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नेहा के आखिरी शब्द, योगेश ने करोसिन डालकर जला दिया

संजीव पाठक/शाहजहांपुर। Updated Mon, 13 Apr 2015 11:20 PM IST
Neha's last words, Yogesh pour kerosene burned
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कहा जाता है कि मौत के मुहाने पर खड़ा आदमी कभी झूठ नहीं बोलता, लेकिन संवेदनहीन पुलिस उसकी बात पर भी ऐतवार नहीं करती। नेहा ने मजिस्ट्रेट को दिए बयान में साफ कहा कि जब वह रविवार शाम शौच को जा रही थी तो योगेश ने उसे पकड़ लिया। छेड़छाड़ करने लगा। गांव की दो महिलाओं ने उसे बचाया। सोमवार सुबह योगेश घर आया और मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी।
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नेहा को नब्बे फीसदी जली हालत में जब जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया तभी डॉक्टरों ने कह दिया था कि उसका बचना मुश्किल है, लेकिन शायद नेहा को यह मंजूर नहीं था कि वह योगेश को उसके किए की बात किसी सक्षम अधिकारी के सामने कहे बिना अंतिम सांस न ले। हुआ भी ऐसा ही। नेहा के बयान दर्ज करने के लिए मजिस्ट्रेट नियुक्त सदर तहसील के नायब तहसीलदार विजय त्रिवेदी जब अस्पताल पहुंचे तब तक नेहा की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।
मजिस्ट्रेट के पूछने पर नेहा ने जब घटना के बारे में बताना शुरू किया तो एक वाक्य बोलने के बाद ही उसकी आवाज लड़खड़ाने लगी। एक पल को वह खामोश हो गई। पानी मांगा और आंखें बंद कर लीं। लगा जैसे अपनी बची-खुची शक्ति बटोर रही हो ताकि उस दरिंदे का नाम बता सके जिसने उसे इस हाल में पहुंचा दिया। नेहा ने आंखें खोलीं और फिर एक सांस में वह सब कुछ बयां कर दिया जो उसके साथ घटा। नेहा के शब्दों में- लैट्रीन गए थे। उधर से हम लैट्रीन करके आए तो वो योगेश नाम का लड़का खड़ा था। उसने हमारे दोनों पौंचे (कलाइयां) पकड़ लिए। हमारे साथ छेड़छाड़ की और कहा वो करो, ये करो। हम बहुत विनती करते रहे फिर भी नहीं छोड़ा। उधर से वो आ रही थीं मेवाराम की दुल्हन, मनीराम की दुल्हन। उन्होंने हमें बचाया। हम घर आ गए। सुबह आकर उसने मेरे ऊपर मिट्टी का तेल डालकर मुझे जला दिया।
यह नेहा का अंतिम बयान है। इसके कुछ देर बाद ही उसकी जिला अस्पताल में मौत हो गई। नेहा के बयान के बावजूद रोजा पुलिस उसके आत्महत्या की कोशिश करने की बात पर अड़ी रही। दरअसल, पुलिस की इस मामले में कदम-दर-कदम लापरवाही रही है। नेहा के घरवालों ने रविवार को उसके साथ छेड़छाड़ होने पर ही थाने फोन करके घटना की सूचना दी थी लेकिन पुलिस ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें सुबह थाने आने का हुक्म सुना दिया।
पुलिस को कहां तत्परता दिखानी चाहिए थी और कहां दिखाई गई, इसकी भी बानगी देखिए। नेहा के घरवालों ने जब पुलिस को तहरीर दी और उसमें उसे नाबालिग बताया तो पुलिस तुरंत उसे बालिग साबित करने में जुट गई। आरोपी को गिरफ्तार करने की कोशिश के बजाय पुलिस ने सबसे ज्यादा वक्त ऐसा प्रमाण हासिल करने में जाया किया जिससे यह साबित हो सके कि नेहा नाबालिग नहीं बल्कि बालिग है। बकौल रोजा पुलिस, स्कूल का एक सर्टिफिकेट हाथ लग गया है जिसमें नेहा की जन्मतिथि एक जुलाई 1994 दर्ज है।
नेहा की अब जबकि मौत हो गई है तो पुलिस बैकफुट पर आ गई है। आत्महत्या की कोशिश के दावे के उलट अब कहा जाने लगा है कि मजिस्ट्रेट को दिए बयान के आधार पर मुकदमा आईपीसी की धारा 302 में तरमीम कर दिया गया है। यहां सवाल यह है कि अगर कहीं नेहा की मौत मजिस्ट्रेट को बयान देने से पहले हो जाती तब तो पुलिस उसके साथ हुए जघन्य अपराध को आत्महत्या मानकर मामला ही बंद कर चुकी होती।

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