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Sambhal News: कमेटी का दावा, करीब एक हजार साल से लग रहा नेजा मेला
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नेजा मेला कमेटी के पदाधिकारियों से बात करते एएसपी।
- फोटो : नेजा मेला कमेटी के पदाधिकारियों से बात करते एएसपी।
संभल। करीब एक हजार वर्ष से आयोजित होने वाले संभल के नेजा मेले का आयोजन इस बार नहीं होगा। पुलिस की ओर से कानून व्यवस्था न बिगड़े इसको देखते हुए अनुमति देने से इन्कार कर दिया है। यह दावा है धार्मिक नगर नेजा कमेटी के अध्यक्ष शाहिद हुसैन मसूदी का। अध्यक्ष शाहिद हुसैन मसूदी का दावा है कि करीब एक हजार वर्ष से नेजे की ढाल लगाने और नेजा मेला करने की परंपरा चली आ रही है। अध्यक्ष ने बताया कि नेजा मेला सैयद सालार मसूद गाजी की याद में लगता चला आ रहा है।
हालांकि दूसरे समुदाय के द्वारा इसका विरोध कई वर्षों से लगातार किया जाता रहा है। एएसपी ने भी नेजा मेला कमेटी से स्पष्ट कहा है कि जिसने लूट की और हत्याएं की। उसकी याद में कोई भी आयोजन नहीं होने दिया जाएगा।
इस मेले के आयोजन के पीछे की वजह बताते हुए बताया कि संभल वर्ष 1015 के आसपास पृथ्वीराज चौहान की राजधानी थी। कहा जाता है कि वर्ष 1030 के आसपास पृथ्वीराज चौहान के बेटे की नजर संभल के शेख पचासे मियां की बेटी पर पड़ गई थी। शेख पचासे मियां की बेटी शादी करना नहीं चाहती थीं इसलिए उन्होंने सैयद सालार मसूद गाजी को इसकी सूचना भेजी थी। वह अपनी सेना के साथ संभल आए थे और पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था। जिसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हो गई थी। कमेटी अध्यक्ष ने बताया कि इस युद्ध में सैयद सालार मसूद गाजी के साथियों ने भी जान गंवाई थी। उनकी मजार संभल के आसपास बनाई गई हैं। उन्हीं मजार के आसपास मेले आयोजित किए जाते हैं।
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इन मजारों पर लगते हैं नेजा मेला
संभल, शहबाजपुरा सूरा नगला और बादल गुंबद पर एक-एक दिन का मेला लगता है। पहले दिन शाहबाजपुर सूरा नगला में हजरत भोले शाह भोले के मजार पर नेजा मेले का आयोजन किया जाता है। अगले दिन नगर पालिका परिसर में हजरत अहमद शाह के मजार पर नेजा मेला लगता है। तीसरे दिन हसनपुर रोड स्थित बादल गुंबद पर मेला आयोजित होता है। इन तीनों ही स्थानों पर चादरपोशी कर दुआएं मांगी जाती हैं।
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होली से जुड़ा है इस मेले का इतिहास
होली के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को नेजा मेले की ढाल और झंडा लगाए जाने की परंपरा रही है। होली के बाद पड़ने वाले दूसरे मंगलवार को शहबाजपुर सूरानगला का मेला लगता है। इस मेले के लिए होली के बाद का ही समय तय है। इसी परंपरा से यह मनाते रहे हैं। कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि होली के बाद ही नेजा मेला की ढाल लगती आ रही है और दूसरे मंगलवार से नेजा मेला लगता चला आ रहा है। यह परंपरा ही शुरुआत से होने की जानकारी है।
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हालांकि दूसरे समुदाय के द्वारा इसका विरोध कई वर्षों से लगातार किया जाता रहा है। एएसपी ने भी नेजा मेला कमेटी से स्पष्ट कहा है कि जिसने लूट की और हत्याएं की। उसकी याद में कोई भी आयोजन नहीं होने दिया जाएगा।
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इस मेले के आयोजन के पीछे की वजह बताते हुए बताया कि संभल वर्ष 1015 के आसपास पृथ्वीराज चौहान की राजधानी थी। कहा जाता है कि वर्ष 1030 के आसपास पृथ्वीराज चौहान के बेटे की नजर संभल के शेख पचासे मियां की बेटी पर पड़ गई थी। शेख पचासे मियां की बेटी शादी करना नहीं चाहती थीं इसलिए उन्होंने सैयद सालार मसूद गाजी को इसकी सूचना भेजी थी। वह अपनी सेना के साथ संभल आए थे और पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था। जिसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हो गई थी। कमेटी अध्यक्ष ने बताया कि इस युद्ध में सैयद सालार मसूद गाजी के साथियों ने भी जान गंवाई थी। उनकी मजार संभल के आसपास बनाई गई हैं। उन्हीं मजार के आसपास मेले आयोजित किए जाते हैं।
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इन मजारों पर लगते हैं नेजा मेला
संभल, शहबाजपुरा सूरा नगला और बादल गुंबद पर एक-एक दिन का मेला लगता है। पहले दिन शाहबाजपुर सूरा नगला में हजरत भोले शाह भोले के मजार पर नेजा मेले का आयोजन किया जाता है। अगले दिन नगर पालिका परिसर में हजरत अहमद शाह के मजार पर नेजा मेला लगता है। तीसरे दिन हसनपुर रोड स्थित बादल गुंबद पर मेला आयोजित होता है। इन तीनों ही स्थानों पर चादरपोशी कर दुआएं मांगी जाती हैं।
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होली से जुड़ा है इस मेले का इतिहास
होली के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को नेजा मेले की ढाल और झंडा लगाए जाने की परंपरा रही है। होली के बाद पड़ने वाले दूसरे मंगलवार को शहबाजपुर सूरानगला का मेला लगता है। इस मेले के लिए होली के बाद का ही समय तय है। इसी परंपरा से यह मनाते रहे हैं। कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि होली के बाद ही नेजा मेला की ढाल लगती आ रही है और दूसरे मंगलवार से नेजा मेला लगता चला आ रहा है। यह परंपरा ही शुरुआत से होने की जानकारी है।