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राजकीय हैचरी से मत्स्य बीज नहीं लेने पर निरस्त होगा पटटा
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सहारनपुर। मछली पालन के लिए अनुदान पाने के बावजूद राजकीय हैचरी से उन्नत मत्स्य बीज नहीं लेने वालों पर सख्ती करने की तैयारी है। ऐसे मत्स्य पालकों का पट्टा भी निरस्त किया जा सकता है। इसका मकसद उच्च गुणवत्ता की मछली उत्पादन कराना है।
मत्स्य विभाग अनुदान देने के साथ ही वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन कराने पर जोर दे रहा है। इसके लिए विभाग राजकीय हैचरी से उच्च गुणवत्ता का मत्स्य बीज मछली पालकों को उपलब्ध कराता है। साथ ही विभाग समय समय पर मछली पालकों को मत्स्य पालन के वैज्ञानिक तौर तरीकों की जानकारी भी उपलब्ध कराता है। सामान्य वर्ग के मछली पालकों को कुल लागत का 40 प्रतिशत और अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिलाओं को इकाई की लागत का 60 फीसदी अनुदान दिया जाता है। मत्स्य विभाग की ओर से निजी तालाब निर्माण कराने के साथ ही ग्राम सभा के तालाबों का आवंटन भी कराया जाता है। लेकिन कुछ मछली पालक तालाब का आवंटन कराने के बाद बाहर से मत्स्य बीज खरीद लेते हैं। कम गुणवत्ता का बीज होने के चलते इसमें मृत्यु दर भी अधिक होती है। जिससे मछली पालन को आमदनी भी अपेक्षाकृत कम ही होती है। इसके चलते विभाग ही मछली पालकों को उच्च गुणवत्ता युक्त मत्स्य बीज उपलब्ध कराता है। अब राजकीय हैचरी से मत्स्य बीज नहीं लेने वालों के तालाब का पट्टा भी निरस्त हो सकता है।
मंडल में 1850 हेक्टेयर में हो रहा मत्स्य पालन
मंडल में 1870 हेक्टेयर तालाबों में मत्स्य पालन हो रहा है। इनमें से 1750 हेक्टेयर तालाब ग्राम समाज के हैं और 100 हेक्टेयर तालाब निजी भूमि पर बनाए गए हैं। इनमें कतला, रोहू, नैन, सिल्वर कॉर्प, ग्रास कार्प, कॉमन कॉर्प आदि का बडे़ पैमाने पर पालन हो रहा है।
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वर्जन --
विभाग मछली पालकों को जहां अनुदान देता है वहीं पालने की वैज्ञानिक विधि की जानकारी भी देता है। जिससे उच्च गुणवत्तायुक्त मछली का पालन हो सके। कई मछली पालक बाहर से कम गुणवत्ता वाला मत्स्य बीज ले लेते हैं। जिससे उच्च गुणवत्तायुक्त मछली का उत्पादन नहीं हो पाता। सरकारी हैचरी से बीज नहीं लेने वाले मत्स्य पालकों के पट्टे निरस्त कराए जा सकते हैं। - डॉक्टर आरके गौड, उप निदेशक मत्स्य।
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मत्स्य विभाग अनुदान देने के साथ ही वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन कराने पर जोर दे रहा है। इसके लिए विभाग राजकीय हैचरी से उच्च गुणवत्ता का मत्स्य बीज मछली पालकों को उपलब्ध कराता है। साथ ही विभाग समय समय पर मछली पालकों को मत्स्य पालन के वैज्ञानिक तौर तरीकों की जानकारी भी उपलब्ध कराता है। सामान्य वर्ग के मछली पालकों को कुल लागत का 40 प्रतिशत और अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिलाओं को इकाई की लागत का 60 फीसदी अनुदान दिया जाता है। मत्स्य विभाग की ओर से निजी तालाब निर्माण कराने के साथ ही ग्राम सभा के तालाबों का आवंटन भी कराया जाता है। लेकिन कुछ मछली पालक तालाब का आवंटन कराने के बाद बाहर से मत्स्य बीज खरीद लेते हैं। कम गुणवत्ता का बीज होने के चलते इसमें मृत्यु दर भी अधिक होती है। जिससे मछली पालन को आमदनी भी अपेक्षाकृत कम ही होती है। इसके चलते विभाग ही मछली पालकों को उच्च गुणवत्ता युक्त मत्स्य बीज उपलब्ध कराता है। अब राजकीय हैचरी से मत्स्य बीज नहीं लेने वालों के तालाब का पट्टा भी निरस्त हो सकता है।
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मंडल में 1850 हेक्टेयर में हो रहा मत्स्य पालन
मंडल में 1870 हेक्टेयर तालाबों में मत्स्य पालन हो रहा है। इनमें से 1750 हेक्टेयर तालाब ग्राम समाज के हैं और 100 हेक्टेयर तालाब निजी भूमि पर बनाए गए हैं। इनमें कतला, रोहू, नैन, सिल्वर कॉर्प, ग्रास कार्प, कॉमन कॉर्प आदि का बडे़ पैमाने पर पालन हो रहा है।
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विभाग मछली पालकों को जहां अनुदान देता है वहीं पालने की वैज्ञानिक विधि की जानकारी भी देता है। जिससे उच्च गुणवत्तायुक्त मछली का पालन हो सके। कई मछली पालक बाहर से कम गुणवत्ता वाला मत्स्य बीज ले लेते हैं। जिससे उच्च गुणवत्तायुक्त मछली का उत्पादन नहीं हो पाता। सरकारी हैचरी से बीज नहीं लेने वाले मत्स्य पालकों के पट्टे निरस्त कराए जा सकते हैं। - डॉक्टर आरके गौड, उप निदेशक मत्स्य।