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महंगाई की मार से चौपट हो रहा पॉवरलूम का कारोबार
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महंगाई की मार से चौपट हो रहा पॉवरलूम का कारोबार
बुनकरों की समस्या कभी नहीं बन पाई चुनावी मुद्दा
हर सप्ताह बढ़ रहा सूत का दाम, तैयार माल भी डंप
बिजली और पूंजी की कमी से भी प्रभावित हो रहा व्यवसाय
शोभित कुमार पांडेय
संतकबीरगर। कभी पॉवरलूम कारोबार से आबाद रहा जिला अब बुनकरों की आह से कराह रहा है। पीढ़ियों से हूनरमंद हाथों से लिबास बुनने वाली यह जमात अब संसाधनों की कमी और सियासतदानों की बेरुखी से व्यथित है। हर सप्ताह बढ़ती सूत की महंगाई और तैयार माल की खपत नहीं होने से धंधा चौपट हो रहा है। अधिकांश पॉवरलूम बंद हो चुके हैं और नई पीढ़ी धंधे से तौबा कर रही है। बुनकरों की यही पीड़ा है कि कभी उनकी समस्या चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती है।
बुनकर बहुल बस्तियों की गिनती में आगे रहा जिला अपनी उस पहचान को कायम रखने में शायद ही कामयाब रहे। वजह साफ है कि इन बस्तियों में हथकरघे और पॉवरलूम की तेज आवाज थम गई है। अपने पुरनियों से सीखी कपड़ा बुनने की कलाकारी, अब उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए तरसा रही है। बढ़ती सूत की महंगाई ने कारोबार पर ग्रहण लगा दिया है। जिले के खलीलाबाद, अमरडोभा, लेडुआ-महुआ, मेंहदावल कस्बा, बेलहर कला, मगहर कस्बे की गलियों में अपनी कारीगरी से कपड़ा बुनते बुनकरों की बेबसी देखी जा सकती है। समय की मार और सरकारों की उपेक्षा ने इलाके के सैकड़ों परिवारों को बदहाली की कगार पर ला दिया है। धागों की गठजोड़ से सबके लिए तन ढकने का इंतजाम करने वाले बुनकरों की जिंदगी इन्हीं धागों के बीच उलझ कर रह गई है। कभी इन गलियों के बीच चहकती जिंदगी अब बेरंग है। बुनकरों की मानें तो सूबे की सरकारों से लेकर दिल्ली की सरकारों तक ने इनके लिए कुछ नहीं किया। पुरानी पीढ़ी के दौर में हथकरघे तकनीक की भेंट चढ़ गए तो नए जमाने में पॉवरलूम सूत की महंगाई से थम गए हैं। कोविड काल के बाद से चौपट हुआ धंधा अभी पटरी पर लौट नहीं पा रहा है। चुनाव आता है तो उम्मीद बंधती है, लेकिन बुनकरों की समस्या कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती है।
सूत के दाम लगातार बढ़ने से समस्या खड़ी हो गई है। तैयार माल का खपत नहीं हो पा रहा है। जिससे बुनकरों की पूंजी फंस गई है। बरईपार में बुनकरों के लिए अलग से बिजली से फीडर बन रहा है, जिसकी गति सुस्त है। इसके बन जाने से बिजली की समस्या समाप्त हो जाएगी। लेडुआ, महुआ बुनकर बहुल है और यहां एक भी जूनियर हाईस्कूल नहीं है। बंद मगहर कताई मिल और प्रोसेस हाउस खलीलाबाद को चालू कराना चाहिए। चुनाव में यह मुद्दा बनना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।
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- हाजी इमामुद्दीन अंसारी, जिलाध्यक्ष बुनकर सभा
यह धंधा उनके पुर्खे भी करते थे। 1972 से पुश्तैनी धंधे को वह आगे बढ़ा रहे थे। गमछा, लुंगी, शर्टिग बनाते हैं। एक साल के भीतर सूत का दाम हर सप्ताह बढ़ता है। तैयार माल की खपत नहीं हो पा रही है। जिसकी वजह से पॉवरलूम बंद होते जा रहे हैं। बुनकरों की समस्या चुनाव में मुद्दा बनना चाहिए।
- बदरुज्जमा अंसारी, अंसार टोला
पीढ़ियों से यह परिवार का धंधा रहा है। मोहल्ले में 90 प्रतिशत से अधिक कारखाने बंद हो गए हैं। जिसकी वजह सूत की महंगाई है। दो साल के भीतर प्रति बंडल सूत का दाम 600 रुपये बढ़ गया है। सूत के बंडल पर मूल्य भी अंकित नहीं रहता है। महाजन मनमाने दर पर बेचते हैं। बिजली का जो प्लैट दर है, उसमें सब्सिडी की रकम की कटौती विद्युत निगम नहीं कर रहा है। जिसकी वजह से समस्या बढ़ती ही जा रही है।
- वसी अहमद अंसारी, अंसार टोला
सूत की महंगाई और बिजली की समस्या ने धंधे को चौपट कर दिया है। उनके पास पहले चार पॉवरलूम था, जिसमें से तीन बंद हो चुका है। सिर्फ एक पॉवरलूम चल रहा है। तैयार माल डंफ पड़ा है। हर सप्ताह सूत का दाम बढ़ना, चिंता का विषय बन गया है। सरकारों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- सरफुदुज्जा अंसारी, अंसार टोला
