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आजादी की राह में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी मुसीबत
Shahjahanpur
Updated Wed, 14 Aug 2013 05:37 AM IST
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- भ्रष्ट तंत्र के शिकंजे में जकड़ी अभिमत की आजादी
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। अभिव्यक्ति की आजादी भारतीय संविधान में निहित प्रमुख मौलिक अधिकारों में से एक है, लेकिन देश को स्वतंत्रता मिलने के छह दशक बाद भी विचारों की स्वतंत्रता का हनन यह प्रमाणित करता है कि नागरिकों का यह मौलिक अधिकार उनकी आजादी की राह में बाधक बन रहा है। चाहे सोशल मीडिया हो या फिर सूचना का अधिकार अधिनियम, इन प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल करने वालों को प्रताड़ित किए जाने के किस्से आम हो रहे हैं।
यहां ग्रामीण परिवेश में पले-ढले दो ऐसे ही युवाओं की बात आपके सामने रखते हैं जिन्होंने आजाद भारत में जन्म लिया, लेकिन मौलिक अधिकार परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हैं। ये वे लोग हैं जिनकी गिनती आम आदमी में है, लेकिन खुद केअधिकार छिनते देख आरटीआई के जरिए दूसरों को भी हक दिलाने की लड़ाई में कूद पड़े। सूचनाएं पाने की कानून सम्मत आजादी पर अब दबंग डाका डाल रहे और पहरुए खामोश हैं।
अधिकारी कर रहे दोषियों का बचाव
‘पिछले साल दो जुलाई को विकास में भ्रष्टाचार को लेकर ग्राम प्रधान के खिलाफ लड़ाई शुरू की। शिकायतों पर जांच को जिला गन्ना अधिकारी और जेई आरईएस ने मोकेपर सत्यापन किया तो तमाम अनियमितताएं मिलीं। प्रधान केवित्तीय अधिकार सीज हुए, लेकिन अकारण फिर बहाल हो गए। तब से कई पत्र दिए, लेकिन अधिकार कैसे बहाल हुए, कोई नहीं बता रहा। अफसरों के बर्ताव से यही लगता है कि वे दोषियों के बचाव को आमादा हैं।’
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-भोला यादव, ग्राम अस्तोली (मिर्जापुर)
आरटीआई के सवालों पर मिलीं धमकियां
‘ग्राम प्रधान के स्तर से विकास कार्य में हुए घोटालों से जुड़े सवाल जन सूचना अधिकारी को देने के बाद से ही तरह-तरह के लोभ-लालच देकर आरटीआई आवेदन लेने का दबाव बनाया जाने लगा। फैसले पर डटे रहने की दशा में उनकी खीझ गुस्से में बदलने लगी। यह नाराजगी धमकियों केतौर पर अक्सर सुनाई दे जाती है। दूसरी ओर, यहां से नियत समय सीमा में कोई उत्तर नहीं मिलने पर राज्य सूचना आयोग की शरण ली है।’
-गुड्डी यादव, क्षेत्र पंचायत सदस्य, अस्तोली (मिर्जापुर)
मौजमस्ती का जरिया
बना आजादी का पर्व
जिसने बचपन में 15 अगस्त और 26 जनवरी पर अपने स्कूल में बटने वाले लड्डू खाए होंगे, उन्हें तब और अब आजादी के मायनों का फर्क बहुत सालता होगा। शिक्षण संस्थाओं में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा। प्रभात फेरी गिने-चुने स्कूल निकालते हैं। अब दृश्य बदल गए हैं। देश प्रेम से कोसों दूर अधिकांश युवा डीजे पर डांस कर इंडिपेंडेंस डे सेलिब्रेट करते दिख लाएंगे। सन् 1947 से 60 तक और उससे आगे से अब तक के दौर में आजादी पर्व में बदलावों पर कुछ कहना चाहें तो कृपया दोपहर 12 से एक बजे के बीच टेलीफोन नंबर 7897738255 पर जरूर संपर्क करें।
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अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर। अभिव्यक्ति की आजादी भारतीय संविधान में निहित प्रमुख मौलिक अधिकारों में से एक है, लेकिन देश को स्वतंत्रता मिलने के छह दशक बाद भी विचारों की स्वतंत्रता का हनन यह प्रमाणित करता है कि नागरिकों का यह मौलिक अधिकार उनकी आजादी की राह में बाधक बन रहा है। चाहे सोशल मीडिया हो या फिर सूचना का अधिकार अधिनियम, इन प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल करने वालों को प्रताड़ित किए जाने के किस्से आम हो रहे हैं।
यहां ग्रामीण परिवेश में पले-ढले दो ऐसे ही युवाओं की बात आपके सामने रखते हैं जिन्होंने आजाद भारत में जन्म लिया, लेकिन मौलिक अधिकार परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हैं। ये वे लोग हैं जिनकी गिनती आम आदमी में है, लेकिन खुद केअधिकार छिनते देख आरटीआई के जरिए दूसरों को भी हक दिलाने की लड़ाई में कूद पड़े। सूचनाएं पाने की कानून सम्मत आजादी पर अब दबंग डाका डाल रहे और पहरुए खामोश हैं।
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अधिकारी कर रहे दोषियों का बचाव
‘पिछले साल दो जुलाई को विकास में भ्रष्टाचार को लेकर ग्राम प्रधान के खिलाफ लड़ाई शुरू की। शिकायतों पर जांच को जिला गन्ना अधिकारी और जेई आरईएस ने मोकेपर सत्यापन किया तो तमाम अनियमितताएं मिलीं। प्रधान केवित्तीय अधिकार सीज हुए, लेकिन अकारण फिर बहाल हो गए। तब से कई पत्र दिए, लेकिन अधिकार कैसे बहाल हुए, कोई नहीं बता रहा। अफसरों के बर्ताव से यही लगता है कि वे दोषियों के बचाव को आमादा हैं।’
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-भोला यादव, ग्राम अस्तोली (मिर्जापुर)
आरटीआई के सवालों पर मिलीं धमकियां
‘ग्राम प्रधान के स्तर से विकास कार्य में हुए घोटालों से जुड़े सवाल जन सूचना अधिकारी को देने के बाद से ही तरह-तरह के लोभ-लालच देकर आरटीआई आवेदन लेने का दबाव बनाया जाने लगा। फैसले पर डटे रहने की दशा में उनकी खीझ गुस्से में बदलने लगी। यह नाराजगी धमकियों केतौर पर अक्सर सुनाई दे जाती है। दूसरी ओर, यहां से नियत समय सीमा में कोई उत्तर नहीं मिलने पर राज्य सूचना आयोग की शरण ली है।’
-गुड्डी यादव, क्षेत्र पंचायत सदस्य, अस्तोली (मिर्जापुर)
मौजमस्ती का जरिया
बना आजादी का पर्व
जिसने बचपन में 15 अगस्त और 26 जनवरी पर अपने स्कूल में बटने वाले लड्डू खाए होंगे, उन्हें तब और अब आजादी के मायनों का फर्क बहुत सालता होगा। शिक्षण संस्थाओं में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा। प्रभात फेरी गिने-चुने स्कूल निकालते हैं। अब दृश्य बदल गए हैं। देश प्रेम से कोसों दूर अधिकांश युवा डीजे पर डांस कर इंडिपेंडेंस डे सेलिब्रेट करते दिख लाएंगे। सन् 1947 से 60 तक और उससे आगे से अब तक के दौर में आजादी पर्व में बदलावों पर कुछ कहना चाहें तो कृपया दोपहर 12 से एक बजे के बीच टेलीफोन नंबर 7897738255 पर जरूर संपर्क करें।