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Sant Kabir Nagar News: रोजा-नमाज के साथ जकात व फितरा की अदायगी भी जरूरी है
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मौलाना नूरूलहुदा कासमी
सेमरियावां। माह-ए-रमजान आधे से ज्यादा समाप्त हो गया है। रोजेदारों ने रमजान का 18वां रोजा पूरा कर लिया है। माह-ए-रमजान में रोजा-नमाज व कुरान पढ़ने के साथ जकात और फितरा की अदायगी भी जरूरी है। जकात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। रमजान के महीने में ईद की नमाज से पहले फितरा और जकात देना हर हैसियतमंद साहब-ए-निसाब पर फर्ज है।
आल इंडिया तहफ्फुज-ए-मदारिस के सदर और जामिया अरबिया उमर फारूक दरियाबाद के मुहतमिम मौलाना नूरूलहुदा कासमी ने बताया कि हर हैसियतमंद साहब-ए-निसाब पर जकात देना जरूरी होता है। आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है, उसका 2.5 फीसदी हिस्सा किसी गरीब व जरूरतमंद को दिया जाता है, उसे जकात कहते हैं। जैसे अगर किसी मुसलमान के पास तमाम खर्च करने के बाद 100 रुपये बचते हैं तो उसमें से 2.50 रुपये किसी गरीब दिए जाएं। यूं तो जकात पूरे साल में कभी भी दी जा सकती है, लेकिन वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर रिटर्न फाइल करने की तरह ज्यादातर लोग रमजान में ही जकात निकालते हैं।
मुसलमान इस महीने में अपनी पूरे साल की कमाई का आकलन करते हैं, और उसमें से 2.50 फीसदी दान करते हैं। रमजान में गरीबों को जकात देने से काफी सवाब मिलता है। अपने आसपास के लोगों पर नजर रखे। जरूरतमंदों की मदद करें। इस बाबरकत महीने में सच्चे दिल से तौबा करने पर अल्लाह पिछले गुनाहों को माफ कर देता है।
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उन्होंने बताया कि महिलाओं या पुरुषों के पास अगर जेवर के रूप में भी कोई संपत्ति है तो उसकी कीमत के हिसाब से भी जकात दी जाती है, लेकिन जो लोग हैसियतमंद होते हुए भी अल्लाह की रजा में जकात नहीं देते हैं, वे गुनाहगारों में शुमार माने जाते हैं।
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जकात के हकदार
- जकात की रकम गरीब, विधवा, बेसहारा महिला, सगे रिश्तेदार जो जकात के हकदार हों, दे सकते हैं। जकात की रकम देने के लिए सबसे पहले अपने घर, खानदान में जो जकात के मुस्तहिक हैं तलाश करो। सबसे पहला हक इनका है। फिर रिश्तेदार, पड़ोस में तलाश करें। इसके बाद मिसकीन, यतीम, गरीब, विधवा, दिव्यांग, बेसहारा को दिया जा सकता है।
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क्या है फितरा
मौलाना नूरूलहुदा कासमी ने कहा कि फितरा वो रकम होती है जो खाते-पीते, साधन संपन्न घरानों के लोग आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को देते हैं। ईद की नमाज से पहले इसे अदा करना जरूरी होता है। इस तरह अमीर के साथ ही गरीब की भी ईद मन जाती है। फितरे की रकम भी गरीबों, बेवाओं व यतीमों और सभी जरूरतमंदों को दी जाती है। फितरा हर बालिग, नाबालिग औरत, मर्द, बुजुर्ग पर वाजिब है। ईद से पहले इसकी अदायगी जरूरी है। इसकी मिकदार 1.633 किलोग्राम गेहूं है, जो हर मोमिन पर वाजिब है। इसके अलावा जौ, खजूर, किशमिश की मात्रा 3.266 किलोग्राम है। इसके बदले लोग इसकी बाजार कीमत के मुताबिक भी अदा कर सकते हैं। सदका-ए-फितर की रकम पहले अपने रिश्तेदार में आस पड़ोस व शहर में गरीब, विधवाओं, यतीम जरूरतमंद और मदरसा में दी जा सकती है।
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आल इंडिया तहफ्फुज-ए-मदारिस के सदर और जामिया अरबिया उमर फारूक दरियाबाद के मुहतमिम मौलाना नूरूलहुदा कासमी ने बताया कि हर हैसियतमंद साहब-ए-निसाब पर जकात देना जरूरी होता है। आमदनी से पूरे साल में जो बचत होती है, उसका 2.5 फीसदी हिस्सा किसी गरीब व जरूरतमंद को दिया जाता है, उसे जकात कहते हैं। जैसे अगर किसी मुसलमान के पास तमाम खर्च करने के बाद 100 रुपये बचते हैं तो उसमें से 2.50 रुपये किसी गरीब दिए जाएं। यूं तो जकात पूरे साल में कभी भी दी जा सकती है, लेकिन वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर रिटर्न फाइल करने की तरह ज्यादातर लोग रमजान में ही जकात निकालते हैं।
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मुसलमान इस महीने में अपनी पूरे साल की कमाई का आकलन करते हैं, और उसमें से 2.50 फीसदी दान करते हैं। रमजान में गरीबों को जकात देने से काफी सवाब मिलता है। अपने आसपास के लोगों पर नजर रखे। जरूरतमंदों की मदद करें। इस बाबरकत महीने में सच्चे दिल से तौबा करने पर अल्लाह पिछले गुनाहों को माफ कर देता है।
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उन्होंने बताया कि महिलाओं या पुरुषों के पास अगर जेवर के रूप में भी कोई संपत्ति है तो उसकी कीमत के हिसाब से भी जकात दी जाती है, लेकिन जो लोग हैसियतमंद होते हुए भी अल्लाह की रजा में जकात नहीं देते हैं, वे गुनाहगारों में शुमार माने जाते हैं।
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जकात के हकदार
- जकात की रकम गरीब, विधवा, बेसहारा महिला, सगे रिश्तेदार जो जकात के हकदार हों, दे सकते हैं। जकात की रकम देने के लिए सबसे पहले अपने घर, खानदान में जो जकात के मुस्तहिक हैं तलाश करो। सबसे पहला हक इनका है। फिर रिश्तेदार, पड़ोस में तलाश करें। इसके बाद मिसकीन, यतीम, गरीब, विधवा, दिव्यांग, बेसहारा को दिया जा सकता है।
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क्या है फितरा
मौलाना नूरूलहुदा कासमी ने कहा कि फितरा वो रकम होती है जो खाते-पीते, साधन संपन्न घरानों के लोग आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को देते हैं। ईद की नमाज से पहले इसे अदा करना जरूरी होता है। इस तरह अमीर के साथ ही गरीब की भी ईद मन जाती है। फितरे की रकम भी गरीबों, बेवाओं व यतीमों और सभी जरूरतमंदों को दी जाती है। फितरा हर बालिग, नाबालिग औरत, मर्द, बुजुर्ग पर वाजिब है। ईद से पहले इसकी अदायगी जरूरी है। इसकी मिकदार 1.633 किलोग्राम गेहूं है, जो हर मोमिन पर वाजिब है। इसके अलावा जौ, खजूर, किशमिश की मात्रा 3.266 किलोग्राम है। इसके बदले लोग इसकी बाजार कीमत के मुताबिक भी अदा कर सकते हैं। सदका-ए-फितर की रकम पहले अपने रिश्तेदार में आस पड़ोस व शहर में गरीब, विधवाओं, यतीम जरूरतमंद और मदरसा में दी जा सकती है।