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ओडीओपी में शामिल हुआ पर नहीं निखरा शहद कारोबार
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अजय सैनी
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। वुड कार्विंग उद्योग के बाद शहद को भी ओडीओपी में शामिल किया गया। उम्मीद थी कि इससे मौन पालकों को लाभ मिलेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। क्योंकि प्रसंस्करण के बाद जहां शहद का बाजार में करीब 300 रुपये प्रति किलो तक रेट रहता है वहीं उत्पादकों को रॉ शहद का भाव 60 से 125 रुपये प्रति किलो तक ही मिल पता है।
प्रदेश में मौन पालन में सहारनपुर जनपद का प्रमुख स्थान है। यहां पर पांच हजार से अधिक लोग इस कारोबार से जुडे़ हुए हैं। इन मौनपालकों के पास मधुमक्खी के 50 से लेकर कई हजार तक डब्बे हैं। जनपद में फरवरी से अप्रैल महीने में सरसों, यूकेलिप्टस, लीची, आम आदि से मधुमक्खी शहद प्राप्त करती हैं। मई, जून में मधुमक्खियों का स्थानांतरण मथुरा, अलीगढ़ से लेकर राजस्थान, हरियाणा एवं उत्तराखंड आदि राज्यों में किया जाता है। जहां पर मधुमक्खियां लाही, सूरजमुखी, नीम, सहजन आदि से शहद प्राप्त करती हैं। जिले में 5000 से ज्यादा लोग मौन पालन करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक जनपद में प्रतिवर्ष आठ हजार से दस हजार क्विंटल शहद का उत्पादन होता है।
बढ़िया भाव की दरकार
जनपद के सबसे पुराने मौनपालकों से एक गंगोह निवासी अजय सैनी का कहना है कि यदि रॉ शहद का बेहतर मूल्य मिले तो मधुमक्खी पालन ओर मुनाफे का हो जाएगा। उनके पास फिलहाल मधुमक्खी के लगभग चार हजार बॉक्स हैं। इससे वे प्रतिवर्ष 500 से 700 क्विंटल तक शहद प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें इस बार शहद का भाव 125 से 130 प्रति किलो तक मिला है। अब वे शहद का प्रसंस्करण प्लांट लगाने में जुटे हैं।
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लाभकारी है मौनपालन
गांव सिसोनी निवासी योगेंद्र कुमार ने पिछले तीन वर्षों से ही मौनपालन शुरू किया है। उनके पास इस समय मधुमक्खी के 46 बॉक्स हैं। एक बॉक्स से उन्हें औसतन 25 किलो तक शहद प्राप्त हो जाता है। उनका कहना है कि मौनपालन काफी लाभकारी कारोबार है। वे मधुमक्खियों के डिब्बों को मई से सितंबर तक मथुरा जिले में किसी स्थान पर रखते हैं। वहां बाजरे से मधुमक्खी शहद प्राप्त करती है। फरवरी महीने में इन बॉक्स को स्थानीय बागों में रखा जाता है।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना में एक जनपद एक उत्पाद के तहत जिले का चयन शहद के लिए किया गया है। जिले में बडे़ पैमाने पर मधुमक्खी पालन होता है। करीब पांच हजार मौनपालक आठ से दस हजार क्विंटल तक शहद का उत्पादन लेते हैं। इससे बडी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हो रहा है। -- अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।
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प्रदेश में मौन पालन में सहारनपुर जनपद का प्रमुख स्थान है। यहां पर पांच हजार से अधिक लोग इस कारोबार से जुडे़ हुए हैं। इन मौनपालकों के पास मधुमक्खी के 50 से लेकर कई हजार तक डब्बे हैं। जनपद में फरवरी से अप्रैल महीने में सरसों, यूकेलिप्टस, लीची, आम आदि से मधुमक्खी शहद प्राप्त करती हैं। मई, जून में मधुमक्खियों का स्थानांतरण मथुरा, अलीगढ़ से लेकर राजस्थान, हरियाणा एवं उत्तराखंड आदि राज्यों में किया जाता है। जहां पर मधुमक्खियां लाही, सूरजमुखी, नीम, सहजन आदि से शहद प्राप्त करती हैं। जिले में 5000 से ज्यादा लोग मौन पालन करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक जनपद में प्रतिवर्ष आठ हजार से दस हजार क्विंटल शहद का उत्पादन होता है।
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बढ़िया भाव की दरकार
जनपद के सबसे पुराने मौनपालकों से एक गंगोह निवासी अजय सैनी का कहना है कि यदि रॉ शहद का बेहतर मूल्य मिले तो मधुमक्खी पालन ओर मुनाफे का हो जाएगा। उनके पास फिलहाल मधुमक्खी के लगभग चार हजार बॉक्स हैं। इससे वे प्रतिवर्ष 500 से 700 क्विंटल तक शहद प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें इस बार शहद का भाव 125 से 130 प्रति किलो तक मिला है। अब वे शहद का प्रसंस्करण प्लांट लगाने में जुटे हैं।
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लाभकारी है मौनपालन
गांव सिसोनी निवासी योगेंद्र कुमार ने पिछले तीन वर्षों से ही मौनपालन शुरू किया है। उनके पास इस समय मधुमक्खी के 46 बॉक्स हैं। एक बॉक्स से उन्हें औसतन 25 किलो तक शहद प्राप्त हो जाता है। उनका कहना है कि मौनपालन काफी लाभकारी कारोबार है। वे मधुमक्खियों के डिब्बों को मई से सितंबर तक मथुरा जिले में किसी स्थान पर रखते हैं। वहां बाजरे से मधुमक्खी शहद प्राप्त करती है। फरवरी महीने में इन बॉक्स को स्थानीय बागों में रखा जाता है।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना में एक जनपद एक उत्पाद के तहत जिले का चयन शहद के लिए किया गया है। जिले में बडे़ पैमाने पर मधुमक्खी पालन होता है। करीब पांच हजार मौनपालक आठ से दस हजार क्विंटल तक शहद का उत्पादन लेते हैं। इससे बडी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हो रहा है। -- अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।

योगेन्द्र कुमार- फोटो : SAHARANPUR

मधुमक्खी पालन- फोटो : SAHARANPUR