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खेती में अव्वल, पशुपालन में पिछड़ा पुवायां
अमर उजाला ब्यूरो, शाहजहांपुर
Updated Sat, 08 Jul 2017 11:52 PM IST
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कृषि उत्पादन में प्रदेश में खास मुकाम हासिल करने वाली पुवायां तहसील गोपालन और संरक्षण के मामले में पिछड़ती जा रही है। खेती भी अब बैलों के बजाय मशीनरी पर निर्भर हो गई है। यही वजह है कि पशुपालन में किसानोें की रुचि घटती जा रही है। क्षेत्र में पशुपालन व्यवसायिक स्तर पर नहीं होने के कारण पशु अस्पतालों, चरागाहों, डेयरियों और गोसदनों का क्षेत्र में अभाव है।
आचार्य विनोबा भावे के आह्वान पर पुवायां तहसील में भी भूदान आंदोलन जोर-शोर से चला था। भूदान आंदोलन के कार्यकर्ता विश्वनाथ त्रिपाठी के पास इस खाते में लगभग 750 एकड़ भूमि आई थी। इसमें से गोसदन सिमरा वीरान के पास लगभग 383 एकड़ जमीन है। इसमें से कुछ भूमि रेशम और वन विभाग के पास है। शेष कृषि योग्य भूमि की आय से गोसदन का रखरखाव होता है। गोसदन में गोवंश की संख्या बढ़ाने के लिए कई संगठन सक्रिय रहे, लेकिन यह संख्या सौ से 120 के बीच ही रही। विशाल भूभाग की आय के बावजूद मात्र 100-120 गोवंश ही पशुपालन विभाग के पास हैं। आय के मुताबिक गोसदन में पशु संरक्षण की संख्या वृद्धि तो आवश्यक है ही, सदन की भूमि पर अत्याधुनिक पशु अस्पताल खोला जाना बेहद जरूरी है।
गोसदन की भूमि पर बने कृषि विश्वविद्यालय
गोसदन की जमीन पर कृषि विश्वविद्यालय बनने से क्षेत्र का विकास होने के साथ ही खेती में भी क्रांतिकारी परिवर्तन होंगे। रोजगार के नए अवसर बढ़ने से बेरोजगारी भी दूर होगी। कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गोसदन की भूमि उपयुक्त है। विश्व विद्यालय बनने से यहां कृषि उत्पादन में भी नए कीर्तिमान स्थापित होेंगे। गोवंश में बढ़ोतरी के साथ ही किसानों को नए अनुसंधानों का लाभ मिलेगा।
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धड़ल्ले से बिक रहा मिलावटी दूध
पशुपालन की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिए जाने का खामियाजा पशुपालकों के अलावा अन्य लोगों को भी भुगतना पड़ता है। पशुओं की कमी के कारण मिलावटी दूध की धड़ल्ले से बिक्री की जा रही है जिससे फायदे की बजाय नुकसान पहुंच रहा है। मतलब साफ है कि क्षेत्र में दूध की भारी मांग और कम उपलब्धता के कारण मिलावटी दूध धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। दूध की कमी ने कुछ कारोबारियों को मालामाल कर दिया है। यह लोग नकली दूध को तैयार कर खुलेआम बेच रहे हैं।
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आचार्य विनोबा भावे के आह्वान पर पुवायां तहसील में भी भूदान आंदोलन जोर-शोर से चला था। भूदान आंदोलन के कार्यकर्ता विश्वनाथ त्रिपाठी के पास इस खाते में लगभग 750 एकड़ भूमि आई थी। इसमें से गोसदन सिमरा वीरान के पास लगभग 383 एकड़ जमीन है। इसमें से कुछ भूमि रेशम और वन विभाग के पास है। शेष कृषि योग्य भूमि की आय से गोसदन का रखरखाव होता है। गोसदन में गोवंश की संख्या बढ़ाने के लिए कई संगठन सक्रिय रहे, लेकिन यह संख्या सौ से 120 के बीच ही रही। विशाल भूभाग की आय के बावजूद मात्र 100-120 गोवंश ही पशुपालन विभाग के पास हैं। आय के मुताबिक गोसदन में पशु संरक्षण की संख्या वृद्धि तो आवश्यक है ही, सदन की भूमि पर अत्याधुनिक पशु अस्पताल खोला जाना बेहद जरूरी है।
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गोसदन की भूमि पर बने कृषि विश्वविद्यालय
गोसदन की जमीन पर कृषि विश्वविद्यालय बनने से क्षेत्र का विकास होने के साथ ही खेती में भी क्रांतिकारी परिवर्तन होंगे। रोजगार के नए अवसर बढ़ने से बेरोजगारी भी दूर होगी। कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गोसदन की भूमि उपयुक्त है। विश्व विद्यालय बनने से यहां कृषि उत्पादन में भी नए कीर्तिमान स्थापित होेंगे। गोवंश में बढ़ोतरी के साथ ही किसानों को नए अनुसंधानों का लाभ मिलेगा।
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धड़ल्ले से बिक रहा मिलावटी दूध
पशुपालन की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिए जाने का खामियाजा पशुपालकों के अलावा अन्य लोगों को भी भुगतना पड़ता है। पशुओं की कमी के कारण मिलावटी दूध की धड़ल्ले से बिक्री की जा रही है जिससे फायदे की बजाय नुकसान पहुंच रहा है। मतलब साफ है कि क्षेत्र में दूध की भारी मांग और कम उपलब्धता के कारण मिलावटी दूध धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। दूध की कमी ने कुछ कारोबारियों को मालामाल कर दिया है। यह लोग नकली दूध को तैयार कर खुलेआम बेच रहे हैं।