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कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना ढढ़वा ताल
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कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना ढढ़वा ताल
- किसान बोले, ताल की सफाई न होने और अतिक्रमण से है परेशानी
संवाद न्यूज एजेंसी
धनघटा। क्षेत्र के लिए कभी वरदान कहा जाने वाला ढढ़वा ताल, अब परेशानी का कारण बन गया है।
सफाई और अतिक्रमण की वजह से ताल अपना अस्तित्व खोता नजर आ रहा है। क्षेत्र के किसानों का कहना है कि ढढ़वा ताल कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना। ताल करीब 25 से 30 किलोमीटर लंबाई में फैला है।
किसानों का कहना है कि फसल बचाने में कभी मददगार साबित होने के साथ मछली और कवलगट्टा की पैदावार करके रोजगार देने वाला यह ताल अतिक्रमण का शिकार होकर रह गया है। ताल से जलनिकासी न होने की वजह से सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य भूमि हमेशा पानी में डूबी रहती हैं, वहीं ताल में उपजा खरपतवार कवलगटा और मछली के पैदावार पर रोक लगा दिया है।
धनघटा से उमरिया बाजार, भैसाखुट, हैसर बाजार, पटखौली होकर गायगाई बसंतपुर के पास जाकर कुआनो नदी में मिलने वाला यह ताल अब समीपवर्ती गांव के किसानों के बर्बादी का कारण बन गया है। किसान जयप्रकाश, जय राम, सभापति, हामिद, सुरेंद्र, जगरनाथ का कहना है कि ताल कभी घाघरा नदी का छोर हुआ करता था। नदी का पानी बरसात के समय ताल में मिल जाता था और जब नदी घटने लगती थी तो ताल का पानी धीरे-धीरे नदी में चला जाता था। नदी से पानी आने की वजह से मछलियां भी खबू आती थीं। कवलगट्टा भी खूब उपजता था। किसानों का कहना है कि अब ताल उमरिया बाजार से लेकर कई जगहों पर अतिक्रमण का शिकार हो गया है। ताल में मिट्टी डालकर लोगों ने मकान का निर्माण करा लिया है। जलनिकासी न होने के कारण धनघटा, बकौली कला, डिहवा, दीपपुर, सिसवा, मदरा, लहुरेगाव, उमरिया बाजार, नेतवापुर, भैसाखुट आदि गांव के किसानों का खेत पानी में डूबा रहता है। किसानों का कहना है कि ताल की सफाई कराने की तरफ किसी जनप्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया। ताल की सफाई और सुंदरीकरण कराना कभी चुनावी मुद्दा भी नहीं बन पाया। ताल का सुंदरीकरण हो जाने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं पहले की तरह प्रवासी पक्षी भी आना शुरू कर देंगे।
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- किसान बोले, ताल की सफाई न होने और अतिक्रमण से है परेशानी
संवाद न्यूज एजेंसी
धनघटा। क्षेत्र के लिए कभी वरदान कहा जाने वाला ढढ़वा ताल, अब परेशानी का कारण बन गया है।
सफाई और अतिक्रमण की वजह से ताल अपना अस्तित्व खोता नजर आ रहा है। क्षेत्र के किसानों का कहना है कि ढढ़वा ताल कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना। ताल करीब 25 से 30 किलोमीटर लंबाई में फैला है।
किसानों का कहना है कि फसल बचाने में कभी मददगार साबित होने के साथ मछली और कवलगट्टा की पैदावार करके रोजगार देने वाला यह ताल अतिक्रमण का शिकार होकर रह गया है। ताल से जलनिकासी न होने की वजह से सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य भूमि हमेशा पानी में डूबी रहती हैं, वहीं ताल में उपजा खरपतवार कवलगटा और मछली के पैदावार पर रोक लगा दिया है।
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धनघटा से उमरिया बाजार, भैसाखुट, हैसर बाजार, पटखौली होकर गायगाई बसंतपुर के पास जाकर कुआनो नदी में मिलने वाला यह ताल अब समीपवर्ती गांव के किसानों के बर्बादी का कारण बन गया है। किसान जयप्रकाश, जय राम, सभापति, हामिद, सुरेंद्र, जगरनाथ का कहना है कि ताल कभी घाघरा नदी का छोर हुआ करता था। नदी का पानी बरसात के समय ताल में मिल जाता था और जब नदी घटने लगती थी तो ताल का पानी धीरे-धीरे नदी में चला जाता था। नदी से पानी आने की वजह से मछलियां भी खबू आती थीं। कवलगट्टा भी खूब उपजता था। किसानों का कहना है कि अब ताल उमरिया बाजार से लेकर कई जगहों पर अतिक्रमण का शिकार हो गया है। ताल में मिट्टी डालकर लोगों ने मकान का निर्माण करा लिया है। जलनिकासी न होने के कारण धनघटा, बकौली कला, डिहवा, दीपपुर, सिसवा, मदरा, लहुरेगाव, उमरिया बाजार, नेतवापुर, भैसाखुट आदि गांव के किसानों का खेत पानी में डूबा रहता है। किसानों का कहना है कि ताल की सफाई कराने की तरफ किसी जनप्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया। ताल की सफाई और सुंदरीकरण कराना कभी चुनावी मुद्दा भी नहीं बन पाया। ताल का सुंदरीकरण हो जाने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं पहले की तरह प्रवासी पक्षी भी आना शुरू कर देंगे।
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