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बारिश के लिए अपनाए टोटके
ब्यूरो/अमर उजाला संतकबीरनगर
Updated Wed, 29 Jun 2016 11:50 PM IST
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काल-कलौटी करते बच्चे।
- फोटो : अंबरीश मिश्रा
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आसमान में बादल भले ही उमड़ रहे है, लेकिन बारिश की आस लगाए किसानों की उम्मीदें पूरी नहीं हो रही है। धान का बेहन डाल चुके किसान बारिश नहीं होने से चिंतित है। काल-कलौटी, उज्जर धोती, मेघा .....पानी दे, की कहावत अब लोगों को याद आने लगी है। बरसात के लिए बुधवार को कुसफर में बच्चे काल-कलौटी खेलते देखे गए।
बारिश होने की आस में किसान उम्मीद भरी निगाहों से बादल की तरफ टकटकी लगाए है। छिटपुट बूंदाबांदी होने से इंकार तो नहीं किया जा सकता लेकिन खेतों में नमी पहुंचाने के लिए अभी बारिश नहीं हुई है। लोगों ने कुछ क्षेत्रीय टोटकों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। इसमें एक काल-कलौटी का खेल प्रमुख टोटका है। इस समय गांव-गांव में बच्चों ने एक टोली बनाकर काल-कलौटी खेलना शुरू कर दिया। इसमें पहले बच्चे गांव में घरों के सामने कई बाल्टी पानी एकत्रित करके उसमें कीचड़ से सराबोर हो जाते हैं। इसके बाद इसमें शामिल बच्चे काल-कलौटी, उज्जर धोती, मेघा.....पानी दे का गाना गाकर घरों पर कीचड़ फेंकते हैं। इन घरों से बच्चों को आंटा, चावल, आलू, तेल, मसाला, हल्दी, नमक खाद्यसामग्री दिया जाता है। इसके बाद बच्चे बड़ों के संरक्षण में पोखरे और नलों पर नहाने के बाद बगीचे में लीटी-चोखा बनाकर एक सहभोज कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कुछ बुजुर्गों ने बताया कि पहले यह कार्यक्रम गांवों में बिना किसी भेदभाव के बारिश नहीं होने पर होते थे। पर इस समय गांवों में एकरूपता का भाव नहीं होने के कारण यह कार्यक्रम कुछ गांव में ही आयोजित होते है।
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बारिश होने की आस में किसान उम्मीद भरी निगाहों से बादल की तरफ टकटकी लगाए है। छिटपुट बूंदाबांदी होने से इंकार तो नहीं किया जा सकता लेकिन खेतों में नमी पहुंचाने के लिए अभी बारिश नहीं हुई है। लोगों ने कुछ क्षेत्रीय टोटकों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। इसमें एक काल-कलौटी का खेल प्रमुख टोटका है। इस समय गांव-गांव में बच्चों ने एक टोली बनाकर काल-कलौटी खेलना शुरू कर दिया। इसमें पहले बच्चे गांव में घरों के सामने कई बाल्टी पानी एकत्रित करके उसमें कीचड़ से सराबोर हो जाते हैं। इसके बाद इसमें शामिल बच्चे काल-कलौटी, उज्जर धोती, मेघा.....पानी दे का गाना गाकर घरों पर कीचड़ फेंकते हैं। इन घरों से बच्चों को आंटा, चावल, आलू, तेल, मसाला, हल्दी, नमक खाद्यसामग्री दिया जाता है। इसके बाद बच्चे बड़ों के संरक्षण में पोखरे और नलों पर नहाने के बाद बगीचे में लीटी-चोखा बनाकर एक सहभोज कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कुछ बुजुर्गों ने बताया कि पहले यह कार्यक्रम गांवों में बिना किसी भेदभाव के बारिश नहीं होने पर होते थे। पर इस समय गांवों में एकरूपता का भाव नहीं होने के कारण यह कार्यक्रम कुछ गांव में ही आयोजित होते है।
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