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संत कबीर के दरवाजे पर सिसक रहा बापू का विचार

Fri, 18 Jan 2019 12:36 AM IST
राकेश पांडेय संतकबीरनगर
संतकबीरनगर Published by: राकेश पांडेय Updated Fri, 18 Jan 2019 12:36 AM IST
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Bapu's idea of being a sakha at the door of Saint Kabir
संत कबीर के दरवाजे पर सिसक रहा बापू का विचार - फोटो : अमर उजाला

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संतकबीरनगर। खादी वस्त्र नहीं विचार है। अक्सर कार्यक्रमों में नेताओं के मुंह से यह बयान सुना होगा। चौदहवीं शताब्दी में दुनिया को सदाचार सिखाने वाले सूफी संत कबीर और 19वीं सदी में आजादी के साथ-साथ अहिंसा का मार्ग दिखाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी में अन्य बातों के अलावा जो सबसे बड़ी समानता थी वह यह कि दोनों ही सूत कातकर अपनी जरूरत पूरी करते थे। आजादी के बाद मगहर की पवित्र धरती पर दोनों महान संतों का संदेश एक साथ  पल्वित हुआ। कबीरचौरा के ठीक सामने ही 27 एकड़ क्षेत्रफल में विशाल गांधी आश्रम परिसर है। कताई, रंगाई, छपाई बंद होने से यह परिसर सुनसान पड़ा है। यहां के कर्मचारी फिर किसी कबीर या गांधी के आने का इंतजार कर रहे हैं। 


मगहर कस्बा व आसपास का ग्रामीण क्षेत्र बुनकर बहुल है। वर्ष-1955 में यहां कबीरचौरा परिसर के ठीक सामने 27 एकड़ क्षेत्रफल में गांधी आश्रम की स्थापना हुई। इस आश्रम में वर्ष-1974 से कार्यरत अकाउंटेंट रामजी पांडेय बताते हैं कि नब्बे के दशक तक यहां करीब साढ़े आठ सौ कर्मचारी कार्य करते थे। यह सेंटर यूपी का तीसरा क्षेत्रीय संचालन केंद्र था। लंबे समय तक लखनऊ, गोंडा, बहराइच, बस्ती, गोरखपुर व देवरिया जिले के गांधी आश्रमों का संचालन यहीं से होता था। आश्रम के कर्मचारी मुनीस प्रसाद उपाध्याय ने बताया कि यहां से कतिन (सूत कातने वाली महिलाएं) रूई ले जाती थीं और सूत दे जाती थीं। बुनकर सूत लेकर कपड़ा दे जाते थे, जिसकी यहां रंगाई, छपाई का कार्य होता था। कोल्हू वाले बैल से सरसों की पेराई भी होती थी। साबुन भी बनता था, लेकिन यह सारे कार्य अब ठप हो चुके हैं। कर्मचारियों को 42 महीने से वेतन नहीं मिला। 
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