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पंडित आशाराम ने नानौता स्टेशन और डाकघर फूंक बजाया था आजादी की लड़ाई का बिगुल
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पंडित आशाराम को मिला ताम्रपत्र
- फोटो : SAHARANPUR
नानौता (सहारनपुर)। ब्लॉक नानौता के गांव भाबसी रायपुर निवासी स्वतंत्रता सेनानी पंडित आशा राम का आजादी की लड़ाई में अभूतपूर्व योगदान रहा। उन्होंने नानौता स्टेशन और डाक घर फूंकते हुए आजादी की लड़ाई का बिगुल बजाया था।
वर्ष 1909 में उनका जन्म हुआ था। मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्हें सहारनपुर जुबली पार्क में देश की आजादी के लिए आहूत एक जनसभा में भारत मां की जय के नारे लगाने पर गिरफ्तार किया गया था। रिहा होने के बाद उन्होंने 1932 में नानौता स्टेशन और डाकघर फूंकने की घटना को अंजाम दिया था। इस पर अंग्रेजों ने इन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया। उस समय इनके जीवन में एक दुखद घटना घटित हुई। इनकी धर्म पत्नी और नवजात शिशु का निधन हो गया। ये समाचार जब जेल पहुंचा तो जेलर ने इनसे माफी नामा लिखकर देने पर छोड़ देने की बात कही, लेकिन इनके ऐसा न करने पर इन्हें जेल की तन्हाई में डाल दिया गया। इसके बाद भी माफी न मांगने पर इन्हें कोड़े मारने की सजा दी गई। अंग्रेज अफसर इनसे कभी चक्की पिसवा और कभी बाण बंटवा कर परेशान करते रहे। जेल से छूटने के बाद इन्हें काफी लंबे समय तक नजर बंद रखा गया।
1942 में इनकी पुन: गिरफ्तारी हुई और इनको सबसे कठोर जेल बरेली के कारागार डाल दिया गया। इनकी देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन में स्मरणीय सहयोग के कारण इन्हें तत्कालीन सरकार ने 1974 में ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया, साथ ही ब्लॉक नानौता परिसर में स्थापित शिलाखंड पर इनका नाम अंकित किया गया। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद 1938 में इनकी दूसरी शादी हुई और 1942 में जब ये जेल में थे इनको पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। जब ये खबर जेल पहुंची तो सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने इनके पुत्र का नाम राजेंद्र प्रसाद रखा गया, क्योंकि उसी जेल हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी बंद थे। उन्हीं के नाम पर उनका नाम रखा गया था।
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स्वतंत्रता सेनानी पंडित आशा राम के परिवार में दो बेटे स्व राजेन्द्र प्रसाद पूर्व प्रधानाचार्य और अध्यापक राजकुमार शर्मा थे। पांच पौत्रों में अलोक शर्मा जीएम पॉवर कार्पोरेशन राजस्थान, अतुल शर्मा बिजनेस हेड बिंदल ग्रुप, विक्रम शर्मा इंजीनियर गुड़गांव, विजय शर्मा अध्यापक किसान सेवक इंटर कॉलेज नानौता और विवेक शर्मा हैं।
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वर्ष 1909 में उनका जन्म हुआ था। मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्हें सहारनपुर जुबली पार्क में देश की आजादी के लिए आहूत एक जनसभा में भारत मां की जय के नारे लगाने पर गिरफ्तार किया गया था। रिहा होने के बाद उन्होंने 1932 में नानौता स्टेशन और डाकघर फूंकने की घटना को अंजाम दिया था। इस पर अंग्रेजों ने इन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया। उस समय इनके जीवन में एक दुखद घटना घटित हुई। इनकी धर्म पत्नी और नवजात शिशु का निधन हो गया। ये समाचार जब जेल पहुंचा तो जेलर ने इनसे माफी नामा लिखकर देने पर छोड़ देने की बात कही, लेकिन इनके ऐसा न करने पर इन्हें जेल की तन्हाई में डाल दिया गया। इसके बाद भी माफी न मांगने पर इन्हें कोड़े मारने की सजा दी गई। अंग्रेज अफसर इनसे कभी चक्की पिसवा और कभी बाण बंटवा कर परेशान करते रहे। जेल से छूटने के बाद इन्हें काफी लंबे समय तक नजर बंद रखा गया।
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1942 में इनकी पुन: गिरफ्तारी हुई और इनको सबसे कठोर जेल बरेली के कारागार डाल दिया गया। इनकी देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन में स्मरणीय सहयोग के कारण इन्हें तत्कालीन सरकार ने 1974 में ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया, साथ ही ब्लॉक नानौता परिसर में स्थापित शिलाखंड पर इनका नाम अंकित किया गया। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद 1938 में इनकी दूसरी शादी हुई और 1942 में जब ये जेल में थे इनको पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। जब ये खबर जेल पहुंची तो सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने इनके पुत्र का नाम राजेंद्र प्रसाद रखा गया, क्योंकि उसी जेल हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी बंद थे। उन्हीं के नाम पर उनका नाम रखा गया था।
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स्वतंत्रता सेनानी पंडित आशा राम के परिवार में दो बेटे स्व राजेन्द्र प्रसाद पूर्व प्रधानाचार्य और अध्यापक राजकुमार शर्मा थे। पांच पौत्रों में अलोक शर्मा जीएम पॉवर कार्पोरेशन राजस्थान, अतुल शर्मा बिजनेस हेड बिंदल ग्रुप, विक्रम शर्मा इंजीनियर गुड़गांव, विजय शर्मा अध्यापक किसान सेवक इंटर कॉलेज नानौता और विवेक शर्मा हैं।

स्वतंत्रता सैनानी पंडित आशाराम- फोटो : SAHARANPUR

नानौता में स्वतंत्रा सैनानियों की याद में स्थापित शिलालेख- फोटो : SAHARANPUR