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आरटीई को नहीं मानते स्कूल, अभ्यर्थियों को बैरंग लौटाया

Sat, 30 Apr 2022 11:21 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 30 Apr 2022 11:21 PM IST
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Schools do not accept RTE, the candidates were returned bitterly
सहारनपुर। शिक्षा का अधिकार कानून भले ही बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की पैरवी करता हो, लेकिन हकीकत यह है कि महानगर के कुछ विद्यालय इस कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। विभागीय अधिकारियों के पत्रों और निर्देशों को भी नहीं मान रहे हैं। ऐसे में पात्र अभ्यर्थियों को बैरंग लौटाया जा रहा है। इससे एक ओर जहां बच्चों की शिक्षा का नुकसान हो रहा है, वहीं उनको और उनके माता-पिता को अपमानित भी होना पड़ रहा है। पीड़ित अधिकारियों ने गुहार लगाकर थक चुके हैं।
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पेपर मिल रोड स्थित नाजिरपुरा निवासी अमित कुमार मजदूरी करते हैं। बेटे देव कुमार को अच्छे और अंग्रेजी माध्यमिक के विद्यालय में पढ़ाने का सपना रखते हैं। इसके लिए उन्होंने जिला बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षा का अधिकार कानून के तहत उनके बेटे को दाखिला दिलाने के लिए आवेदन किया था। उन्होंने पेपर मिल रोड सहित महानगर के कुल चार विद्यालयों को विकल्प के तौर पर भरा था। विभाग ने उनको विद्यालय का आवंटन कर दिया, लेकिन विद्यालय दाखिला नहीं दे रहा है। हिम्मत नगर निवासी आरोही पुत्री राजेश कुमार ने भी निजी और अच्छे विद्यालय में पढ़ाई का सपना लिए हुए आवेदन किया था। विभाग से विद्यालय का आवंटन भी कर दिया गया, लेकिन संबंधित विद्यालय ना तो कानून को मान रहा है और ना ही सरकार की उस मुहिम को, जिसमें बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का नारा दिया गया है। आरोही कई बार विद्यालय गई है, लेकिन उसे मायुसी ही हाथ लगी है।
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सरकार से की कार्रवाई की मांग
नाजिरपुरा और हिम्मतनगर कॉलोनी महानगर के वार्ड 39 में आते हैं। ऐसे में स्थानीय पार्षद प्रदीप उपाध्याय ने भी दोनों बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए प्रयास किए हैं, लेकिन नाकाम रहे हैं। उन्होंने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखने के साथ ही आईजीआरएस पोर्टल के माध्यम से प्रदेश सरकार से भी विद्यालयों की शिकायत की है। उनका कहना है कि विद्यालयों के रवैये से बच्चों को दाखिला तो मिल ही नहीं रहा है। साथ ही अभिभावकों का अपमान भी हो रहा है।
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सरकार ने नहीं भेजा पैसा
निजी विद्यालयों में 25 फीसदी सीटों पर कानून के तहत नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान है, लेकिन महानगर के विद्यालयों का तीन साल का पैसा सरकार ने नहीं भेजा है। बीते दिनों विभाग ने 11 करोड़ रुपये की मांग की थी, जिसमें से केवल नौ लाख रुपया आया है। यह सबसे बड़ी वजह है, जिसकी वजह से विद्यालय दाखिले से मना कर रहे हैं।

कुछ अभिभावकों की शिकायत मिली है कि विद्यालय दाखिला नहीं कर रहे हैं। जो भी शिकायत मिल रही है उसका समाधान कराया जा रहा है। विद्यालयों को पत्र लिखे गए हैं। विद्यालयों के सामने कुछ व्यवहारिक समस्याएं हैं उनको भी देखा जा रहा है।
अंबरीष कुमार, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी।
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