फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Saharanpur News ›   Identity created by struggle and hard work

संघर्ष और मेहनत से बनाई अलग पहचान

Thu, 14 Oct 2021 11:15 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 14 Oct 2021 11:15 PM IST
विज्ञापन
Identity created by struggle and hard work
करेशनी देवी - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। इनका जीवन संघर्ष से भरा रहा। पति की मृत्यु हो गई। बच्चों की परवरिश का जिम्मा कंधे पर आ गया, बावजूद इसके वह घबराईं नहीं। तमाम दिक्कतें झेलीं। किसी ने मजदूरी तो किसी ने लकड़ी की ठेकेदारी की। संघर्ष का सफर कामयाबी के मुकाम पर पहुंचा तो आज खुश होती हैं। ऐसी हैं ग्रामीण परिवेश की साहसी और संघर्षशील महिलाएं।
विज्ञापन

अपने बूते बनीं प्रधान और मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित
गागलहेड़ी। ग्राम पंचायत उग्राहू की पूर्व प्रधान राजबाला (57) का जीवन संघर्ष से भरा रहा। 36 वर्ष की उम्र में पति मदन राणा का देहांत हो गया। बड़ा बेटा उस वक्त मात्र आठ साल का था। इसके बाद चार बच्चों की परवरिश अपने बल पर की। खेतीबाड़ी के साथ ही ग्राम प्रधान रहे पति की विरासत भी संभाली। कक्षा आठ पास राजबाला ने अपनी पहचान बनाई और वर्ष 2016 में प्रधान पद का चुनाव जीतकर विकास कार्य कराए। उन्हें वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में सम्मानित किया। प्रधान पद आरक्षित होने के कारण इस बार चुनाव तो नहीं लड़ सकीं, लेकिन गांव के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सभी उनकी राय लेते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में उनकी क्षेत्र में अच्छी पहचान है।
विज्ञापन

लकड़ी ठेकेदारी और मुंशी काम कार्य कर पाया मुकाम
नागल। गांव बढेड़ी कोली निवासी शीला चक्रवर्ती के पति का स्वर्गवास 1998 में हो गया था। उस वक्त छोटे बच्चे की उम्र केवल 5 माह थी। बकौल शीला एकबारगी लगा कि जीवन खत्म हो गया है। न तो कोई संपत्ति थी और न ही आय का कोई जरिया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। सहारनपुर कोर्ट में अधिवक्ता के पास पांच साल तक मुंशी का काम किया। फिर लकड़ी ठेकेदारी में किस्मत अजमाई और यमुनानगर मंडी तक काम किया। इसके बाद शीला ने समाजसेवा और राजनीति में भी हाथ अजमाया। कांग्रेस के टिकट पर नागल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। आंबेडकर सामाजिक संस्था से जुड़ीं शीला अब निसहायों की मदद कर रही हैं। एक बेटी की शादी कर चुकी शीला के दो बेटे अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। शीला कहती है कि हिम्मत जिंदगी की जंग को जीतने के लिए सबसे बड़ा हथियार है।
विज्ञापन
विज्ञापन

मजदूरी कर बेटे को बनाया शिक्षाविद्
साढ़ौली कदीम। गांव कंबोहमजरा निवासी करेशनी देवी के पति मोल्हूराम का देहांत शादी के तीन वर्ष बाद हो गया था। उस वक्त करेशनी देवी के पास दो माह का एक बेटा था। उन्होंने मजदूरी की तमाम दिक्कतें झेलीं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। बेटे नाथीराम कांबोज को उच्च शिक्षा दिलवाई। नाथीराम ने मां के सपनों को साकार करते हुए क्षेत्र में शिक्षा की कमी को देखते हुए इंटर कॉलेज की स्थापना की। नाथीराम को राष्ट्रीय अध्यापक पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा दिया गया। सेवानिवृत्ति के बाद नाथीराम डिग्री कॉलेज की स्थापना कर शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। करेशनी देवी बताती हैं कि जीवन में अनेक संघर्ष आए परंतु उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उसी का परिणाम है कि आज बेटा इस मुकाम पर है।

शीला चक्रवर्ती

शीला चक्रवर्ती- फोटो : SAHARANPUR

राजबाला

राजबाला- फोटो : SAHARANPUR

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed