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शहर की शान : विघटित होते समाज के लिए मिसाल बने खंडेलवाल ब्रदर्स
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शाहजहांपुर में परिवार के सदस्यों के साथ बैठे खंडेलवाल बंधु राजकुमार और अरुण कुमार। संवाद
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। शहर के प्रतिष्ठित परिवारों की शृंखला में लक्ष्मी नारायण खंडेलवाल का संयुक्त परिवार भी तेजी से विघटित होते समाज के लिए एक मिसाल है। करीब छह दशक पहले अलवर (राजस्थान) से विस्थापित होकर आए लक्ष्मी नारायण शहर की एक फर्म में मुलाजिम बने। वहां से शुरू हुई उनकी संघर्ष यात्रा में उनके बेटों ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। सामूहिक प्रयास कर उन्होंने शहर समेत आसपास के कई जिलों में कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर लिया। सक्षम- सम्पन्न होने के साथ ही यह परिवार शैक्षिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
लक्ष्मी नारायण के छह बेटों में चौथे नंबर के राजकुमार खंडेलवाल बताते हैं कि सन 1947 में देश की आजादी के कुछ साल बाद संभवत: 1952-53 के दौरान पिता जी परिवार लेकर शाहजहांपुर आ गए थे। गुजर-बसर के लिए शहर में तब के प्रमुख व्यावसायिक प्रतिष्ठान मैसर्स भानामल गुलजारी मल के यहां प्रबंधक की नौकरी की। उसी नौकरी के बूते सभी भाइयों समेत बहन रेखा को पढ़ाया-लिखाया, परवरिश की और मेहनत से जुटाई गई पूंजी से लोहामंडी में हार्डवेयर की दुकान शुरू की।
बकौल राजकुमार, तब तक वह सभी भाई सयाने होने के कारण पिता के काम में हाथ बंटाने लगे और सभी की मेहनत से कारोबार बढ़ने लगा। बेटों की शादी के बाद भी लक्ष्मी नारायण ने उन्हें अलग करने के बजाय साथ रखकर संयुक्त परिवार की अहमियत भी बता दी। नतीजे में सभी भाई वह सारा काम देखने लगे, जो पिता जी सौंपते थे। आज इस परिवार ने हार्डवेयर के साथ फर्नीचर, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर एसेसरीज, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि कई व्यवसायों में अपनी विश्वसनीयता कायम कर बाजार में गहरी जड़ें जमा लीं।
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दुनिया को अलविदा कहे लक्ष्मी नारायण को लगभग 35 वर्ष हो चुके हैं। दो दशक पहले उनकी पत्नी शांति देवी भी स्वर्ग सिधार चुकी हैं, लेकिन पूरा परिवार आज भी अपने माता-पिता की शिक्षा पर अमल करते हुए एकजुट है। हालांकि, कारोबारी मजबूरियों ने तीन भाइयों को अन्य शहरों में रहने को मजबूर कर दिया है। सबसे बड़े शिवकुमार खंडेलवाल बरेली में कारोबार जमा चुके हैं, लेकिन यहां का काम भी नियमित रूप से देखने आते हैं।
दूसरे नंबर के प्रेम कुमार खंडेलवाल बरेली में दो बेटों की मदद से कारोबार सींच रहे हैं। तीसरे नंबर के विजय कुमार दिल्ली में आयरन ट्रेड से जुड़े हैं। चौथे नंबर के राजकुमार खंडेलवाल और सबसे छोटे अरुण खंडेलवाल तक्षशिला पब्लिक स्कूल के जरिये शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं, जबकि पांचवें नंबर के किशन खंडेलवाल सभी भाइयों के बेटों की मदद से शहर में फर्नीचर व्यवसाय संभाले हैं।
दो विद्यालय गोद लेकर संवारी दशा
