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अनुयायी मानते हैं, सरसावा है जाहरवीर गोगा का ननिहाल
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सरसावा स्थित गुग्गा म्हाडी
- फोटो : SAHARANPUR
सरसावा है जाहरवीर गोगा का ननिहाल
सरसावा (सहारनपुर)। जाहरवीर गोगा महाराज का सरसावा से गहरा नाता रहा है। उनके अनुयायियों का मानना है कि सरसावा नगर जाहरवीर गोगा का ननिहाल है। सरसावा तथा सहारनपुर में गोगा वीर के नाम से प्रसिद्ध जाहरवीर गोगा के अनुयायियों की संख्या अच्छी खासी है और भादो मास में लगने वाला सहारनपुर का प्रसिद्ध गुघाल मेला भी गोगा वीर को ही समर्पित है। बताते हैं कि सरसावा में प्राचीन काल में सिरस के पेड़ों का घना जंगल था, जिस कारण इसका नाम सरसापट्टम था, लेकिन कालांतर में भाषा अपभ्रंश के कारण इसको सरसावा के नाम से पुकारा जाने लगा।
सरसावा की गोगा म्हाड़ी के संरक्षक परिवार की महिला रमेश देवी, माया आदि ने बताया कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में उल्लेख है कि जाहरवीर गोगा की मां बाछल देवी सरसापट्टम की निवासी थी, जिनका विवाह राजस्थान की ददरेवा रियासत के राजा जेवर सिंह के साथ हुआ था और उन्हीं की संतान का नाम जाहरवीर गोगा है। जिन्हें गोगा वीर भी कहा जाता है। रमेश देवी ने बताया कि उनके पूर्वज चौहल सिंह कश्यप को गोगा वीर के प्रतीक नेजा जैसे बड़ा शस्त्र को सरसावा क्षेत्र में गांव दर गांव घुमाने तथा छड़ी मेला लगाने की जिम्मेदारी मिली हुई थी जो चौहल सिंह के बाद उनके वंशज निभा रहे हैं। चौहल सिंह के वंशज मोहित, नितिन, धर्मपाल, भूषण, सोनू आदि ने बताया कि सरसावा में गोगा वीर का मेला भादो मास की सप्तमी से नवमी तक लगता है, जिसमें नेजे तथा छड़ियों को अंबाला रोड पर पेट्रोल पंप के समीप स्थित गोगा म्हाड़ी पर शोभायात्रा के साथ लाकर स्थापित किया जाता है। जहां उनके अनुयायी नेजे के प्रतीक लाठी के ऊपरी हिस्से पर बंधे नीले रंग के तिकोने आकार के झंडे को चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं, जिसे निशान कहा जाता है।
चौहल सिंह के वंशज नितिन और विकास ने बताया कि जाहरवीर का पहनावा नीले रंग का था तथा उनके स्वामी भक्त घोड़े नाम भी नील्ला था, जिस कारण नीले रंग का निशान चढ़ाया जाता है। उन्होंने बताया कि नेजा पुरुष प्रधान होता है, जो जाहरवीर का प्रतीक है जबकि छड़ी स्त्री रूप होती है जो जाहरवीर की पत्नी श्रियल का प्रतीक है। इसीलिए छड़ियों को साज श्रंगार के साथ चोला ओढ़ाकर निकाला जाता है तथा म्हाड़ी में नेजे के साथ स्थापित की जाती है। छड़ियों की संख्या के विषय में मोहित ने बताया कि जाहरवीर गोगा की पत्नी का स्वरूप सबसे बड़ी छड़ी सरदार छड़ी होती है बाकी छड़ियां सरदार छड़ी की सखी होती हैं, जिन्हें टहलवा छड़ी कहा जाता है।
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सहारनपुर गोगा म्हाड़ी मेले के विषय में चौहल सिंह के वंशज रामपाल और धर्मपाल तथा मोनू आदि ने बताया कि प्राचीन समय में मानकमऊ निवासी कबली भगत नामक व्यक्ति मछली पालन का व्यवसाय करता था। जाहरवीर गोगा ने कबली भगत को मछली पालन छोड़ने की बात कहकर नेजा सौंप दिया और कहा कि गांव दर गांव घूमकर नेजे की पूजा से प्राप्त वस्तुओं से परिवार चलाओ। इससे प्रभावित होकर कबली भगत ने मानकमऊ में जाहरवीर के महल का प्रतीक गोगा म्हाड़ी का निर्माण कराया तथा लोग नेजे की पूजा करने लगे। रामपाल भगत ने बताया कि भादो मास की दशमी को सहारनपुर में गोगा म्हाड़ी पर विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें भक्तजन मन्नतें पूरी होने पर निशान चढ़ाते है।
