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अब हाथों में कटार नहीं, कंधों पर है कुदाल, जानिए बदला शब्बीरपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Fri, 02 Jun 2017 12:05 AM IST
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बातचीत कर मामलों को सुलझाते ग्रामीण।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
सहारनपुर में जातीय हिंसा की तपिश से झुलस रहे शब्बीरपुर में आसमान से बरस रही धूप भी गांव में अमन की राह पर चल पड़ेे लोगों को रोक नहीं पा रही है।
बृहस्पतिवार को भरी दोपहरी में पुलिस की पंचायत के बाद दोनों ही खेमों के लोग गिले-शिकवे भूलकर गांव और यहां के लोग खेतों पर काम करने निकल रहे हैं। लोग बाजारों का रुख कर रहे हैं और गांव में बंद पड़ी दुकानें भी गुलजार होने लगी हैं।
खासकर मेहतनकश लोग अब किसी तरह का बवाल या उपद्रव देखना नहीं चाहते। बड़े-बूढ़े और गांव की महिलाओं की भी मंशा यही है। आए दिन गांव में पहुंच रहे नेता और अफसरों से आजिज आए लोग अब हर हाल में आपसी समझौते से यहां का माहौल सामान्य करने की कोशिश करने में जुटे हैं।
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घेर में बैठे जगत सिंह का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं कि शब्बीरपुर गांव में नफरतों ने जड़ जमा लिया है। जातीय हिंसा की जो घटनाएं हुईं, देखा जाए तो वह परिस्थितिजन्य थी। हालांकि इसे प्रायोजित कहकर तूल जरूर दिया जाता रहा।
नेत्रपाल सिंह के घेर में बैठे दोनों ही खेमों के लोगों को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि इस गांव में चंद रोज पहले ही लोग एक दूसरे के खून के प्यासे भी होंगे। पुलिस की पंचायत के बाद दलित और राजपूत आपस में बातें करते हुए ही लौट रहे थे।
गांव के जीत सिंह कहते हैं कि यहां तो सब प्यार और भाईचारे से रहते हैं। यह तो सियासी लोगों ने आपस में लड़वा दिया और अपने फायदे के लिए हमारे बीच दूरियां चाहते हैं।
उनका दावा है कि अगर सियासी हवाओं का रुख यहां न हो तो यहां का माहौल तो सौहार्दपूर्ण ही रहे। इस हिंसा से आहत फतेह सिंह कहते हैं कि झगड़ेे की वजह से काम धंधा भी चौपट हो गया।
अब दोबारा पटरी पर लौट रहा है, बस अब पुलिस की दखलअंदाजी ज्यादा नहीं हो। उनका कहना है कि इस झगड़े में फंसे नाबालिग के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो, वो चाहे किसी भी तरफ के हो। कुल मिलाकर गांव के लोग अब अमन चाहते हैं।
आसपास के गांवों का माहौल तनावपूर्ण ः शब्बीरपुर बेशक शांत हो गया है, मगर आसपास के गांवों में जरूर अभी माहौल तनावपूर्ण है। उसके पीछे कारण यह है कि पुलिस और प्रशासन का पूरा फोकस शब्बीरपुर पर है।
मगर, आसपास के गांव में हिंसा के बाद उपजे तनाव को करने की कोई कोशिश नहीं की जा रही है। हालांकि यहां भी माहौल को सामान्य करने के लिए प्रशासन को ही पहल करनी होगी।
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बृहस्पतिवार को भरी दोपहरी में पुलिस की पंचायत के बाद दोनों ही खेमों के लोग गिले-शिकवे भूलकर गांव और यहां के लोग खेतों पर काम करने निकल रहे हैं। लोग बाजारों का रुख कर रहे हैं और गांव में बंद पड़ी दुकानें भी गुलजार होने लगी हैं।
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खासकर मेहतनकश लोग अब किसी तरह का बवाल या उपद्रव देखना नहीं चाहते। बड़े-बूढ़े और गांव की महिलाओं की भी मंशा यही है। आए दिन गांव में पहुंच रहे नेता और अफसरों से आजिज आए लोग अब हर हाल में आपसी समझौते से यहां का माहौल सामान्य करने की कोशिश करने में जुटे हैं।
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घेर में बैठे जगत सिंह का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं कि शब्बीरपुर गांव में नफरतों ने जड़ जमा लिया है। जातीय हिंसा की जो घटनाएं हुईं, देखा जाए तो वह परिस्थितिजन्य थी। हालांकि इसे प्रायोजित कहकर तूल जरूर दिया जाता रहा।
नेत्रपाल सिंह के घेर में बैठे दोनों ही खेमों के लोगों को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि इस गांव में चंद रोज पहले ही लोग एक दूसरे के खून के प्यासे भी होंगे। पुलिस की पंचायत के बाद दलित और राजपूत आपस में बातें करते हुए ही लौट रहे थे।
गांव के जीत सिंह कहते हैं कि यहां तो सब प्यार और भाईचारे से रहते हैं। यह तो सियासी लोगों ने आपस में लड़वा दिया और अपने फायदे के लिए हमारे बीच दूरियां चाहते हैं।
उनका दावा है कि अगर सियासी हवाओं का रुख यहां न हो तो यहां का माहौल तो सौहार्दपूर्ण ही रहे। इस हिंसा से आहत फतेह सिंह कहते हैं कि झगड़ेे की वजह से काम धंधा भी चौपट हो गया।
अब दोबारा पटरी पर लौट रहा है, बस अब पुलिस की दखलअंदाजी ज्यादा नहीं हो। उनका कहना है कि इस झगड़े में फंसे नाबालिग के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो, वो चाहे किसी भी तरफ के हो। कुल मिलाकर गांव के लोग अब अमन चाहते हैं।
आसपास के गांवों का माहौल तनावपूर्ण ः शब्बीरपुर बेशक शांत हो गया है, मगर आसपास के गांवों में जरूर अभी माहौल तनावपूर्ण है। उसके पीछे कारण यह है कि पुलिस और प्रशासन का पूरा फोकस शब्बीरपुर पर है।
मगर, आसपास के गांव में हिंसा के बाद उपजे तनाव को करने की कोई कोशिश नहीं की जा रही है। हालांकि यहां भी माहौल को सामान्य करने के लिए प्रशासन को ही पहल करनी होगी।