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मय्यत के बाद खाने-पीने को रस्म का रूप देना गैर शरई : गोरा

Mon, 13 Oct 2025 12:57 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर Updated Mon, 13 Oct 2025 12:57 AM IST
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It is against Sharia to make eating and drinking a ritual after the death: Gora
देवबंद(सहारनपुर)। मुस्लिम समाज में तेजी से फैल रहे एक गैर इस्लामी रिवाज पर जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि मय्यत के बाद जिस तरह लोगों ने खाने-पीने को एक दिखावे और रस्म का रूप दे दिया है वह गैर शरई है।
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मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने रविवार को जारी बयान में अफसोस का इजहार करते हुए कहा कि वर्तमान यह आम होता जा रहा है कि मय्यत के दफन होते ही लोग मरहूम के घर लौटकर ऐसे खाने पर टूट पड़ते हैं जैसे जिंदगी में कभी खाना न देखा हो। इतना ही नहीं खाने की तारीफें तक करते हैं जबकि उस घर के लोग गम और सदमे में डूबे होते हैं।
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उन्होंने कहा कि जिस घर में मौत का सदमा हो वहां खाना नहीं बल्कि खाना पहुंचाना सुन्नत है। उन्होंने हदीस का हवाला देते हुए याद दिलाया कि जब हजरत मोहम्मद के चचेरे भाई हजरत जाफर बिन अबी तालिब की शहादत हुई तो नबी-ए-करीम ने फरमाया जाफर के घरवालों के लिए खाना तैयार करो, क्योंकि उन पर गम आ गया है।
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कहा कि यह हदीस साफ बताती है कि मय्यत के घरवालों को राहत पहुंचाना सुन्नत है, न कि उनसे खाने की उम्मीद रखना। लेकिन अफसोस की बात है कि आज लोगों ने इस सुन्नत को पलटकर रख दिया है। मौलाना गोरा ने कहा कि मय्यत के घर में खाना खिलाना अब दिखावे, रस्म और समाजी दबाव की गलत मिसाल बन चुका है। जोर देकर कहा कि मुसलमानों को चाहिए कि वो इन बनावटी रस्मों को छोड़कर सुन्नत-ए-नबवी को जिंदा करें।
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