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सरसावा (सहारनपुर)। जाहरवीर गोगा महाराज का सरसावा से गहरा नाता रहा है। उनके अनुयायियों का मानना है कि सरसावा नगर जाहरवीर गोगा का ननिहाल है। सरसावा तथा सहारनपुर में गोगा वीर के नाम से प्रसिद्ध जाहरवीर गोगा के अनुयायियों की संख्या अच्छी खासी है और भादो मास में लगने वाला सहारनपुर का प्रसिद्ध गुघाल मेला भी गोगा वीर को ही समर्पित है। बताते हैं कि सरसावा में प्राचीन काल में सिरस के पेड़ों का घना जंगल था, जिस कारण इसका नाम सरसापट्टम था, लेकिन कालांतर में भाषा अपभ्रंश के कारण इसको सरसावा के नाम से पुकारा जाने लगा।
सरसावा की गोगा म्हाड़ी के संरक्षक परिवार की महिला रमेश देवी, माया आदि ने बताया कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में उल्लेख है कि जाहरवीर गोगा की मां बाछल देवी सरसापट्टम की निवासी थी, जिनका विवाह राजस्थान की ददरेवा रियासत के राजा जेवर सिंह के साथ हुआ था और उन्हीं की संतान का नाम जाहरवीर गोगा है। जिन्हें गोगा वीर भी कहा जाता है। रमेश देवी ने बताया कि उनके पूर्वज चौहल सिंह कश्यप को गोगा वीर के प्रतीक नेजा जैसे बड़ा शस्त्र को सरसावा क्षेत्र में गांव दर गांव घुमाने तथा छड़ी मेला लगाने की जिम्मेदारी मिली हुई थी जो चौहल सिंह के बाद उनके वंशज निभा रहे हैं। चौहल सिंह के वंशज मोहित, नितिन, धर्मपाल, भूषण, सोनू आदि ने बताया कि सरसावा में गोगा वीर का मेला भादो मास की सप्तमी से नवमी तक लगता है, जिसमें नेजे तथा छड़ियों को अंबाला रोड पर पेट्रोल पंप के समीप स्थित गोगा म्हाड़ी पर शोभायात्रा के साथ लाकर स्थापित किया जाता है। जहां उनके अनुयायी नेजे के प्रतीक लाठी के ऊपरी हिस्से पर बंधे नीले रंग के तिकोने आकार के झंडे को चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं, जिसे निशान कहा जाता है।
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चौहल सिंह के वंशज नितिन और विकास ने बताया कि जाहरवीर का पहनावा नीले रंग का था तथा उनके स्वामी भक्त घोड़े नाम भी नील्ला था, जिस कारण नीले रंग का निशान चढ़ाया जाता है। उन्होंने बताया कि नेजा पुरुष प्रधान होता है, जो जाहरवीर का प्रतीक है जबकि छड़ी स्त्री रूप होती है जो जाहरवीर की पत्नी श्रियल का प्रतीक है। इसीलिए छड़ियों को साज श्रंगार के साथ चोला ओढ़ाकर निकाला जाता है तथा म्हाड़ी में नेजे के साथ स्थापित की जाती है। छड़ियों की संख्या के विषय में मोहित ने बताया कि जाहरवीर गोगा की पत्नी का स्वरूप सबसे बड़ी छड़ी सरदार छड़ी होती है बाकी छड़ियां सरदार छड़ी की सखी होती हैं, जिन्हें टहलवा छड़ी कहा जाता है।
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सहारनपुर गोगा म्हाड़ी मेले के विषय में चौहल सिंह के वंशज रामपाल और धर्मपाल तथा मोनू आदि ने बताया कि प्राचीन समय में मानकमऊ निवासी कबली भगत नामक व्यक्ति मछली पालन का व्यवसाय करता था। जाहरवीर गोगा ने कबली भगत को मछली पालन छोड़ने की बात कहकर नेजा सौंप दिया और कहा कि गांव दर गांव घूमकर नेजे की पूजा से प्राप्त वस्तुओं से परिवार चलाओ। इससे प्रभावित होकर कबली भगत ने मानकमऊ में जाहरवीर के महल का प्रतीक गोगा म्हाड़ी का निर्माण कराया तथा लोग नेजे की पूजा करने लगे। रामपाल भगत ने बताया कि भादो मास की दशमी को सहारनपुर में गोगा म्हाड़ी पर विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें भक्तजन मन्नतें पूरी होने पर निशान चढ़ाते है।