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बारिश और नमी बढ़ने से कीट-रोगों की चपेट में आई धान की फसल
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जैतीपुर में बारिश से गिरी फसल।
- फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। बीते दो सप्ताह से रुक-रुक कर हो रही बूंदाबांदी और बारिश के कारण खेतों में खड़ा धान न सिर्फ गिरकर खराब हो रहा है, वातावरण में नमी का स्तर ज्यादा होने से उसमे कई कीट रोग पनपने लगे हैं। जैतीपुर क्षेत्र के कई गांवों में हाईब्रिड श्रेणी वाले धान के पौधों पर भुनगा कीट देखा गया है। कृषि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यह मौसम धान में कंडुआ रोग, गंधी कीट आदि व्याधियों के पनपने के लिए अनुकूल है।
शनिवार से सोमवार सुबह तक 13 मिमी वर्षा हुई, जबकि इस समय पक चुके धान को पानी की जरूरत नहीं है। बीते दिन बूंदाबांदी के बाद वायुदाब बढ़ा तो मौसम सामान्य रहने के संकेत मिले, लेकिन बुधवार दोपहर करीब दस मिनट तक बूंदाबांदी होती रही। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं वरिष्ठ शस्य वैज्ञानिक डॉ. एनसी त्रिपाठी भी मानते हैं कि पके हुए धान के बार-बार भीगने से उस पर फफूंद और अन्य कई रोगों का प्रकोप हो सकता है।
जैतीपुर। हाइब्रिड और पीआर 13 प्रजाति के धान में रोग लगने लगे हैं। बारिश में सैकड़ों बीघा धान की फसल खेतों में गिर गई। सुबह धूप निकलने से धान सूखने की उम्मीद बंधी, लेकिन बाद में बादल घिर आए और बूंदाबांदी होने लगी। तराई के क्षेत्र में धान के खेतों में पानी भरा हुआ है। क्षेत्र के शेर पाल सिंह, कल्लू सिंह, राजवीर सिंह, मुकेश मिश्रा आदि किसानों ने बताया कि धान पक जाने के बावजूद खेतों से पानी नहीं घटने और लगातार मौसम खराब होने से धान में भुनका कीट लग गया है।
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इस तरह कीट-रोगों का करें उपचार
जिला कृषि रक्षा अधिकारी शिवशंकर गौतम के अनुसार इन दिनों धान में विभिन्न प्रकार के कीट-रोगों की बढ़वार होती है। बताया कि धान में हल्दिया (कंडुआ) रोग और गंधी कीट का संक्रमण हो रहा है। इस रोग की रोकथाम को खेत की मेड़ों और सिंचाई की नालियों को खरपतवारों से मुक्त रखना जरूरी है। रोग का प्रकोप होने की दशा में स्यूडोमोनास फ्लोरिसेंस कृषि रक्षा रसायन पांच ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 15-20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। गंधी कीट के नियंत्रण को मैलाथियान 5 प्रतिशत सांद्रता वाला पाउडर या फेनवेलरेट 0.04 प्रतिशत तीव्रता वाले कीटनाशक की 20-25 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव की जानी चाहिए।
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शनिवार से सोमवार सुबह तक 13 मिमी वर्षा हुई, जबकि इस समय पक चुके धान को पानी की जरूरत नहीं है। बीते दिन बूंदाबांदी के बाद वायुदाब बढ़ा तो मौसम सामान्य रहने के संकेत मिले, लेकिन बुधवार दोपहर करीब दस मिनट तक बूंदाबांदी होती रही। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं वरिष्ठ शस्य वैज्ञानिक डॉ. एनसी त्रिपाठी भी मानते हैं कि पके हुए धान के बार-बार भीगने से उस पर फफूंद और अन्य कई रोगों का प्रकोप हो सकता है।
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जैतीपुर। हाइब्रिड और पीआर 13 प्रजाति के धान में रोग लगने लगे हैं। बारिश में सैकड़ों बीघा धान की फसल खेतों में गिर गई। सुबह धूप निकलने से धान सूखने की उम्मीद बंधी, लेकिन बाद में बादल घिर आए और बूंदाबांदी होने लगी। तराई के क्षेत्र में धान के खेतों में पानी भरा हुआ है। क्षेत्र के शेर पाल सिंह, कल्लू सिंह, राजवीर सिंह, मुकेश मिश्रा आदि किसानों ने बताया कि धान पक जाने के बावजूद खेतों से पानी नहीं घटने और लगातार मौसम खराब होने से धान में भुनका कीट लग गया है।
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इस तरह कीट-रोगों का करें उपचार
जिला कृषि रक्षा अधिकारी शिवशंकर गौतम के अनुसार इन दिनों धान में विभिन्न प्रकार के कीट-रोगों की बढ़वार होती है। बताया कि धान में हल्दिया (कंडुआ) रोग और गंधी कीट का संक्रमण हो रहा है। इस रोग की रोकथाम को खेत की मेड़ों और सिंचाई की नालियों को खरपतवारों से मुक्त रखना जरूरी है। रोग का प्रकोप होने की दशा में स्यूडोमोनास फ्लोरिसेंस कृषि रक्षा रसायन पांच ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 15-20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। गंधी कीट के नियंत्रण को मैलाथियान 5 प्रतिशत सांद्रता वाला पाउडर या फेनवेलरेट 0.04 प्रतिशत तीव्रता वाले कीटनाशक की 20-25 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव की जानी चाहिए।