अपनी शिक्षण संस्था संचालित कर रहे खंडेलवाल बंधु राजकुमार और अरुण सामाजिक सरोकारों से भी स्वयं को जोड़े हुए हैं। दो वर्ष पहले खिरनीबाग में कालीबाड़ी मंदिर परिसर में संचालित विद्यालय वित्तीय संकट से बंद होने के कगार पर पहुंचा तो दोनों भाइयों ने उसे गोद ले लिया। आज वहां गरीब और निम्न आय वर्ग वाले परिवारों के 150 बच्चे पढ़ रहे हैं। अंटा के सरकारी स्कूल की दशा सुधारने को उसे भी गोद लिया, लेकिन वहां के स्टाफ की आपत्ति पर उसे बाद में छोड़ दिया। शहर में टाउनहाल समेत कई प्रमुख मंदिरों की सेवा से भी दोनों भाई जुड़े हैं। राजकुमार के अनुसार टापर के संत त्यागी जी महाराज के सानिध्य में आने पर उन्हीं की प्रेरणा से समाजसेवा की भावना जागृत हुई।
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लक्ष्मी नारायण के छह बेटों में चौथे नंबर के राजकुमार खंडेलवाल बताते हैं कि सन 1947 में देश की आजादी के कुछ साल बाद संभवत: 1952-53 के दौरान पिता जी परिवार लेकर शाहजहांपुर आ गए थे। गुजर-बसर के लिए शहर में तब के प्रमुख व्यावसायिक प्रतिष्ठान मैसर्स भानामल गुलजारी मल के यहां प्रबंधक की नौकरी की। उसी नौकरी के बूते सभी भाइयों समेत बहन रेखा को पढ़ाया-लिखाया, परवरिश की और मेहनत से जुटाई गई पूंजी से लोहामंडी में हार्डवेयर की दुकान शुरू की।
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बकौल राजकुमार, तब तक वह सभी भाई सयाने होने के कारण पिता के काम में हाथ बंटाने लगे और सभी की मेहनत से कारोबार बढ़ने लगा। बेटों की शादी के बाद भी लक्ष्मी नारायण ने उन्हें अलग करने के बजाय साथ रखकर संयुक्त परिवार की अहमियत भी बता दी। नतीजे में सभी भाई वह सारा काम देखने लगे, जो पिता जी सौंपते थे। आज इस परिवार ने हार्डवेयर के साथ फर्नीचर, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर एसेसरीज, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि कई व्यवसायों में अपनी विश्वसनीयता कायम कर बाजार में गहरी जड़ें जमा लीं।
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दुनिया को अलविदा कहे लक्ष्मी नारायण को लगभग 35 वर्ष हो चुके हैं। दो दशक पहले उनकी पत्नी शांति देवी भी स्वर्ग सिधार चुकी हैं, लेकिन पूरा परिवार आज भी अपने माता-पिता की शिक्षा पर अमल करते हुए एकजुट है। हालांकि, कारोबारी मजबूरियों ने तीन भाइयों को अन्य शहरों में रहने को मजबूर कर दिया है। सबसे बड़े शिवकुमार खंडेलवाल बरेली में कारोबार जमा चुके हैं, लेकिन यहां का काम भी नियमित रूप से देखने आते हैं।
दूसरे नंबर के प्रेम कुमार खंडेलवाल बरेली में दो बेटों की मदद से कारोबार सींच रहे हैं। तीसरे नंबर के विजय कुमार दिल्ली में आयरन ट्रेड से जुड़े हैं। चौथे नंबर के राजकुमार खंडेलवाल और सबसे छोटे अरुण खंडेलवाल तक्षशिला पब्लिक स्कूल के जरिये शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं, जबकि पांचवें नंबर के किशन खंडेलवाल सभी भाइयों के बेटों की मदद से शहर में फर्नीचर व्यवसाय संभाले हैं।
दो विद्यालय गोद लेकर संवारी दशा
अपनी शिक्षण संस्था संचालित कर रहे खंडेलवाल बंधु राजकुमार और अरुण सामाजिक सरोकारों से भी स्वयं को जोड़े हुए हैं। दो वर्ष पहले खिरनीबाग में कालीबाड़ी मंदिर परिसर में संचालित विद्यालय वित्तीय संकट से बंद होने के कगार पर पहुंचा तो दोनों भाइयों ने उसे गोद ले लिया। आज वहां गरीब और निम्न आय वर्ग वाले परिवारों के 150 बच्चे पढ़ रहे हैं। अंटा के सरकारी स्कूल की दशा सुधारने को उसे भी गोद लिया, लेकिन वहां के स्टाफ की आपत्ति पर उसे बाद में छोड़ दिया। शहर में टाउनहाल समेत कई प्रमुख मंदिरों की सेवा से भी दोनों भाई जुड़े हैं। राजकुमार के अनुसार टापर के संत त्यागी जी महाराज के सानिध्य में आने पर उन्हीं की प्रेरणा से समाजसेवा की भावना जागृत हुई।