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Sant Kabir Nagar News: मौन हुईं कजरी की स्वर लहरियां, अखाड़ों पर उगीं झाड़ियां

Fri, 14 Aug 2026 11:34 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Fri, 14 Aug 2026 11:34 PM IST
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The melodious strains of Kajari have fallen silent; thickets have overgrown the *akhadas*.
हरिहरपुर। आधुनिकता की दौड़ में छूटती जा रही गांव की परंपराएं अब इतिहास बनती जा रही हैं। पेड़ों की डालियों पर पड़े झूलों से उठते कजरी गीतों की स्वर लहरियां भी अब मौन हो गई हैं। पहले इन परंपराओं में गांवों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती थी।
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युवाओं को सेहत और अनुशासन का पाठ पढ़ाते अखाड़े अब हाशिए पर जाते दिख रहे हैं। जहां अखाड़े थे वहां झाड़ियां उग आई हैं। आलम यह है कि आज सोशल मीडिया और आधुनिकता की चकाचौंध में युवाओं की सेहत के साथ गांव की परंपराएं सिर्फ यादों में जिंदा हैं।
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करीब दो दशक पहले सावन की पहली फुहार पड़ते ही गांव के अखाड़े गुलजार हो जाते थे। गांव के युवा अखाड़ों में दांवपेंच सीखने के साथ ही अपने उस्ताद से अनुशासन का पाठ सीखते थे। गांव के किशोर अपने बड़ों का अनुसरण करते हुए अखाड़े और खेल के मैदान में अपनी कलाबाजियां दिखाते थे।
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यह अखाड़े और खेल के मैदान ही नहीं थे बल्कि सेहत और अनुशासन की पाठशाला भी थे। सावन का महीना गांवों के लिए उत्सव वाला होता था। इस माह में गांवों की ब्याही बेटियां मायके में पहुंचती थीं और सहेलियों से मिलकर एक दूसरे की बातों को साझा करती थीं।
बागों में आम, नीम और महुआ की डालियों पर पड़े झूले और उन झूलों पर झूला झूलती महिलाओं और युवतियों के कजरी गीत सावन भर गूंजते रहते थे। मल्हार और कजरी गीतों में बिरह और शृंगार रस की प्रधानता होती थी।
गीतों में उलाहना, शिकायत के साथ मिलन की खुशियों का अहसास भी छिपा होता था। यह मन के भावों को गीतों के जरिये व्यक्त करने का एक भावुक साधन था। गांवों में आल्हा गायक पहुंचकर लोगों को वीर रस के गीत सुनाते थे। नागपंचमी के दिन बहनें भाइयों के साथ गीत गाते, जलाशयों पर जाकर गुड़ियों का विसर्जन करती थीं।
आधुनिकता ने आज गांवों का वह सुकून छीन लिया है, जिसकी छांव में परिवार और समाज का आपसी प्रेम व सद्भाव पनपता था।

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पहले सावन का महीना ढेर सारी खुशियां लेकर आता था। विवाह के बाद ससुराल गई युवतियों को सावन का बेसब्री से इंतजार रहता था। मायके की राह देखते भाइयों का इंतजार करती थीं। भाई के पहुंचने की वह खुशी आज भी याद आती है।
-मीरा शुक्ला, गृहणी
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सावन में मायके जाने और शादी के बाद बिछड़ गई सहेलियों से मिलने की आस और उनसे ढेर सारी बातें करने के भाव मन में उठते रहते थे। सहेलियों के साथ कजरी गीत गाने की यादें, सावन महीने का वह उत्साह और उमंग आज भी याद आता है।
-रीता पटेल, गृहणी
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रोजगार और बच्चों की शिक्षा के लिए लोग गांवों से पलायन करते जा रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और तकनीकी पढ़ाई के चलते गांव की युवा शहरों में बसने लगे हैं। इसके चलते गांव में अब खेल और कुश्ती की परंपरा भी बंद हो गई।

-हनुमान पटेल, ग्रामीण
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पहले गांव के अखाड़े और खेल के मैदान युवाओं को सेहत और अनुशासन की सीख देते थे। मोबाइल फोन और आधुनिकता के चलते अब युवाओं ने इन सबसे मुंह मोड़ लिया है। आज जहां अखाड़े और खेल के मैदान थे वहां झाड़ियां उग आई हैं।
-रघुपति यादव, ग्रामीण
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