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अमरूद की बागवानी: दस वर्षो में बढा तीन गुना रकबा
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तरूण कुमार गुरेजा
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे ने किसानों का रुझान बागवानी की ओर कर दिया है। बढ़िया मुनाफे के चलते किसानों ने तेजी से अमरूद की बागवानी को अपनाया है। जिले में 10 वर्षों के दौरान अमरूद का रकबा करीब तीन गुना बढ़ गया है।
अच्छे भाव ओर बढ़िया उत्पादन के चलते बागवानों के लिए अमरूद की खेती लाभकारी साबित हो रही है। अधिक मांग होने के चलते जनपद में अधिकांश बागवान अमरूद की सर्दी की फसल लेते हैं। जिले की जलवायु और मिट्टी अमरूद की बागवानी के लिए मुफीद है। तीसरे वर्ष से फल देने के चलते किसान आम और लीची के बागों के बीच भी इसकी रोपाई करते हैं। जिले में पहले बेहट क्षेत्र में अमरूद का रकबा अधिक था। अब मुजफ्फराबाद, पुंवारका, बलियाखेड़ी, नकुड़ और सरसावा विकास खंड में भी इसकी बागवानी बढ़ी है। नागल ब्लाक के मायाहेड़ी, गंझेड़ी, बोहडूपुर, गंगदासपुर, विलासपुर, खेड़ा मुगल आदि गांव में बागवानों को अमरूद की खेती भा रही है।
भा रहीं अमरूद की यह प्रजातियां
जिले के बागवान अमरूद की नई और पुरानी दोनों प्रकार की प्रजातियों की बागवानी कर रहे हैं। सबसे अधिक क्षेत्रफल में लखनऊ-49, इलाहाबाद सफेदा, बर्फखान, ललित, फर्रूखाबादी प्रजातियों का है। इसके अलावा अब बागवान वीएनआर बिही (छत्तीसगढ़) और श्वेता प्रजातियों को भी पसंद कर रहे हैं।
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बढ़िया मुनाफा कमा रहे
जनपद के बड़े और प्रगतिशील बागवान करुण कुमार गुरेजा के पास करीब 100 बीघा वीएनआर बिही प्रजाति का अमरूद का बाग है। उन्होंने एक बीघा में 40 पेड़ लगा रखे हैं। अभी एक पेड़ से औसतन 20 किलो अमरूद प्राप्त हो जाते हैं। सात-आठ वर्ष में यह उत्पादन एक क्विंटल होने की उम्मीद है। उनका कहना है कि इस बार उन्हें वीएनआर प्रजाति के अमरूद का 60 से 70 रुपये प्रति किलो औसत भाव प्राप्त हुआ। इससे अभी उन्हें 30 से 35 हजार रुपये प्रति बीघा आय हो रही है।
सघन विधि से लगाया बाग
गांव बोहडूपुर के बागवान रविन्द्र कुमार ने अमरूद को सघन विधि से लगा रखा है। इसमें आठ गुना आठ के हिसाब से प्रति बीघा करीब सौ पौधे आते हैं। वीएनआर, बर्फखान, लखनऊ-49 आदि प्रजाति के पौध लगा रखे हैं। उनका कहना है कि यदि प्रति पेड़ 20 किलो भी उत्पादन माना जाए तो भी एक बीघा में 20 क्विंटल अमरूद प्राप्त हो जाते हैं। औसतन 25 रुपये का भाव मिलने पर भी करीब 50 हजार रुपये का बैठता है। इसमें खर्च निकालकर 35 हजार से अधिक की बचत हो जाती है।
जनपद में अमरूद की बागवानी के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है। 10 वर्षों में अमरूद का रकबा 900 हेक्टेयर से 2600 हेक्टेयर हो गया है। इसमें तमाम खर्च निकालकर 20 हजार रुपये प्रति बीघा से अधिक का लाभ बागवानों को प्राप्त हो जाता है। - अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।
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अच्छे भाव ओर बढ़िया उत्पादन के चलते बागवानों के लिए अमरूद की खेती लाभकारी साबित हो रही है। अधिक मांग होने के चलते जनपद में अधिकांश बागवान अमरूद की सर्दी की फसल लेते हैं। जिले की जलवायु और मिट्टी अमरूद की बागवानी के लिए मुफीद है। तीसरे वर्ष से फल देने के चलते किसान आम और लीची के बागों के बीच भी इसकी रोपाई करते हैं। जिले में पहले बेहट क्षेत्र में अमरूद का रकबा अधिक था। अब मुजफ्फराबाद, पुंवारका, बलियाखेड़ी, नकुड़ और सरसावा विकास खंड में भी इसकी बागवानी बढ़ी है। नागल ब्लाक के मायाहेड़ी, गंझेड़ी, बोहडूपुर, गंगदासपुर, विलासपुर, खेड़ा मुगल आदि गांव में बागवानों को अमरूद की खेती भा रही है।
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भा रहीं अमरूद की यह प्रजातियां
जिले के बागवान अमरूद की नई और पुरानी दोनों प्रकार की प्रजातियों की बागवानी कर रहे हैं। सबसे अधिक क्षेत्रफल में लखनऊ-49, इलाहाबाद सफेदा, बर्फखान, ललित, फर्रूखाबादी प्रजातियों का है। इसके अलावा अब बागवान वीएनआर बिही (छत्तीसगढ़) और श्वेता प्रजातियों को भी पसंद कर रहे हैं।
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जनपद के बड़े और प्रगतिशील बागवान करुण कुमार गुरेजा के पास करीब 100 बीघा वीएनआर बिही प्रजाति का अमरूद का बाग है। उन्होंने एक बीघा में 40 पेड़ लगा रखे हैं। अभी एक पेड़ से औसतन 20 किलो अमरूद प्राप्त हो जाते हैं। सात-आठ वर्ष में यह उत्पादन एक क्विंटल होने की उम्मीद है। उनका कहना है कि इस बार उन्हें वीएनआर प्रजाति के अमरूद का 60 से 70 रुपये प्रति किलो औसत भाव प्राप्त हुआ। इससे अभी उन्हें 30 से 35 हजार रुपये प्रति बीघा आय हो रही है।
सघन विधि से लगाया बाग
गांव बोहडूपुर के बागवान रविन्द्र कुमार ने अमरूद को सघन विधि से लगा रखा है। इसमें आठ गुना आठ के हिसाब से प्रति बीघा करीब सौ पौधे आते हैं। वीएनआर, बर्फखान, लखनऊ-49 आदि प्रजाति के पौध लगा रखे हैं। उनका कहना है कि यदि प्रति पेड़ 20 किलो भी उत्पादन माना जाए तो भी एक बीघा में 20 क्विंटल अमरूद प्राप्त हो जाते हैं। औसतन 25 रुपये का भाव मिलने पर भी करीब 50 हजार रुपये का बैठता है। इसमें खर्च निकालकर 35 हजार से अधिक की बचत हो जाती है।
जनपद में अमरूद की बागवानी के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है। 10 वर्षों में अमरूद का रकबा 900 हेक्टेयर से 2600 हेक्टेयर हो गया है। इसमें तमाम खर्च निकालकर 20 हजार रुपये प्रति बीघा से अधिक का लाभ बागवानों को प्राप्त हो जाता है। - अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।

अरूण कुमार- फोटो : SAHARANPUR

विन्द्र कुमार- फोटो : SAHARANPUR

अमरूद का पेड़- फोटो : SAHARANPUR