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Sambhal News: मूछों वाले महादेव के दर्शन से होती है मनोकामना पूरी
Thu, 07 Mar 2024 01:45 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
Updated Thu, 07 Mar 2024 01:45 AM IST
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चंदौसी (संभल)। शहर के सीता रोड स्थित मूछों वाले शिव का मंदिर आसपास के क्षेत्र में आस्था का केंद्र है। महाशिवरात्रि के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में पूजा-अर्चना और शिवलिंग पर जलाभिषेक करने आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन और विश्वास से मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामना पूरी होती हैं। महाशिवरात्रि वाले दिन यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
शिव मंदिर के पंडित गौरव शर्मा ने बताया कि मंदिर का कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है, लेकिन यह करीब 150 वर्ष पुराना है। बताते है कि जिस स्थान पर आज मंदिर स्थापित हैं वहां कभी जंगल हुआ करता था। चंदौसी के पंडित हनुमान सिंह ने इस शिवलिंग को पहली बार देखा था। वह बहुत ही आध्यात्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। उन्होंने शिवलिंग की पूजा अर्चना शुरू कर दी। जिसके बाद उसे स्थान को मंदिर के रूप दिया गया। बाद में उनके ही परिवार के राजेंद्र सिंह तिरंगा ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार जन सहयोग से कराया। साथ ही मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई। इस प्रतिमा की खास बात यह थी कि भगवान शिव की मूछें हैं। जिसके बाद मंदिर को मूछों वाले शिव मंदिर के नाम से जाने जाना लगा। मंदिर की विशेषता है कि इसके गेट से कितनी भी बड़े आकार की कांवड़ लाई सकती है। आज मंदिर में बड़ी तादात में लोग पूजा-अर्चना को आते हैं। इसके अलावा दूरदराज से भी लोग महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करने आते हैं। महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व ही गंगातट से जल लाकर शिवभक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं। जो सुबह दो बजे से पहुंचकर मंदिर पर जलाभिषेक के लिए लाइन में लग जाते हैं। शिव लिंग पर जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यहां शिव रात्रि के मौके पर मेले में श्रद्धालु नीलकंठ व हरिद्वार से पवित्र कांवड़ लेकर यहां आते हैं। वहीं इस मंदिर में के समीप बगिया वाले मंदिर की विशेष मान्यता हैं।
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शिव मंदिर के पंडित गौरव शर्मा ने बताया कि मंदिर का कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है, लेकिन यह करीब 150 वर्ष पुराना है। बताते है कि जिस स्थान पर आज मंदिर स्थापित हैं वहां कभी जंगल हुआ करता था। चंदौसी के पंडित हनुमान सिंह ने इस शिवलिंग को पहली बार देखा था। वह बहुत ही आध्यात्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। उन्होंने शिवलिंग की पूजा अर्चना शुरू कर दी। जिसके बाद उसे स्थान को मंदिर के रूप दिया गया। बाद में उनके ही परिवार के राजेंद्र सिंह तिरंगा ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार जन सहयोग से कराया। साथ ही मंदिर में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई। इस प्रतिमा की खास बात यह थी कि भगवान शिव की मूछें हैं। जिसके बाद मंदिर को मूछों वाले शिव मंदिर के नाम से जाने जाना लगा। मंदिर की विशेषता है कि इसके गेट से कितनी भी बड़े आकार की कांवड़ लाई सकती है। आज मंदिर में बड़ी तादात में लोग पूजा-अर्चना को आते हैं। इसके अलावा दूरदराज से भी लोग महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक करने आते हैं। महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व ही गंगातट से जल लाकर शिवभक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं। जो सुबह दो बजे से पहुंचकर मंदिर पर जलाभिषेक के लिए लाइन में लग जाते हैं। शिव लिंग पर जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यहां शिव रात्रि के मौके पर मेले में श्रद्धालु नीलकंठ व हरिद्वार से पवित्र कांवड़ लेकर यहां आते हैं। वहीं इस मंदिर में के समीप बगिया वाले मंदिर की विशेष मान्यता हैं।
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