा प्रत्याशी के रूप में जीती, लेकिन 2014 के चुनाव में मिथलेश कुमार हार गए और भाजपा से कृष्णाराज सांसद बनी। वर्ष 2017 में कांग्रेस से चार बार चुनाव जीते चेतराम भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी ने उनको प्रत्याशी बनाया। चेतराम ने चुनाव में विजय प्राप्त की। वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के अरुण सागर की जिताने में पुवायां के लोगों की अहम भूमिका रही।
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इस सीट पर कभी प्रसाद परिवार की बात मतदाताओं के लिए पत्थर की लकीर होती थी। तब प्रसाद भवन एक था और स्व. कुंवर जितेंद्र प्रसाद (बड़े बाबा साहब) और उनके भाई स्व. जयेंद्र प्रसाद (छोटे बाबा साहब) एक साथ थे। अब प्रसाद परिवार में बड़े बाबा साहब के पुत्र जितिन प्रसाद भाजपा में हैं तो छोटे बाबा साहब के पुत्र जयेश प्रसाद सपा में हैं। प्रसाद परिवार के प्रभाव के कारण ही इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस का आठ बार कब्जा रहा है। इसके बाद मतदाताओं का झुकाव मेनका गांधी की ओर हो गया और वोटर उनके कहने पर प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने लगे। मेनका गांधी को संसद पहुंचाने में पुवायां विधानसभा के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। बाद में विधायक और सांसद रहे मिथलेश कुमार भी लोगों की पसंद रहे, यहां तक कि एक बार मिथलेश कुमार को लोगों ने निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी विधानसभा पहुंचा दिया। इसके बाद स्थितियां बदलीं और लोग किसी चेहरे के पीछे चलने के स्थान पर पार्टी को वरीयता देने लगे।
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विधानसभा और लोकसभा में रही है अलग -अलग पसंद
पुवायां। अब तक हुए चुनावों पर गौर करें तो वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में यहां से कांग्रेस के चेतराम विजयी होकर विधानसभा पहुंचे। वर्ष 1989 में उन्होंने सफलता दोहराई लेकिन इसी वर्ष के लोकसभा चुनाव में पुवायां के लोगों ने जनता दल की मेनका गांधी को वोट देकर संसद पहुंचाने में महत्वपूर्ण भमिका निभाई। 1991 में रामलहर के दौरान पुवायां से भाजपा के नेतराम विधायक बने। मेनका गांधी भी रामलहर के झोंके में बह गईं और भाजपा के परशुराम गंगावार सांसद बने। 1993 में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के चेतराम एक बार फिर यहां से विधायक चुने गए। 1996 में कांग्रेस और बसपा गठबंधन में पुवायां सीट कांग्रेस के खाते में आई और चेतराम एक बार फिर विजयी हुए, लेकिन इसी वर्ष लोकसभा चुनाव में पुवायां के लोगों ने एक बार फिर मेनका गांधी के पक्ष में जमकर वोट डाले और उन्हें संसद पहुंचा दिया।
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वर्ष 1999 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में भी मेनका गांधी ही यहां के मतदाताओं की पसंद रहीं। 2002 के विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा समर्थित निर्दलीय मिथलेश कुमार को विधानसभा का दरवाजा पार करने का मौका दिया। 2004 में पुवायां के लोगों ने लोकसभा के चुनाव में एक बार फिर भाजपा और मेनका गांधी को पसंद किया, मेनका गांधी को पुवायां से 53901 मत मिले। 2007 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने सपा के मिथलेश कुमार को एक बार फिर विधानसभा पहुंचाया और 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें संसद पहुंचाया, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में मिथलेश के भाई सुरजनलाल को हरा दिया, बसपा के धीरेंद्र प्रसाद यहां से विधायक बने। 2012 में विधानसभा के लिए मिथलेश कुमार की पत्नी शकुंतला देवी सपा प्रत्याशी के रूप में जीती, लेकिन 2014 के चुनाव में मिथलेश कुमार हार गए और भाजपा से कृष्णाराज सांसद बनी। वर्ष 2017 में कांग्रेस से चार बार चुनाव जीते चेतराम भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी ने उनको प्रत्याशी बनाया। चेतराम ने चुनाव में विजय प्राप्त की। वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा के अरुण सागर की जिताने में पुवायां के लोगों की अहम भूमिका रही।