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शहीदों की उपेक्षा पर मायूस हैं मौजूदा वारिस

Fri, 18 Dec 2015 11:53 PM IST
शाहजहांपुर।
शाहजहांपुर। Updated Fri, 18 Dec 2015 11:53 PM IST
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Desperate to ignore the current heirs of martyrs
देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगूल फूंकते हुए काकोरी कांड को अंजाम देने के बाद 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर झूलने वाले शाहजहांपुर के पं. राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह के साथी अशफाक उल्लाह खां वारसी के वारिस खासे मायूस हैं कि हिंदू-मुस्लिम एकता के शानदार मिसाल वाले क्रांतिकारियों को स्कूली पाठ्यक्रम में अब तक शामिल नहीं किया गया है। शुक्रवार को उनके प्रपौत्र अशफाक उल्लाह खां और शादाब उल्लाह खां ने कहा कि उन शहीदों को हंसते हुए फांसी के फंदे को चूमे हुए 88 वर्ष बीत गए और आजादी के बाद तमाम राजनीतिक दलों की अगुवाई वाली सरकार केंद्र और राज्य में बनी लेकिन किसी ने इस बारे में सुध नहीं ली।
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शनिवार अपने प्रतिष्ठान पर मीडिया से वार्ता करते हुए दोनों भाइयों ने कहा कि परिवारवालों के तमाम विरोध और मना करने के बाद भी आजादी की दीवानगी में रमे अशफाकउल्लाह खां वारसी ने पं. राम प्रसाद बिस्मिल के साथ धर्मनिरपेक्षता पर आंच नहीं आने दी थी और ब्रिटीश हुकूमत की तमाम कोशिशें भी उनके बीच फूट नहीं डाल पाई थीं। फांसी के फंदे को चूमने से पहले उन्होंने सुबकती मां को ढांढस बंधाते हुए कहा कि फख्र करो कि बेटा देश के लिए मर मिटेगा, बगल की कालकोठरी में बंद कत्ल के आरोपियों के मानिंद नहीं
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कब्र पर चादरपोशी और कवि गोष्ठी आज
शहीद अशफाक उल्लाह के परपौत्र ने बताया कि शनिवार को यहां रेलवे स्टेशन के निकट एमनजई जलालनगर स्थित उनके आवास के पास ही बने कब्र पर चादर चढ़ाई जाएगी और दिन में कवि गोष्ठी का आयोजन होगा।
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