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बुनकरों की समस्या कभी नहीं बन पाई चुनावी मुद्दा
हर सप्ताह बढ़ रहा सूत का दाम, तैयार माल भी डंप
बिजली और पूंजी की कमी से भी प्रभावित हो रहा व्यवसाय
शोभित कुमार पांडेय
संतकबीरगर। कभी पॉवरलूम कारोबार से आबाद रहा जिला अब बुनकरों की आह से कराह रहा है। पीढ़ियों से हूनरमंद हाथों से लिबास बुनने वाली यह जमात अब संसाधनों की कमी और सियासतदानों की बेरुखी से व्यथित है। हर सप्ताह बढ़ती सूत की महंगाई और तैयार माल की खपत नहीं होने से धंधा चौपट हो रहा है। अधिकांश पॉवरलूम बंद हो चुके हैं और नई पीढ़ी धंधे से तौबा कर रही है। बुनकरों की यही पीड़ा है कि कभी उनकी समस्या चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती है।
बुनकर बहुल बस्तियों की गिनती में आगे रहा जिला अपनी उस पहचान को कायम रखने में शायद ही कामयाब रहे। वजह साफ है कि इन बस्तियों में हथकरघे और पॉवरलूम की तेज आवाज थम गई है। अपने पुरनियों से सीखी कपड़ा बुनने की कलाकारी, अब उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए तरसा रही है। बढ़ती सूत की महंगाई ने कारोबार पर ग्रहण लगा दिया है। जिले के खलीलाबाद, अमरडोभा, लेडुआ-महुआ, मेंहदावल कस्बा, बेलहर कला, मगहर कस्बे की गलियों में अपनी कारीगरी से कपड़ा बुनते बुनकरों की बेबसी देखी जा सकती है। समय की मार और सरकारों की उपेक्षा ने इलाके के सैकड़ों परिवारों को बदहाली की कगार पर ला दिया है। धागों की गठजोड़ से सबके लिए तन ढकने का इंतजाम करने वाले बुनकरों की जिंदगी इन्हीं धागों के बीच उलझ कर रह गई है। कभी इन गलियों के बीच चहकती जिंदगी अब बेरंग है। बुनकरों की मानें तो सूबे की सरकारों से लेकर दिल्ली की सरकारों तक ने इनके लिए कुछ नहीं किया। पुरानी पीढ़ी के दौर में हथकरघे तकनीक की भेंट चढ़ गए तो नए जमाने में पॉवरलूम सूत की महंगाई से थम गए हैं। कोविड काल के बाद से चौपट हुआ धंधा अभी पटरी पर लौट नहीं पा रहा है। चुनाव आता है तो उम्मीद बंधती है, लेकिन बुनकरों की समस्या कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती है।
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सूत के दाम लगातार बढ़ने से समस्या खड़ी हो गई है। तैयार माल का खपत नहीं हो पा रहा है। जिससे बुनकरों की पूंजी फंस गई है। बरईपार में बुनकरों के लिए अलग से बिजली से फीडर बन रहा है, जिसकी गति सुस्त है। इसके बन जाने से बिजली की समस्या समाप्त हो जाएगी। लेडुआ, महुआ बुनकर बहुल है और यहां एक भी जूनियर हाईस्कूल नहीं है। बंद मगहर कताई मिल और प्रोसेस हाउस खलीलाबाद को चालू कराना चाहिए। चुनाव में यह मुद्दा बनना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।
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- हाजी इमामुद्दीन अंसारी, जिलाध्यक्ष बुनकर सभा
यह धंधा उनके पुर्खे भी करते थे। 1972 से पुश्तैनी धंधे को वह आगे बढ़ा रहे थे। गमछा, लुंगी, शर्टिग बनाते हैं। एक साल के भीतर सूत का दाम हर सप्ताह बढ़ता है। तैयार माल की खपत नहीं हो पा रही है। जिसकी वजह से पॉवरलूम बंद होते जा रहे हैं। बुनकरों की समस्या चुनाव में मुद्दा बनना चाहिए।
- बदरुज्जमा अंसारी, अंसार टोला
पीढ़ियों से यह परिवार का धंधा रहा है। मोहल्ले में 90 प्रतिशत से अधिक कारखाने बंद हो गए हैं। जिसकी वजह सूत की महंगाई है। दो साल के भीतर प्रति बंडल सूत का दाम 600 रुपये बढ़ गया है। सूत के बंडल पर मूल्य भी अंकित नहीं रहता है। महाजन मनमाने दर पर बेचते हैं। बिजली का जो प्लैट दर है, उसमें सब्सिडी की रकम की कटौती विद्युत निगम नहीं कर रहा है। जिसकी वजह से समस्या बढ़ती ही जा रही है।
- वसी अहमद अंसारी, अंसार टोला
सूत की महंगाई और बिजली की समस्या ने धंधे को चौपट कर दिया है। उनके पास पहले चार पॉवरलूम था, जिसमें से तीन बंद हो चुका है। सिर्फ एक पॉवरलूम चल रहा है। तैयार माल डंफ पड़ा है। हर सप्ताह सूत का दाम बढ़ना, चिंता का विषय बन गया है। सरकारों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- सरफुदुज्जा अंसारी, अंसार टोला