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...हिंदू-मुस्लिम में वो ही प्यार पुराना दे दे
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Fri, 21 Apr 2017 12:39 AM IST
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रचना पेश करती कवियत्री।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर के देवबंद में श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मेला पंडाल में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में स्थानीय कवि सम्मेलन मुशायरा आयोजित किया गया। इसमें कवियों एवं शायरों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं की वाहवाही बटोरी।
कार्यक्रम का शुभारंभ दुर्गेश अवस्थी की सरस्वती वंदना एवं अलीम वाजिद की नाते पाक से की गई। उद्घाटन समाजसेवी राघवेंद्र कंसल, दीप प्रज्ज्वलित सुमन धीमान तथा शमा रोशन माहिर हसन ने की। नईम अख्तर ने पढ़ा शांति का हमे अनमोल खजाना दे, जिसको सब प्यार से गाए वो तराना दे दे,
ईद हिंदू मिले और खेले मुस्लमां होली, हिंदू-मुस्लिम में वो ही प्यार पुराना दे दे। कुशल कुशवाह की रचना यूं रही बहुत नजदीक है दोनों बनी फिर यूं क्यूं दूरी है, हम बन हम सफर, दुनिया में संग रहना जरूरी है, बखूबी जानता हूं मैं ये तू भी जान जाएगी, मैं बिन तेरे अधूरा हूं तू बिन मेरे अधूरी है।
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दुर्गेश अवस्थी ने कहा जिनके आशीष से मुस्कुराता हूं मैं, ख्वाब जीवन के सारे सजाता हूं मैं, बाद में सारे रिश्ते भी स्वीकार हैं, पहले मां-बाप को सर नवाता हूं मैं।
लता हयात के अल्फाज यूं रहे गम थे दरियां को पार क्या करना, खुद को खुद का शिकार क्या करना, बावफा हो तो कोई बात भी है, बेवफाओं से प्यार क्या करना।
राशिद कमाल ने पढ़ा चमन में गर तू आना भूल जाए, तो हर गुल मुस्कुराना भूल जाए। इनके अलावा मामचंद इंदु, अलीम वाजिद, जहांगीर देवबंदी, वरियाम खान, डॉ. दीवाकर गर्ग और खुर्रम आदि ने काव्य पाठ किया।
अध्यक्षता महबूब हसन और संचालन कुशल कुशवाह ने किया। कार्यक्रम में जीशान नजमी, तौफीक जग्गी, अरविंद कुमार, अनुज सिंघल, प्रवीण त्यागी, आदेश चौहान, विनय बंसल रहे।
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कार्यक्रम का शुभारंभ दुर्गेश अवस्थी की सरस्वती वंदना एवं अलीम वाजिद की नाते पाक से की गई। उद्घाटन समाजसेवी राघवेंद्र कंसल, दीप प्रज्ज्वलित सुमन धीमान तथा शमा रोशन माहिर हसन ने की। नईम अख्तर ने पढ़ा शांति का हमे अनमोल खजाना दे, जिसको सब प्यार से गाए वो तराना दे दे,
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ईद हिंदू मिले और खेले मुस्लमां होली, हिंदू-मुस्लिम में वो ही प्यार पुराना दे दे। कुशल कुशवाह की रचना यूं रही बहुत नजदीक है दोनों बनी फिर यूं क्यूं दूरी है, हम बन हम सफर, दुनिया में संग रहना जरूरी है, बखूबी जानता हूं मैं ये तू भी जान जाएगी, मैं बिन तेरे अधूरा हूं तू बिन मेरे अधूरी है।
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दुर्गेश अवस्थी ने कहा जिनके आशीष से मुस्कुराता हूं मैं, ख्वाब जीवन के सारे सजाता हूं मैं, बाद में सारे रिश्ते भी स्वीकार हैं, पहले मां-बाप को सर नवाता हूं मैं।
लता हयात के अल्फाज यूं रहे गम थे दरियां को पार क्या करना, खुद को खुद का शिकार क्या करना, बावफा हो तो कोई बात भी है, बेवफाओं से प्यार क्या करना।
राशिद कमाल ने पढ़ा चमन में गर तू आना भूल जाए, तो हर गुल मुस्कुराना भूल जाए। इनके अलावा मामचंद इंदु, अलीम वाजिद, जहांगीर देवबंदी, वरियाम खान, डॉ. दीवाकर गर्ग और खुर्रम आदि ने काव्य पाठ किया।
अध्यक्षता महबूब हसन और संचालन कुशल कुशवाह ने किया। कार्यक्रम में जीशान नजमी, तौफीक जग्गी, अरविंद कुमार, अनुज सिंघल, प्रवीण त्यागी, आदेश चौहान, विनय बंसल रहे।