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पूरी पगार को भी तरस रहे गांधी आश्रम के सेवादार

Mon, 28 Sep 2020 11:15 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 28 Sep 2020 11:15 PM IST
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पूरी पगार को भी तरस रहे गांधी आश्रम के सेवादार
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सहारनपुर। आजादी के आंदोलन में चर्चित हुई बापू की खादी की चमक नए दौर में कुछ फीकी हुई तो कोरोना काल में परेशानी और बढ़ गई। खादी उद्योग के भरोसे आजीविका चलाने वाले सेवादार नियमित पगार को भी तरस रहे हैं। इसके बावजूद सेवा और समर्पण में कोई कमी नहीं है।
पेपर मिल रोड पर क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम का कार्यालय है। इससे जुड़े सात विक्रय केंद्र हैं। इनके अलावा जिले में कताई, रंगाई, बुनाई, सिलाई और ढुलाई से जुड़ी 150 से ज्यादा लघु इकाइयां हैं। इनमें 130 से ज्यादा तो नियमित कर्मचारी हैं। इनके सहित करीब 5000 सहयोगी सेवादार हैं। गांधी आश्रम के क्षेत्रीय मंत्री महातम यादव बताते हैं कि कोरोना काल में अप्रैल और मई माह में तो काम पूरी तरह बंद रहा। इसके बाद कुछ काम शुरू हुआ तो कर्मचारियों और सेवादारों को नियमित पगार देने में दिक्कतें आ रही हैं।
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नहीं मिले सब्सिडी के दो करोड़ रुपये
क्षेत्रीय कार्यालय के पदाधिकारी बताते हैं कि हर साल गांधी जयंती और दीपावली पर ग्राहकों को 20 प्रतिशत की छूट दी जाती है। यह छूट केंद्र और प्रदेश सरकार से सब्सिडी के रूप में उन्हें मिलती है। मगर सब्सिडी वाले करीब दो करोड़ रुपये अब तक नहीं मिल पाए हैं। यदि यह रकम मिल जाए तो, सेवादारों और उनके परिवारों को कुछ सहारा मिले। शासन स्तर से बजट न होने की मजबूरी बताई गई है। अब तो यही दुआ कर रहे हैं कि बापू की जयंती पर ही सरकार मेहरबान हो जाए।
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खादी उत्पादों से 10 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार
खादी के उत्पादों से जिले में हर साल करीब 10 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। इनमें प्रमुख खादी उत्पाद धोती, कुर्ता, पायजामा, अंडरवियर, लिहाफ, तकियों के कवर, तौलिये, सूती चादर, डबल बेड शीट, सिंगल बेड शीट, पोली शर्ट आदि शामिल हैं। गर्मी के मौसम में सूती वस्त्रों की अधिक मांग होती है तो सर्दियों में खादी से बनी चादरें, रजाई, तकियों की सबसे अधिक मांग रहती है। कोरोना काल में सूती अंगोछों की काफी बिक्री हुई है।

चुनावी मौसम में ही होती है टोपी की मांग
खादी का धोती-कुर्ता और टोपी कभी स्वदेशी परिधान में सबसे ज्यादा मांग में रहे। लेकिन अब धोती और टोपी की मांग कम हो गई है। चुनावी मौसम में ही टोपी की मांग होती है। इसके अलावा राष्ट्रीय पर्व और प्रभात फेरियों जैसे आयोजन में टोपी का प्रयोग होता है। नए दौर में धोती की जगह पायजामे ने ले ली है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोग अब भी धोती और लुंगी लेते हैं।
प्रमुख परिधान और अन्य उत्पादों की औसत कीमत
खादी का कुर्ता और पायजामा- 800 से 1500 रुपये
खादी की कमीज - 400 रुपये से 1200 रुपये तक
टोपी - 70 से 90 रुपये तक
सिंगल बेड शीट - 550 से 900 रुपये
डबल बेड शीट - 1000 से 1500 रुपये तक
खादी की सूती जैकेट - 1500 से 2000 रुपये तक
लिहाफ - 1200 से 3000 रुपये तक
खादी का तकिया - 300 से 400 रुपये
तौलिया - 250 से 300 रुपये
गमछा - 150 से 200 रुपये
धोती - 800 से 1200 रुपये
लुंगी - 350 से 500 रुपये
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