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आजादी के 72 वर्षों का गवाह है बुड्ढाखेड़ा गुर्जर का बरगद का पेड़
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स्वजंत्रता सेनानी स्वर्गीय हरनाथ सिहं
- फोटो : SAHARANPUR
आजादी के 72 वर्षों का गवाह है बुड्ढाखेड़ा गुर्जर का बरगद का पेड़
सहारनपुर। बड़गांव-सहारनपुर मार्ग पर गांव बुड्ढा खेड़ा गुर्जर के बस स्टैंड पर स्थित वट वृक्ष आजादी के बाद के 72 वर्षों का गवाह है। बरगद के इस पेड़ को प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी बाबू हरनाथ सिंह ने 15 अगस्त 1947 को रोपा था। आजादी के बाद से ही इस गांव में स्थित शिवालय और पीर की मजार पर शिवरात्रि के दिन मेला लगना भी शुरू हुआ। जो इलाके में हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है।
गांव बुड्ढाखेड़ा गुर्जर में चौधरी धन सिंह के यहां बाबू हरनाथ सिंह का जन्म हुआ था। जो बाद में आजादी की लड़ाई के बडे़ योद्धा बने। उन्होंने 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भागरी की। उस समय बाबू हरनाथ सिंह हरियाणा के यमुनानगर स्थित सरस्वती शुगर मिल में कैन एजेंट के पद पर कार्यरत थे। वे नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। गांव बुड्ढाखेड़ा गुर्जर और पहांसू के बीच एक जलसे का आयोजन करने के इल्जाम में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस मामले में उन्हें ढाई वर्ष के जेल की सजा सुनाई गई और 25 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। इस जुर्माने को उन्हें यह कहकर देने से मना कर दिया कि जब उन्होंने कोई जुर्म ही नहीं किया तो जुर्माना कैसा। इस पर उन्हें पांच बेंतों की सजा सुनाई गई। उन्होंने छुआछूत को समाप्त करने में क्षेत्र में बड़ी भूमिका अदा की। आजादी के बाद उन्होंने सरकारी पेंशन लेने से भी इंकार कर दिया था। उनका लगाया हुआ बरगद का पेड़ क्षेत्र वासियों को आजादी के दिन की याद कराता है। उनके पोते और गोचर इंटर कालेज में प्रवक्ता विनोद कुमार ने बताया कि देश की आजादी के उल्लास में उनके दादा ने बरगद के पौधे को रोपा था। जो आज बडे़ वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। उन्होंने सरकार से स्वतंत्रता सेनानी बाबू हरनाथ सिंह की याद में गांव के मुख्य द्वार पर गेट बनवाने की मांग की।
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सहारनपुर। बड़गांव-सहारनपुर मार्ग पर गांव बुड्ढा खेड़ा गुर्जर के बस स्टैंड पर स्थित वट वृक्ष आजादी के बाद के 72 वर्षों का गवाह है। बरगद के इस पेड़ को प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी बाबू हरनाथ सिंह ने 15 अगस्त 1947 को रोपा था। आजादी के बाद से ही इस गांव में स्थित शिवालय और पीर की मजार पर शिवरात्रि के दिन मेला लगना भी शुरू हुआ। जो इलाके में हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है।
गांव बुड्ढाखेड़ा गुर्जर में चौधरी धन सिंह के यहां बाबू हरनाथ सिंह का जन्म हुआ था। जो बाद में आजादी की लड़ाई के बडे़ योद्धा बने। उन्होंने 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भागरी की। उस समय बाबू हरनाथ सिंह हरियाणा के यमुनानगर स्थित सरस्वती शुगर मिल में कैन एजेंट के पद पर कार्यरत थे। वे नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। गांव बुड्ढाखेड़ा गुर्जर और पहांसू के बीच एक जलसे का आयोजन करने के इल्जाम में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस मामले में उन्हें ढाई वर्ष के जेल की सजा सुनाई गई और 25 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। इस जुर्माने को उन्हें यह कहकर देने से मना कर दिया कि जब उन्होंने कोई जुर्म ही नहीं किया तो जुर्माना कैसा। इस पर उन्हें पांच बेंतों की सजा सुनाई गई। उन्होंने छुआछूत को समाप्त करने में क्षेत्र में बड़ी भूमिका अदा की। आजादी के बाद उन्होंने सरकारी पेंशन लेने से भी इंकार कर दिया था। उनका लगाया हुआ बरगद का पेड़ क्षेत्र वासियों को आजादी के दिन की याद कराता है। उनके पोते और गोचर इंटर कालेज में प्रवक्ता विनोद कुमार ने बताया कि देश की आजादी के उल्लास में उनके दादा ने बरगद के पौधे को रोपा था। जो आज बडे़ वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। उन्होंने सरकार से स्वतंत्रता सेनानी बाबू हरनाथ सिंह की याद में गांव के मुख्य द्वार पर गेट बनवाने की मांग की।

गांव बुढढाखेडा गुर्जर मे 15 अगस्त 1947 में लगा बरगद का पेड़- फोटो : SAHARANPUR
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