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संघर्ष और मेहनत से बनाई अलग पहचान
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करेशनी देवी
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। इनका जीवन संघर्ष से भरा रहा। पति की मृत्यु हो गई। बच्चों की परवरिश का जिम्मा कंधे पर आ गया, बावजूद इसके वह घबराईं नहीं। तमाम दिक्कतें झेलीं। किसी ने मजदूरी तो किसी ने लकड़ी की ठेकेदारी की। संघर्ष का सफर कामयाबी के मुकाम पर पहुंचा तो आज खुश होती हैं। ऐसी हैं ग्रामीण परिवेश की साहसी और संघर्षशील महिलाएं।
अपने बूते बनीं प्रधान और मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित
गागलहेड़ी। ग्राम पंचायत उग्राहू की पूर्व प्रधान राजबाला (57) का जीवन संघर्ष से भरा रहा। 36 वर्ष की उम्र में पति मदन राणा का देहांत हो गया। बड़ा बेटा उस वक्त मात्र आठ साल का था। इसके बाद चार बच्चों की परवरिश अपने बल पर की। खेतीबाड़ी के साथ ही ग्राम प्रधान रहे पति की विरासत भी संभाली। कक्षा आठ पास राजबाला ने अपनी पहचान बनाई और वर्ष 2016 में प्रधान पद का चुनाव जीतकर विकास कार्य कराए। उन्हें वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में सम्मानित किया। प्रधान पद आरक्षित होने के कारण इस बार चुनाव तो नहीं लड़ सकीं, लेकिन गांव के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सभी उनकी राय लेते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में उनकी क्षेत्र में अच्छी पहचान है।
लकड़ी ठेकेदारी और मुंशी काम कार्य कर पाया मुकाम
नागल। गांव बढेड़ी कोली निवासी शीला चक्रवर्ती के पति का स्वर्गवास 1998 में हो गया था। उस वक्त छोटे बच्चे की उम्र केवल 5 माह थी। बकौल शीला एकबारगी लगा कि जीवन खत्म हो गया है। न तो कोई संपत्ति थी और न ही आय का कोई जरिया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। सहारनपुर कोर्ट में अधिवक्ता के पास पांच साल तक मुंशी का काम किया। फिर लकड़ी ठेकेदारी में किस्मत अजमाई और यमुनानगर मंडी तक काम किया। इसके बाद शीला ने समाजसेवा और राजनीति में भी हाथ अजमाया। कांग्रेस के टिकट पर नागल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। आंबेडकर सामाजिक संस्था से जुड़ीं शीला अब निसहायों की मदद कर रही हैं। एक बेटी की शादी कर चुकी शीला के दो बेटे अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। शीला कहती है कि हिम्मत जिंदगी की जंग को जीतने के लिए सबसे बड़ा हथियार है।
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मजदूरी कर बेटे को बनाया शिक्षाविद्
साढ़ौली कदीम। गांव कंबोहमजरा निवासी करेशनी देवी के पति मोल्हूराम का देहांत शादी के तीन वर्ष बाद हो गया था। उस वक्त करेशनी देवी के पास दो माह का एक बेटा था। उन्होंने मजदूरी की तमाम दिक्कतें झेलीं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। बेटे नाथीराम कांबोज को उच्च शिक्षा दिलवाई। नाथीराम ने मां के सपनों को साकार करते हुए क्षेत्र में शिक्षा की कमी को देखते हुए इंटर कॉलेज की स्थापना की। नाथीराम को राष्ट्रीय अध्यापक पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा दिया गया। सेवानिवृत्ति के बाद नाथीराम डिग्री कॉलेज की स्थापना कर शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। करेशनी देवी बताती हैं कि जीवन में अनेक संघर्ष आए परंतु उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उसी का परिणाम है कि आज बेटा इस मुकाम पर है।
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अपने बूते बनीं प्रधान और मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित
गागलहेड़ी। ग्राम पंचायत उग्राहू की पूर्व प्रधान राजबाला (57) का जीवन संघर्ष से भरा रहा। 36 वर्ष की उम्र में पति मदन राणा का देहांत हो गया। बड़ा बेटा उस वक्त मात्र आठ साल का था। इसके बाद चार बच्चों की परवरिश अपने बल पर की। खेतीबाड़ी के साथ ही ग्राम प्रधान रहे पति की विरासत भी संभाली। कक्षा आठ पास राजबाला ने अपनी पहचान बनाई और वर्ष 2016 में प्रधान पद का चुनाव जीतकर विकास कार्य कराए। उन्हें वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में सम्मानित किया। प्रधान पद आरक्षित होने के कारण इस बार चुनाव तो नहीं लड़ सकीं, लेकिन गांव के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सभी उनकी राय लेते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में उनकी क्षेत्र में अच्छी पहचान है।
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लकड़ी ठेकेदारी और मुंशी काम कार्य कर पाया मुकाम
नागल। गांव बढेड़ी कोली निवासी शीला चक्रवर्ती के पति का स्वर्गवास 1998 में हो गया था। उस वक्त छोटे बच्चे की उम्र केवल 5 माह थी। बकौल शीला एकबारगी लगा कि जीवन खत्म हो गया है। न तो कोई संपत्ति थी और न ही आय का कोई जरिया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। सहारनपुर कोर्ट में अधिवक्ता के पास पांच साल तक मुंशी का काम किया। फिर लकड़ी ठेकेदारी में किस्मत अजमाई और यमुनानगर मंडी तक काम किया। इसके बाद शीला ने समाजसेवा और राजनीति में भी हाथ अजमाया। कांग्रेस के टिकट पर नागल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। आंबेडकर सामाजिक संस्था से जुड़ीं शीला अब निसहायों की मदद कर रही हैं। एक बेटी की शादी कर चुकी शीला के दो बेटे अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। शीला कहती है कि हिम्मत जिंदगी की जंग को जीतने के लिए सबसे बड़ा हथियार है।
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मजदूरी कर बेटे को बनाया शिक्षाविद्
साढ़ौली कदीम। गांव कंबोहमजरा निवासी करेशनी देवी के पति मोल्हूराम का देहांत शादी के तीन वर्ष बाद हो गया था। उस वक्त करेशनी देवी के पास दो माह का एक बेटा था। उन्होंने मजदूरी की तमाम दिक्कतें झेलीं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। बेटे नाथीराम कांबोज को उच्च शिक्षा दिलवाई। नाथीराम ने मां के सपनों को साकार करते हुए क्षेत्र में शिक्षा की कमी को देखते हुए इंटर कॉलेज की स्थापना की। नाथीराम को राष्ट्रीय अध्यापक पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा दिया गया। सेवानिवृत्ति के बाद नाथीराम डिग्री कॉलेज की स्थापना कर शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। करेशनी देवी बताती हैं कि जीवन में अनेक संघर्ष आए परंतु उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उसी का परिणाम है कि आज बेटा इस मुकाम पर है।

शीला चक्रवर्ती- फोटो : SAHARANPUR

राजबाला- फोटो : SAHARANPUR