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रोगियों के लिए वरदान है थैलेसीमिया डे केयर सेंटर
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सहारनपुर। थैलेसीमिया एक ऐसा रोग, जिसके मरीजों की जिंदगी सीमित मानी जाती है, लेकिन एसबीडी जिला अस्पताल परिसर स्थित थैलेसीमिया डे केयर सेंटर इन मरीजों के लिए वरदान है। यहां मरीजों को नियमित रूप से पैक्ड आरबीसी उपलब्ध कराया जाता है। जिसकी वजह से मरीज सामान्य व्यक्ति की तरह जिंदगी जी रहे हैं।
थैलेसीमिया डे केयर सेंटर 2020 में स्थापित किया गया था। सेंटर में वर्तमान में 108 मरीज पंजीकृत हैं। सेंटर में केवल दिन में भर्ती कर प्राथमिकता के आधार पर फिल्टर के जरिए पैक्ड आरबीसी चढ़ाने की व्यवस्था है। इसके अलावा कॉर्पोरेशन से जो दवाएं आती हैं वह दवा दी जाती है। नियमित रूप से पैक्ड आरबीसी चढ़ने और दवा मिलने की वजह से मरीज सामान्य तरीके से जिंदगी जीता रहता है। अच्छी बात यह है कि कुछ मरीज अनुमानित उम्र से अधिक तक जी रहे हैं। पंजीकृत 108 मरीजों में छह मरीज 35 से 40 वर्ष की आयु के बीच के हैं, जबकि आमतौर पर माना जाता है कि थैलेसीमिया के ज्यादातर मरीज 14 से 16 साल के बीच जी पाते हैं।
दवा की किल्लत
थैलेसीमिया डे केयर सेंटर में थैलेसीमिया के मरीजों को पैक्ड आरबीसी तो नियमित रूप से मिल रहा है, लेकिन आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स नाम की गोली बीते तीन माह से लखनऊ से नहीं आई हैं। यह दवा थैलेसीमिया मरीजों के लिए बेहद जरूरी होती है, जो शरीर से आयरन को बाहर करती है। दवा नहीं आने की वजह से मरीजों को दवा बाहर से खरीदनी पड़ रही है।
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थैलेसीमिया डे केयर सेंटर में 108 मरीज पंजीकृत हैं, जिनको जरूरत के हिसाब से नियमित रूप से पैक्ड आरबीसी चढ़ाया जाता है। अच्छी बात यह है कि नियमित रूप से आरबीसी चढ़ने और दवाएं लेने से मरीज सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। मरीजों के अभिभावकों से अपील है कि वह इलाज बीच में न छोड़ें।
डॉ. एके चौधरी, नोडल अधिकारी।
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थैलेसीमिया डे केयर सेंटर 2020 में स्थापित किया गया था। सेंटर में वर्तमान में 108 मरीज पंजीकृत हैं। सेंटर में केवल दिन में भर्ती कर प्राथमिकता के आधार पर फिल्टर के जरिए पैक्ड आरबीसी चढ़ाने की व्यवस्था है। इसके अलावा कॉर्पोरेशन से जो दवाएं आती हैं वह दवा दी जाती है। नियमित रूप से पैक्ड आरबीसी चढ़ने और दवा मिलने की वजह से मरीज सामान्य तरीके से जिंदगी जीता रहता है। अच्छी बात यह है कि कुछ मरीज अनुमानित उम्र से अधिक तक जी रहे हैं। पंजीकृत 108 मरीजों में छह मरीज 35 से 40 वर्ष की आयु के बीच के हैं, जबकि आमतौर पर माना जाता है कि थैलेसीमिया के ज्यादातर मरीज 14 से 16 साल के बीच जी पाते हैं।
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दवा की किल्लत
थैलेसीमिया डे केयर सेंटर में थैलेसीमिया के मरीजों को पैक्ड आरबीसी तो नियमित रूप से मिल रहा है, लेकिन आयरन चिलेटर डिफॉसिरॉक्स नाम की गोली बीते तीन माह से लखनऊ से नहीं आई हैं। यह दवा थैलेसीमिया मरीजों के लिए बेहद जरूरी होती है, जो शरीर से आयरन को बाहर करती है। दवा नहीं आने की वजह से मरीजों को दवा बाहर से खरीदनी पड़ रही है।
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थैलेसीमिया डे केयर सेंटर में 108 मरीज पंजीकृत हैं, जिनको जरूरत के हिसाब से नियमित रूप से पैक्ड आरबीसी चढ़ाया जाता है। अच्छी बात यह है कि नियमित रूप से आरबीसी चढ़ने और दवाएं लेने से मरीज सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। मरीजों के अभिभावकों से अपील है कि वह इलाज बीच में न छोड़ें।
डॉ. एके चौधरी, नोडल अधिकारी।